सरकारी उपचार की योजनाबद्ध पहल – शब्बीर कादरी

1:31 pm or January 11, 2019
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सरकारी उपचार की योजनाबद्ध पहल

-शब्बीर कादरी

निकृष्ट राजनीतिक व्यवहार और घृणात्मकरूप से खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक समीकरणों के उपयोग से हर प्रकार के चुनाव इन दिनों सिर्फ लड़े नहीं जीते भी जाते हैं और इसी व्यवहार के चलते स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत जरूरतें प्राथमिकता के बावजूद आमजन के उपयोग से वंचित रह जाती हैं। प्रतिष्ठित वैश्विक मेडिकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित एक लेख कहा गया है कि भारत सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च के लिए वर्ष 2025 तक सकेल घरेलू उत्पाद की वर्तमान दर 1.2 को बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत करने की मंशा जाहिर की है। ऐसे में जबकि विश्व के अनेक देश अपनी जीडीपी दर की वर्तमान दर का 6 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किए जाने को कटिबद्ध हैं हमारे यहां इतनी अल्पराशि का इस मद में खर्च किया जाना विशाल लोकतंत्र की प्रतिष्ठि को शर्मसार करता है। हाल ही मे हुए राज्यों के चुनावों में राजनीतिक दलों ने समाज के कुछ वर्गों के अनुरूप अपने-अपने घोषणापत्र बनाए। जिनमें स्वास्थ्य को लेकर भले ही किसी राजनीतिक दल ने संतुष्ट कर देने वाली कोई घोषणा की हो, पर अब भविष्य में शायद ऐसा न हो क्योंकि चिकित्सकों का एक समूह प्रमुख राजनीतिक दलों से, स्वास्थ्य सेवाओं में हो रही उदासीनता, पर्याप्त धन की कमी, आधारभूत संरचनाओं की अनदेखी और गैर प्रशिक्षित अमले के अलावा चिकित्सकों की खासी कमी जैसे कई बिंदुओं पर चर्चा करेगा और उन्हें घोषणापत्र में न्यायसंगतरूप से फलीभूत किए जाने की मांग की जाएगी।

प्रसन्नता होगी की नैतिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चिकित्सकों का एक संगठन (एडीईएच) अब “नैतिक डॉक्टर घोषणापत्र“ जारी करने वाला है। संगठन का मत है कि इस घोषणापत्र का आशय स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को राजनीतिक दलों और चुनावी प्रक्रिया के बीच वह स्थान दिलाना है जिसकी कभी परवाह नहीं की गई। कहा जा रहा है कि अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं पर बजट आवंटन, अनियंत्रितरूप से चल रहा निजी क्षेत्र का स्वास्थ्य उद्योग और इसी से जुड़े स्वास्थ्य कार्यों में पनप रहे अवैध कार्य जैसी कई विसंगतियों पर फोकस किया जाएगा। संगठन सरकार के प्रयासों को नाकाफी बताते हुए इसकी निंदा करता हैं और इसे अधिक प्रभावी ढ़ंग से प्रतिपादित किए जाने की जरूरत बताता हैं। चिकित्सकों का यह समूह आयुष्मान भारत के बीमा आधारित मॉडल का भी विरोध करता है पर यह भी कहता है कि देश की 40 प्रतिशत आबादी को स्वास्थ्य सेवाऐं प्रदान करने की और यह एक कदम साबित हो सकता है। राज्यों के बीच बीमा स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर इन दिनों प्रतिस्पर्धा का दौर जारी है पर दिल्ली जैसे छोटे राज्य में कार्यरत मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजना से जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है सबक सीखा जा सकता है।

हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र में आंकड़े गवाह हैं कि यहां कदम-कदम पर जनसंख्या और जरूरत के मान से चिकित्सकों और विशेषज्ञों की भारी कमी है संसद में इसे सरकार ने भी माना है। सभी राज्य व सात केंन्द्र शासित राज्यों में यदि इसे बांटा जाए तो प्रति राज्य स्वास्थ्य अमले की यह संख्या लगभग 20,000 कही जा सकती है। एम्स तक में विभाग दर विभाग पद रिक्त पड़े हैं। संस्थाओं में जो डाक्टर पहले पद छोड़ कर जा चुके हैं वे आज तक खाली हैं, समझा जा सकता है कि चिकित्सकों की चिंतनीयस्तर तक कमी का सीधा मतलब है न सिर्फ झोलाछाप चिकित्सकों के प्रोत्साहन को बढ़ावा मिले बल्कि आमजन को भी भगवान भरोसे छोड़ दिया जाए। सरकार द्वारा परिस्थिति के समक्ष हाथ टेक देना और अधिक कष्टदायी है वह मजबूर होकर बताती है कि स्नातकोत्तर की पढ़ाई में पर्याप्त सुविधाऐं प्रदान करने के उपरांत भी चिकित्सक गांव जाने को तैयार नहीं दिखते। लगभग शत-प्रतिशत सफल चिकित्सक शिक्षा के उपरांत सीधे बड़े शहरों की तरफ चल पड़ते हैं। हमारे यहां 273 से अधिक चिकित्सा महाविद्यालय हैं पर वे उतने चिकित्सकों की कमी पूरी करने में असफल हैं जितने की हमें जरूरत है। इसके अलावा चिकित्सालयो में आधारभूत संरचना की हर स्तर पर हर अस्पतलात में बेहद कमी है, मध्यप्रदेश के बडवानी में दो वर्ष पूर्व अस्पताल में हुए राष्ट्रीय दृष्टिहीनता निवारण कार्यक्रम के तहत मोतियांबिंद ऑपरेशन असफल होने से लगभग 65 रोगियों को अपनी आंख गंवानी पड़ी थी। इस भयावह त्रासदी के तीन साल बाद भी वहां ऑपरेशन पुनः प्रांरभ नहीं किए जा सके हैं जबकि पूर्व में प्रतिवर्ष वहां ऐसी तीनहजार शल्यक्रियाऐं की जाती रही हैं।

मध्यप्रदेश के सभी जिलों में लगभग तीन सौ चिकित्सकों की कमी आंकी जा रही है, 70 प्रतिशत एनेस्थीसिस्ट के पद रिक्त हैं, 3266 पद प्रथम श्रेणी के विशेषज्ञों के स्वीकृत हैं जिसमें से 90 प्रतिशत रिक्त हैं, 54 प्रतिशत स्त्रीरोग विशेषज्ञ पद रिक्त हैं, 4860 पद चिकित्सा अधिकारियों के स्वीकृत हैं जिनके 40 प्रतिशत पद खाली हैं यही हाल शिशुरोग विशेषज्ञों का है जहां 40 प्रतिशत पद रिक्त ये रिक्तियां एक नमूना हैं ऐसा हर विभाग और नर्सेज सहित स्टॉफ सहायकों पर भी देखा जा सकता है। प्रशंसनीय स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी देश की प्रगति का पैमाना हो सकता है। प्रतिवर्ष हमारे अस्पतालों का बजट आवश्यकता के अनुपात में बढ़ता रहे संस्थान का बुनियादी ढ़ांचा गतिमान बने, लोगों में सटीक उपचार की आशा का संचार विश्वास में बदले तो इस क्षेत्र की उपलब्धि पर गर्व किया जा सकता है। आशा की जाना चाहिए राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में स्वास्थ्य पर ऐसी कोई भी कोषिष न सिर्फ समाज को निरोगी बनाएगी बल्कि साधन और सुविधाविहीन लोगों में लोकतंत्र के प्रति विश्वास भी पैदा करेगी।

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