जीएसटी का हश्र न हो किसान सम्मान योजना का – सुनील अमर

3:16 pm or February 7, 2019
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जीएसटी का हश्र न हो किसान सम्मान योजना का

  • सुनील अमर

सरकार की नीयत में कोई सन्देह नहीं है। वह चुनाव से पहले किसानों को नकद पैसा देकर खुश करना चाहती है। उसे लगता है कि कर्जमाफी का फन्डा पुराना और प्रतिद्वन्दी काॅंग्रेस पार्टी द्वारा आजमाया और फिर से घोषित किया जा चुका है, इसलिए वह इस बार नये दाॅंव चलना चाहती है। समय काफी कम है इसलिए तत्काल नकदी की एक किश्त देकर। लेकिन पेंच इसमें समय की कमी का ही है। बिना किसी पूर्व तैयारी के इतनी बड़ी योजना को आसन्न चुनाव के पहले लागू कर देना ऐवरेस्ट चढ़ने से कम नहीं। फिर भी सरकार इस ऐवरेस्ट पर चढ़ने को आमादा है क्योंकि रुठे किसानों को मनाने का और कोई उपाय उसे दिख नहीं रहा। देश के कृषि सचिव ने एक अर्जेन्ट पत्र इसी आशय का राज्यों को भेज दिया है कि वे सरकार की मंशा के अनुरुप तत्काल काम शुरु करें। सरकार ने 72000 करोड़ रुपया इस काम के लिए सालाना रखा है जिसमें से रुपया 20000 करोड़ पहली किश्त के तौर पर किसानों को दिया जाना है।

देश में करीब 12 करोड़ ऐसे किसान बताए जा रहे हैं जिन्हें इस योजना में छह हजार रुपया बार्षिक का लाभ तीन किश्तांे में दिया जाना है। इसके लिए राज्यों को अपने किसानों का डाटा बेस बनाकर उसे केन्द्र को देना होगा। इस प्रकार राज्यों के किसानों का डाटा केन्द्र में भी रहेगा। यह एक समयसाध्य कार्य है। चुनाव सन्निकट है इसलिए इसी फरवरी माह में ही सरकार रुपया दो हजार की पहली किश्त किसानों के खाते में डाल देने को सन्नद्ध है। यह रसोेई गैस ग्राहकों को उनके बैंक खाते में दी जा रही प्रतिपूर्ति राशि की प्रक्रिया से काफी भिन्न व कठिन है। इसमें किसानों के भू-स्वामित्व का कम्प्यूटरीकृत आॅंकड़ा, उनका बैंक खाता नम्बर और आधार नम्बर एक साथ जुड़ा होना जरुरी होगा ताकि पात्र किसानों की पहचान कर उनके खाते में रुपया दो हजार की रकम चुनाव पूर्व डाली जा सके। देश में अगस्त 1918 तक सिर्फ दो राज्य तथा तीन केन्द्र शासित राज्य ही ऐसे हैं जिन्होंने अपने यहाॅं का भू-ब्यौरा कम्प्यूटरीकृत कर लिया है। चार राज्य ऐसे हैं जो यह प्रक्रिया पूरी करने की स्थिति में है तथा शेष राज्यों को अभी इस दिशा में काफी कसरत करनी है और लगता नहीं कि चुनाव की अधिसूचना के पूर्व इस दिशा में वे कुछ कर सकेंगें। एक जानकार अधिकारी का कहना है अगर युद्ध स्तर पर कार्य किया जाय तो भी इन राज्यों में छह महीने से पूर्व कुछ कारगर हो पाना मुश्किल है।

एक बड़ी समस्या जमीन के हस्तान्तरण सम्बन्धी मामलों की भी है जिसमें वरासतन, उपहार में मिलने वाली जमीन या बिक्री के कारण मालिकाना हक बदलने से होने वाले परिवर्तन है। देश के आधे से अधिक गाॅवों में यह समस्या बरकरार बतायी जा रही है। भू-मानचित्रीकरण की हालत तो और भी खराब है। आॅंकड़े बताते हैं कि देश के 10 प्रतिशत गाॅवों में ही यह कार्य पूरा हो पाया है। आदिवासी इलाकों में तो और भी ज्यादा परेशानी वाले हालात हैं जहाॅं जमीन पर कब्जा तो बर्षों से है लेकिन राजस्व रिकार्ड में कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार जमीन के एक टुकड़े पर सहखातेदारी भी एक विकट समस्या बनेगी जिसमें लाभार्थी पहचानना कठिन होगा।

पश्चिम बंगाल में वहाॅं की मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी ने काफी पहले से अपने राज्य के किसानों को रुपया पाॅच हजार प्रति हेक्टेअर देने की योजना बना रखी है और वहाॅ जमीन रिकार्ड को कम्प्यूटरीकृत करने का काम चल रहा है लेकिन जैसी की खबर है वहाॅं भी अभी चालिस प्रतिशत से अधिक कार्य नहीं हो सका है। भू-कम्प्यूटरीकरण के मामले में देश के सिर्फ तीन राज्य- कर्नाटक, तेलंगाना और ओडिशा ही अपना कार्य पूरा कर सके हैं।

काफी पहले मोदी सरकार ने किसानों को उर्वरक सब्सिडी सीधे खाते में देने की योजना बनायी थी लेकिन वह भी सारी घोषणाओं की तरह अभी धूल ही फाॅंक रही है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देश के कुछ जिलों में चलायी जा रही इस योजना को इसके अधिकारीगण अभी तक अध्ययन ही कर रहे हैं और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुॅंच पाये हैं। यह योजना अगर अब तक अमली जामा पहन चुकी होती तो सरकार को रुपया छह हजार की यह सहायता राशि किसानों को पहचान कर उनके खाते में देने में जरा आसानी हो जाती। एक और समस्या सहखातेदारों की है जो कि लगभग बीस प्रतिशत बताये जाते हैं। इनको लाभ कैसे मिलेगा? और दूसरी तरफ लगभग साढ़े चैदह करोड़ ऐसे किसान हैं जो बॅटाई पर जमीन लेकर खेती करते हैं। इन्हें तो किसी सूरत में लाभ मिलता दिख नहीं रहा।

दशकों से यह समस्या उठाई जाती रही है कि बॅटाई पर खेती करने वालों को न तो बीज और कीटनाशक आदि पर छूट का लाभ मिल पाता है और न ही आपदा कि स्थितियों में बीमा आदि का, लेकिन सरकार ने आज तक इनको चिन्ह्ति करने की कोई कोशिश ही नहीं की। खेती में लगा हुआ यह एक वास्तविक और बड़ा तबका है जो एकदम से वंचित रह जाएगा। हमेशा रहता भी आया है। खेती-किसानी में लगा हुआ मजदूरों का तबका तो इसके अतिरिक्त है जिसे किसान समझा ही नहीं जाता। इस प्रकार लगता है कि जल्दबाजी में ही काफी कुछ किया जाएगा क्योंकि चुनाव सन्निकट है और अगर ‘सबको नहीं तो जिसको मिल सके उसको तो खुश करके लाभ लिया जाय’ के पैटर्न पर ही काम होगा। आखिर प्रधानमन्त्री ने संसद में कह ही दिया है कि यह तो ट्रेलर मात्र है। मतलब फिल्म खासी लम्बी हो सकती है! वैसे आशंका है कि इस किसान सम्मान योजना का प्रयोग भी आधी रात को संसद बुलाकर घोषित की गई जीएसटी जैसा ही होगा जिसमें आज तक लगातार प्रयोग ही किए जा रहे हैं।

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