कश्मीर से हमें कोई मतलब नहीं, क्या उज्जैन की घटना से संघ परिवार से जुड़े हमलावर यही संदेश देना चाहते थे?

3:50 pm or September 22, 2014
220920148

-एल. एस. हरदेनिया-

ज्जैन की घटना अकेले एक आपराधिक गतिविधि नहीं है, घटना से अनेक संदेश मिलते हैं। विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर कौल ने उज्जैन विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले जम्मू-कश्मीर के बच्चों की सहायता के लिये अपील की थी। वह अपील तथाकथित हिन्दू संगठनों को नहीं भायी। उन्होंने प्रोफेसर कौल के ऊपर वैसे ही अपना गुस्सा निकाला जैसे 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोंडसे ने गांधी जी पर उतारा था। लगातार ये विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के गुंडे, प्रोफेसर कौल को जान से भी मार डालते पर वे बच गये। ये दोनों संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। क्या संघ इन संगठनों के माध्यम से यह चेतावनी देना चाह रहे थे कि हम कश्मीर के बच्चों की कतई सहायता नहीं करेंगे? वे भूखे रहें, उनके ऊपर छत का साया न रहे, वे फीस न चुका सकें, हमें इससे कोई मतलब नहीं। यदि कश्मीर के बच्चों के प्रति हमारा रवैया यही है तो क्या हम उनसे यह कहना चाहते हैं कि हमें इस बात से भी कतई मतलब नहीं कि कश्मीर भारत का हिस्सा बना रहता है या नहीं। इस हमले का मतलब भी यही है। इन असामाजिक तत्वों को इस बात की परवाह नहीं है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह दौड़े-दौड़े कश्मीर गये और वहां के लोगों को भरोसा दिलाया कि हम आपके साथ हैं। पूरा भारत आपके साथ है। ऐसी ही बात मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कही है। परंतु इन संगठनों के लोगों की मजबूरी है, इनका संपूर्ण प्रशिक्षण घृणा पर आधारित है। जिस समय उज्जैन की घटना हुई उस समय उत्तरप्रदेश में भाजपा के बड़े नेता महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, उत्तरप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष और कुछ केन्द्रीय मंत्री लव जिहाद की बात कर रहे थे। लव जिहाद के विरूद्ध महापंचायत का आयोजन कर रहे थे, तो उसके प्रभाव से उज्जैन के विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता कैसे बच सकते थे। हमारे प्रदेश में भी भाजपा के विधायक कह रहे हैं कि गरबा में असामाजिक तत्वों को शामिल न होने दें। स्पष्ट है कि वे मुसलमान युवकों को असामाजिक तत्व कह रहे हैं। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप यह भी हो सकता है कि कल मुसलमान कह सकते हैं कि ताजियों के जुलूस में हिन्दू शामिल नहीं हो सकते या ईद के दिन हिन्दू ईद मुबारक के शब्द अपनी जबान पर नहीं ला सकते।

उज्जैन देश का सर्वश्रेष्ठ पवित्र नगरों में से एक है। उज्जैन की गुरू-शिष्य परंपरा बहुत ही प्राचीन है। कहा जाता है कि उज्जैन के सांदीपनी ऋषि के आश्रम में भगवान कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा हुई थी। उनके साथ उनके भाई बलराम और उनके सखा सुदामा थे। यह वही महान नगर है जिससे विक्रमादित्य महान ने अपने शासन का संचालन किया था। जिस नगर में महान कवि कालिदास ने अपने गीत गाये थे। ऐसी महान नगरी की परंपराओं और उदार चरित्र पर ये असामाजिक तत्व आयेदिन कालिख पोत रहे हैं और आयेदिन गुरूओं के ऊपर हिंसक हमले कर रहे हैं।

आज से 8 वर्ष पूर्व इसी उज्जैन शहर में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या हुई थी। हत्या का आरोप विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर लगा था। उनके ऊपर मुकदमा भी चला था, परंतु सभी आरोप मुक्त हो गये। इसका मुख्य कारण 94 गवाहों द्वारा अपना बयान से मुकर जाना था। यह किसी से छिपा नहीं कि सत्ता के एक बड़े हिस्से ने अपराधियों का साथ दिया। जब आरोपी अदालत द्वारा निर्दोष माने गये तो एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रसन्नता जाहिर की गयी थी। प्रसन्नता जाहिर करते समय मंत्री महोदय यह भूल गये कि यदि अपराधी अदालत से निर्दोष साबित होते हैं तो उसे राज्य सत्ता की असफलता माना जाता है। सत्ता की असफलता पर सत्ता से जुड़े व्यक्ति द्वारा प्रसन्नता जाहिर करना कहां तक उचित था?

प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के अनेक दर्शक थे। उनमें उसी कालेज के शिक्षक व विद्यार्थी भी शामिल थे। परंतु उनमें से एक ने भी अदालत के सामने सच की शपथ खाने के बाद भी सच नहीं बोला। यदि उस घटना के विरोध में उज्जैन के शिक्षक एकजुट हो जाते तो शायद प्रोफेसर कौल पर हमला करने का साहस संघ परिवार के सदस्य नहीं दिखा पाते। एक समाचारपत्र ने यह शंका प्रगट की है कि यदि प्रोफेसर कौल को विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी नहीं बचाते तो शायद उनकी भी हत्या हो जाती। उस दिन विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों ने प्रोफेसर कौल को बाथरूम में बंद कर दिया, इसलिये उनकी जान बच गयी। न सिर्फ उस दिन बाद में भी शिक्षकों और कर्मचारियों ने एकजुटता दिखाई और घटना के विरोध में विश्वविद्यालय बंद रखा। आशा है कि शिक्षकगण इस एकजुटता को कायम रखेंगे। अब देखना यह है कि हमलावरों के साथ ईमानदारी से कानूनी कार्यवाही होती है कि नहीं या 2006 की घटना के आरोपियों के समान इस घटना के आरोपियों को बचाने का प्रयास किया जायेगा। जहां कांग्रेस ने इस घटना की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है वहीं भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस घटना पर अभी (दिनांक 17.09.2014, समय दोपहर 12 बजे) तक टिप्पणी नहीं की है। उज्जैन के विधायक पारस जैन जो एक मंत्री भी हैं ने घटना पर केवल खेद प्रगट किया है और कहा कि जिन्होंने राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान किया वह ठीक नहीं है। इससे ज्यादा हल्का-फुल्का बयान और क्या हो सकता है? मंत्री महोदय ने निंदा करने तक कि आवश्यकता महसूस नहीं की। यहां इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक है कि तथाकथित हिन्दू अतिवादी संगठन प्रायः ऐसी हरकतें करते हैं जो कानून की दृष्टि में अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरूओं का सम्मान करने की शिक्षा देता है। विद्यार्थी परिषद, संघ की शाखा है। विद्यार्थी परिषद शिक्षकों और विद्यार्थियों का मिलाजुला संगठन है। इसके बावजूद विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता आये दिन गुरूओं का अपमान करते हैं। उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के बाद खंडवा में भी एक घटना में वहां के शिक्षकों के मुंह पर कालिख पोतकर उनका अपमान किया गया था। अभी कुछ दिन पूर्व मध्यप्रदेश के एक स्थान पर इसी तरह की घटना का समाचार छपा था। क्या संघ, विद्यार्थी परिषद को यह परामर्श नहीं देता कि वे इस तरह की घटनाओं से बाज आयें और एक अनुशासन की सीमा में रहकर अपना विरोध प्रगट करें? उज्जैन के एक कांग्रेसी नेता पूर्व सांसद प्रेमचन्द गुड्डू ने आरोप लगाया है कि विक्रम विश्वविद्यालय में पुलिस के संरक्षक में हिंसक घटनायें हुईं। इस आरोप की जांच होना चाहिये और घटनाक्रम के दौरान पुलिस की भूमिका क्या थी यह पता लगाना चाहिये।

Tagged with:     , , , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in