आतंकियों को खत्म करने के साथ ही बातचीत का रास्ता ही हल है कश्मीर का – राम पुनियानी

2:54 pm or February 25, 2019
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आतंकियों को खत्म करने के साथ ही बातचीत का रास्ता ही हल है कश्मीर का

– राम पुनियानी

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती आतंकी हमले में 49 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए हैं। इस हमले में शहीदों की संख्या उरी हमले से कहीं ज्यादा थी। यह दोनों ही हमले पाकिस्तान आतंकी गुट जैश-ए-मोहम्मद ने अंजाम दिए और इसकी जिम्मेदारी भी ली।

याद होगा कि मोदी सरकार ने जब नोटबंदी का ऐलान किया था तो दावा किया था कि इससे आतंकवादियों, और खासतौर से कश्मीर में आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, क्योंकि आतंकवादी नकली नोटों के सहारे ही अपनी हरकतों को अंजाम देते हैं। लेकिन पुलवामा हमले से साबित हो गया है कि आतंकी हमलों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ा है।

पुलवामा हमले के बाद एक बार फिर मोदी सरकार बांहें चढ़ाती नजर आ रही है। लेकिन इसी दौरान देश भर में जो कुछ हुआ या हो रहा है, वह चिंताजनक है। कई राज्यों में कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आईं। यहां तक कि मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय ने तो कश्मीरियों के बहिष्कार का आह्वान कर दिया। वहीं बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू कट्टरवादी संगठनों के साथ ही बीजेपी कार्यकर्ता राष्ट्रवादी भावनाएं उकसाने के लिए जगह-जगह ‘भारत माता की जय’ और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाते फिर रहे हैं।‘ लेकिन गंभीर बात यह है कि ये लोग मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ रहे हैं।

ऐसी खबरें आई की कई जगह मुसलमानों को धमकियां दी गईं हैं। जम्मू में तो हालात बेहद खराब हो गए थे और कर्फ्यू के बावजूद कई जगहों से हिंसा की खबरें सामने आई। इन घटनाओं से जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी मुस्लिमों में जबरदस्त खौफ पैदा हुआ। लेकिन इस सबके बीच, यह भी सामने आया कि कई इलाकों में मुसलमानों ने खुद सड़कों पर निकलकर पुलवामा हमले के लिए पाकिस्तान की निंदा की। कई समूहों और संगठनों ने शांति की अपील कीं। लेकिन फिर भी बहुत से ऐसे लोग थे जो सांप्रदायिक आधार पर भावनाएं भड़काने का काम कर रहे थे। इन हालात में आखिर हम कैसे कश्मीर में शांति बहाल कर सकते हैं? हमें उस कारण को तलाशना होगा जिसके चलते कश्मीर जैसा राज्य आतंकवाद के शिकंजे में जकड़ा हुआ है।

दरअसल कश्मीर में आतंकवाद की शुरूआत 1960 के दशक में हुई और 1980 तक इसने विकराल रूप धारण कर लिया। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा यह रहा कि कश्मीर को अलग-थलग माना जाता रहा। लोगों में यह भावना घर कर गई कि उनकी स्वायतता के पर कतरे जा रहे हैं। कश्मीर रियासत का भारत में विलय इसी स्वायत्ता की शर्त के साथ हुआ था। धारा 370 के मुताबिक रक्षा, संचार, मुद्रा और विदेशी मामलों को छोड़कर कश्मीर विधानसभा के पास सारे विशेषाधिकार हैं। आरएसएस, बीजेपी और दूसरे हिंदुवादी संगठन इसी धारा 370 को हटाने को अपना चुनावी मुद्दा बनाते रहे हैं।

कश्मीर रियासत का भारत में विलय होने के बाद से ही सांप्रदायिक गुट मांग करते रहे हैं कि कश्मीर को पूरी तरह भारत में मिलाया जाए। इसी सोच और कट्टरवादी प्रचार के चलते कश्मीरियों में पृथकतावादी भावना पैदा होने लगी। कश्मीर को अलग-थलग किए जाने से तमाम किस्म के तत्व पैदा हुए और अंत में इनका अंजाम आतंकवाद के रूप में सामने आया। पड़ोसी पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाया और आतंकी गुटों को न सिर्फ अपने यहां पनाह दी बल्कि उनकी मदद भी शुरु कर दी।

इस पूरे इलाके में आतंकवाद को बढ़ाने में तेल संसाधनों पर कब्जे और नियंत्रण की राजनीति भी रही। इसकी शुरुआत अमेरिका ने की और उसने पाकिस्तानी मदरसों में अल कायदा जैसे तत्वों को फलने-फूलने में मदद की। ऐसी खबरें हैं कि अमेरिका ने 1980 के दशक में करीब 8000 मिलियन डॉलर खर्च किए और करीब 7000 टन गोला-बारूद मुहैया कराया।

इन आतंकी संगठनों ने अफगानिस्तान में रुसियों के खिलाफ जंग लड़ी, और रूस के वहां से जाने के बाद वे बेरोजगार हो गए तो उन्हें कश्मीर भेज दिया गया, जहां पहले से अशांति ने डेरा जमा रखा था। कश्मीर में इन आतंकियों ने सबसे पहले वहां की संस्कृति कश्मीरियत को रौंदा। यह संस्कृति सदियों से गौतम बुद्ध के मूल्यों, वेदांता के सिद्धांतों और सूफी परंपरा से बनी थी। इस संस्कृति के खत्म होने के साथ ही कश्मीरी समस्या का सांप्रदायीकरण होने लगा और कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

अमेरिकी पैसे पलते-बढ़ते और पाकिस्तान में पनाह लिए हुए आतंकी अब दैत्य बन चुके हैं। पाकिस्तान के नागरिक भी इन दैत्यों का निवाला बनते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो समेत हजारों लोगों की जान इन दैत्यों को हाथों गई है। लेकिन हैरानी है कि इसके बावजूद इन आतंकियों को पाकिस्तानी सेना की शह मिलती रही है।

कश्मीर के हालात को काबू में करने के लिए सबसे पहले समस्या को गहराई से समझना होगा, इसकी जड़ों तक पहुंचना होगा। समझना होगा कि जैश-ए-मोहम्मद स्थानीय युवाओं को किस आधार पर रिझा रहा है। यहां ध्यान देना होगा कि मोदी सरकार के साढ़े चार साल में कश्मीर में न सिर्फ आतंकी घटनाएं बढ़ी हैं, बल्कि स्थानीय युवाओं की आतंकी गुटों में भर्ती और जवानों की मौत का आंकड़ा भी तेज़ी से बढ़ा है।

इंडियास्पेंड के एक विश्लेषण के मुताबिक साल 2017 तक कश्मीर में बीते तीन साल के दौरान 800 के करीब आतंकी वारदातें हुई हैं। 2015 में ऐसी वारदातों की संख्या 208 थी। इन तीन सालों में 744 लोगों की जान गई, जिनमें 471 आतंकी, 201 सुरक्षाकर्मी और 72 आम नागरिक थे। इसमें संदेह नहीं कि घाटी में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के पीछे पाकिस्तान स्थित आतंकी गुटों का बड़ा हाथ रहा है, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि ये सब मोदी सरकार की नीतियों का ही नतीजा है, जिसमें बातचीत के बजाए बुलेट की बात की गई।

और, सबसे बड़ी बात यह कि हमें अपने खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा, ताकि किसी भी आतंकी हरकत को घटित होने से पहले से रोका जा सके। जंग किसी समस्या का समाधान नहीं होती, उसमें भी फौजी को ही भुगतना होता है। इसके अलावा जंग होने से पूरे इलाके में नए किस्म की समस्याएं खड़ी हो सकती है, जिनसे उबरने में बरसों लग जाएंगे। कश्मीर पर ठोस और पड़ोसी के साथ सख्त नीति के साथ ही हमें उन लोगों से बातचीत की शुरुआत करनी होगी जो खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं।

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