‘क्या वे सब ’गद्दार’ हैं?’

4:04 pm or September 22, 2014
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-हरेराम मिश्र –

त्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित भितरगांव कस्बे के बारे में 24 अगस्त 2014 के पहले शायद ही कोई जानता था। प्रदेश में स्थित अन्य कस्बों की तरह यह कस्बा भी एक सामान्य कस्बे जैसा ही था,जहां हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी साथ-साथ बेहद हंसी-खुशी के माहौल में रहती थी। लेकिन,24अगस्त को चोरी की एक मामूली सी घटना के बाद,पूरे इलाके का वातावरण अचानक गर्म हो गया और फिर प्रायोजित तरीके से कस्बे के मुसलमानों के खिलाफ जबरजस्त हिंसा भड़क गई। इस हिंसा तथा घरों में की गई सुनियोजित आगजनी में जहां कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, वहीं दो लोगों को जिंदा जला दिया गया। लेकिन, इस हिंसा के दौरान कस्बे के ही रहने वाले अखिलेश अवस्थी और कमलेश वाजपेयी के परिवार तथा उनके घर के तीन बच्चों दिव्या, काव्या और अभय तथा एक अन्य विकलांग महिला अनुरागिनी ने जो मानवता दिखाई,वह आज पूरे प्रदेश में चर्चा का केन्द्र बन चुकी है।

भितरगांव में घटी यह सांप्रदायिक हिंसा, जिसकी बुनियाद बेहद मामूली और कानून व्यवस्था से संबंधित थी, पर जिस तरह से मुसलमानों के घरों में आगजनी की गई और चुन-चुन कर 24 घरों को निशाना बनाया गया, एक लंबी तैयारी का प्रतिफल थी। इस हिंसा के बाद भले ही तेरह लोगों को जेल भेज दिया गया हो, लेकिन अभी भी यह चिंगारी बुझी नहीं है। इस हिंसा में जिन दोनों हिन्दू परिवारों ने पीडि़त मुसलमानों को बचाया था, जिनके घरों की आग बुझाई थी, आश्रय दिया था, उसने भले ही मानवता के इतिहास में एक और पन्ना जोड़ दिया हो, लेकिन मुसलमानों के इन मददगारों के सामने अब कई गंभीर संकट खड़ा हो गया हैं।

बेशक, ऐसी समस्याएं तो सामने आनी ही थीं। क्योंकि, इन दोनों परिवारों ने प्रचलित धारा के खिलाफ तैरने का साहस किया था। ऐसे फैसले करना बेहद कठिन काम होता है। इस घटना के बाद कस्बे के हिंदू परिवारों द्वारा जहां इन मददगार परिवारों को एक तरह के सामाजिक अलगाव में डालते हुए ’गद्दार’ घोषित किया जा चुका है, वहीं स्कूल जाने वाले ये तीनों बच्चे अपने स्कूल में भी एकदम अलग-थलग पड़ गए हैं। बात केवल इसी कस्बे तक सीमित नही है। आस-पास के अन्य कस्बों के हिंदू परिवार भी अब इन दोनों परिवारों के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं। आज इस समूचे परिवार को सुरक्षा का गंभीर खतरा भी पैदा हो गया है।

अब सबसे पहला सवाल तो यही पैदा होता है कि आखिर ’गद्दार’ शब्द की परिभाषा क्या है? क्या ’मुल्क’ और ’कौम’ के सामान्य हितों के खिलाफ काम करने को ही ’गद्दारी’ कहा जाता है, या फिर कुछ और भी मतलब अब इस षब्द के गढ़ लिए गए हैं? सवाल यह है कि क्या मुसलमानों को सबक सिखाने, मारने, काटने और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की इस असफल और अन्यायी आंधी के साथ खड़ा न होना भी ’गद्दारी’ है? आखिर ऐसी परिभाषाएं गढ़ने के पीछे का मनोविज्ञान क्या है और यह सब किस वर्ग का वर्गहित पूरा करने का जरिया बनता जा रहा है?

आज यह ’गद्दार’ शब्द जिन परिवारों के लिए सामूहिक रूप से उपयोग किया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक तथा समाज के विघटनाकारी स्थिति में पहुंचने का खतरनाक संकेत है। यह ’शब्द’ आज किसी समाज विशेष के खिलाफ समूचे सामाजिक परिवेश में बढ़ रही कटुता को बेनकाब कर देता है। क्या मुश्किल में पड़े किसी मुसलमान की मदद करना अब ’गद्दारी’ की श्रेणी में आने लगा है? अगर यह गद्दारी है तो फिर ’देशभक्ति’ किसे कहते हैं? क्या अब मुसलमानों के खिलाफ ’सुनियोजित हिंसा’ को ही देषभक्ति माना जाएगा? क्या किसी खास जाति को सबक सिखाने के प्रायोजित उन्माद में पागल हुई भीड़ का हिस्सा बनने से इनकार कर देना वाकई ’गद्दारी’ है? क्या मुसलमानों को किसी भी कीमत पर मार डालने, उनके घर जलाने, बलात्कार करने को आमादा भीड़ के खिलाफ डट कर खड़े होना ’गद्दारी’ है? क्या मुसलमान पड़ोसी की मदद करना, उसके जीवन पर आए संकट से उसे बचाना ’गद्दारी’ है। आखिर आज हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहां एक उन्मादी भीड़, जिसका मकसद ही मुसलमानों का खात्मा हो, के साथ खड़ा न होना ’गद्दारी’ है? क्या अब सभ्यता के यही पैमाने माने जाएंगे? क्या मानव के सामाजिक प्राणी होने के नाते दया, करुणा, मदद और सांमजस्य जैसी मानवोचित चीजें इस वक्त में ’फालतू’ हो चुकी हैं?

दरअसल आज हम एक ऐसे नाजुक मोड़ पर खड़े हो गए हैं जहां एक छोटा सा वर्ग एक नई किस्म की ’राष्ट्रीयता’ गढ़ने और उसके मुताबिक ’केवल हिंदू ही स्वीकार्य’ का मनोविज्ञान बनाने की कोशिशों में लगातार जुटा है। यह विचारधारा एक बड़े समाज को ही लगातार सांप्रदायिक बनाने के मिशन पर लगी है। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व वाले भारतीय समाज का खात्मा आज इसके राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति की पहली शर्त है। आज एक ऐसा समाज गढ़ने की कोशिश हो रही है जिसका निवासी मात्र ’साम्प्रदायिक हिन्दू’ होगा और उसके धर्म तथा राजनैतिक विचार दोनों ही ’हिन्दुत्ववादी’ होंगे। ऐसा समाज किसी गैर हिंदू के लिए, उनके मददगारों के लिए कोई ’जगह’ नहीं रखता। शायद यही वजह है कि अगर कोई व्यक्ति या परिवार किसी मुसलमान की मदद करता है, तो उसे ’गद्दार’ जैसे संबोधनों से नवाजा जाता है। यह संभव है कि मुसलमानों के मददगार इन परिवारों को भी कल अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़े। हिंदू फासीवाद कुछ भी कर सकता है। उसके शब्दकोष में इनके जिंदा रहने का कोई अर्थ नही है।

कुल मिलाकर भितरगांव की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि आज भारतीय समाज का भाईचारा, मानवता और मानव को बंधु मानने के सहज गुण का खात्मा तेजी से होता जा रहा है। आज संघ परिवार जिस तरह का समाज गढ़ने की कोशिशों में लगा है यह उसकी एक छोटी सी झलक मात्र है। यह झलक ही रोंगटे खड़ी कर देने वाली है। आखिर क्या हम यूं ही अपने समाज के असहिष्णु होने का तमाशा देखते रहेंगे? इसके खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए आगे आना होगा। अब समय निर्णायक दौर में पहुंच रहा है। हमें किस ओर खड़ा होना है, यही तय करना बाकी है। क्या इसके लिए हम तैयार हैं?

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