सितारों जड़ी एक पेंचदार जासूसी कथा – वीरेन्द्र जैन

1:42 pm or March 12, 2019
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फिल्म समीक्षा के बहाने – फिल्म बदला

सितारों जड़ी एक पेंचदार जासूसी कथा

  • वीरेन्द्र जैन

मैंने महिला विमर्श पर बनी अनेक फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं, इसलिए महिला दिवस [ 8 मार्च 2019] पर रिलीज इस फिल्म को पहले दिन ही देखना चाहा। देखने के बाद पता चला कि महिला दिवस के दिन रिलीज करना केवल एक टोटका ही था अन्यथा इस फिल्म में महिला विमर्श जैसा कुछ भी नहीं है। व्यापारवृत्ति हर उस भावना को भुनाने की कोशिश करती हैं जहाँ समाज भावुक होने लगता है।

जो लोग भी अच्छे जासूसी उपन्यास पढने के शौकीन रहे हैं वे जानते हैं कि पूरा उपन्यास इस जिज्ञासा के कारण पढा जाता है कि अपराधी कौन है और जासूस किस कौशल के सहारे उस अपराधी तक पहुँचता है। इस प्रयास में वह किन किन सामान्य सी दिखने वाली वस्तुओं और घटनाओं से सबूत जुटाता है और फिर किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है यह रोचक ही नहीं होता अपितु पाठकों के विवेक को तराशने का काम भी करता है।

रहिमन देख बढेन खों, लघु न दीजिए डार

जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवार

जासूसी उपन्यासों में भी छोटी छोटी सी घटनाएं बड़े बड़े सूत्र छोड़ जाती हैं। इस फिल्म में भी यही तकनीक अपनायी गयी है। पूरे कथानक का उद्घाटन दर्शकों का थ्रिल खत्म कर सकती हैं इसलिए उसे न प्रकट करना ही उनके हित में है। बहरहाल इतना तो बताया जा सकता है कि यह एक हत्या के रहस्य से जुड़ी कथा है। भले ही इसमें फिल्म ‘पिंक’ जैसी अदालती कार्यवाही नहीं है किंतु उसकी तैयारी के बहाने पक्ष और प्रतिपक्ष के सम्भावित तर्कों पर आरोपी और वकील द्वारा गहराई से विचार किया गया है। जिन अमिताभ बच्चन और तापसी पुन्नू ने पिंक फिल्म में क्रमशः एडवोकेट और आरोपी की भूमिका निभाते हुए अपने अभिनय का लोहा मनवाया था, उसी प्रभाव के सहारे इस फिल्म ने दर्शक जुटाये हैं, पर पिंक की तरह महिलाओं से सम्बन्धित कोई विशेष विषय नहीं उठाया। फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण तापसी पुन्नू का बेदाग सौन्दर्य और अमिताभ बच्चन जैसे कुशल व अनुभवी अभिनेता का अभिनय है। फिल्म की सारी शूटिंग इंगलेंड में हुयी है। यूरोप का आकर्षण उसकी स्वच्छता में भी निहित है। हमारे मनीषियों ने स्वर्ग की जो परिकल्पनाएं की हैं वे सामान्य हिन्दी फिल्मों में साकार होती हुयी सी लगती हैं। यही कारण है कि बहुत सारी कहानियों में स्थान का कोई महत्व न होते हुए भी वे हिल स्टेशनों या यूरोप के देशों में फिल्मायी जाती रही हैं।

फिल्म की कथा एक सफल महिला उद्योगपति के विवाहेतर सम्बन्धों के आधार पर बुनी गयी है। प्रचार की दृष्टि से विदेशी परिवेश में कुछ दैहिक सम्बन्धों के दृश्यों को दर्शाया जा सकता था, किंतु ऐसा नहीं किया गया। हो सकता है कि देश में पुलिस और न्याय व्यवस्था की जो दशा है उसके अनुसार यथार्थवादी फिल्म का कथानक ‘जौली एलएलबी” आदि की तरह बनता इसलिए इसे विदेशी परिवेश के अनुसार बनायी गयी हो। फिल्म में न नृत्य है, न ही गीत हैं जो कि आम हिन्दी फिल्मों को केवल सस्ते मनोरंजन की विषय वस्तु बना कर छोड़ देते हैं।

फिल्म का नाम ‘बदला’ है और उससे हिन्दी की स्टंट दृश्यों से भरपूर एक्शन फिल्मों का भ्रम हो सकता है जबकि यह फिल्म उससे बिल्कुल विपरीत है। फिल्म में आउट डोर शूटिंग न के बराबर है और तर्क वितर्कों के दृश्यांतरण के सहारे रची गयी है जिससे कुरोसोवा की सेवन समुराई की याद आना स्वाभाविक है।

सुजोय घोष की पटकथा और निर्देशन, व राज वसंत के डायलाग अच्छे हैं, किंतु कथा के क्लाइमेक्स में इतने तेज मोड़ हैं कि आम हिन्दी फिल्मों का दर्शक विभूचन में पड़ सकता है, और सम्भव है कि बहुत से दर्शक दृश्यों की जगह कल्पना से कथा समझ सके हों।

अमृता सिंह व तनवीर गनी का अभिनय भी छाप छोड़ता है। अमिताभ बच्चन और तापसी पुन्नू के अभिनय के लिए ही/ भी यह फिल्म देखी जा सकती है।

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