नील गगन चाहिए या खून टपकता आसमान – शब्बीर कादरी

11:13 am or March 23, 2019
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नील गगन चाहिए या खून टपकता आसमान

  • शब्बीर कादरी

प्रतिवर्ष ग्लोबल वार्मिंग, ग्लोबल कूलिंग सहित अनेक भयावह प्राकृतिक पर्यावरणीय परिस्थितियों से उत्पन्न विपदाओं द्वारा कुछ एक देशों को छोड़कर विश्व के लगभग सभी देश न केवल विशाल जन-धन की हानि से ग्रस्त हैं बल्कि इस परिस्थिति से निपटने में अपने आप को असहाय भी समझ रहे हैं।ं देशों की इस भयावह परिस्थिति से सक्षमतापूर्वक नहीं निपटने की कोई प्रभावी योजना की कमी ही इस समस्या को नित्यप्रति और विकराल बना रही है। यह प्रभावी योजना कुछ और नहीं सरकारों द्वारा अपने नागरिकों को व्यापकरूप से पर्यावरण संरक्षण की गंभीरता के प्रति जागरूक बनाने की है, वैसे तो यह काम दशकों पूर्व प्रारंभ किया जा चुका है और हर सरकार के बजट में शामिल भी होता है पर दीर्घकाल उपरात भी इसका एक चैथाई असर भी दिखाई नहीं देता,यह जांचने की कहीं कोई जिम्मेदारी नहीं कि प्रतिवर्ष कितना जल हम संरक्षित कर पाए, कि कितना जंगल हम सघन बना पाए कि कितना धुंआ हम कम उत्सर्जित कर पाए कि कितना शोर हम मचा पाए कि कितना जल हम पाताल में पुनः छोड़ पाए।

पर्यावरण के प्रति गंभीर उदासीनता के चलते ही हमारा हाल यह हुआ है कि अत्यधिक प्रदूषित वायु वाले देशों की सूची में हमारा नम्बर पीछे से तीसरा है, कि पर्यावरण प्रदर्शन इंडेक्स 2018 की रिपोर्ट में विश्वभर में हम पीछे से दूसरे नम्बर पर हैं वह भी कांगो के बाद, कि वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में शामिल 122 देशों की सूची में हम 120वें नम्बर पर हैं। निश्चित ही ये आंकड़े हमारी घोर लापरवाही को उजागर करते हैं। हम व्यवस्था में व्याप्त तमाम तबाही का सारा ठीकरा पूर्ववर्ती सरकारों पर डालकर अपनी पीठ ठोंकते हैं। हमें सीखना चाहिए कि कैसे हाल ही में पर्यावरण की रक्षा के प्रति चेतना जागृत करने की विश्व के एक छोटे देश ने अद्भुत अलख जगाई है। बेल्जियम में भारी संख्या में स्कूली छात्रों ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति बीड़ा उठाया, बच्चों ने वहां स्कूल छोड़कर यह चेतना जागृत करने का प्रयास किया कि जल,जंगल और जमीन सहित शोर, कचरा और परिवहन को समय रहते संभालना होगा अन्यथा इसके दुष्परिणाम बेकाबू तबाही के रूप में कल हमारे सामने होंगे। राजधानी ब्रेसल्स में लगभग 12,500 छात्रों ने कड़ाके की ठंड को भूलाकर पर्यावरण सुरक्षा के ज्वलंत मुददे से वातावरण में गर्मी फूंकने की अद्भुत पहल की। लिएज शहर में भी लगभग 15,000 से अधिक स्कूली बच्चों ने ऐसा ही प्रदर्शन किया और अपनी चिंता की चिंगारी को शोला बनाने का खूबसूरत प्रयास किया। कुछ माह पूर्व हुए इस प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी स्कूली छात्रों ने अपने हाथों में तख्तियां ले रखीं थी जिनमें से एक पर लिखा था नीला आसमान चाहते हो या खून टपकता आसमान ?

आजादी के दौर में देश में हुए अवज्ञा आंदोलन की तर्ज पर हुए ऐसे आंदोलन बेल्जियम में कई हफ्ते होते रहे जो यूथ फाॅर क्लाइमेट संगठन के बेनर तहत हुए जिसमें 35 हजार से अधिक आंदोलनकारी छात्र मैदान में डटे रहे।इन आंदोलित छात्रों ने संकल्प लिया कि वे तब तक अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे जब तक कि वहां की सरकार पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर संकल्प, नियम,नीतियां और योजनाओं को साकार करने के लिए दृढ़ संकल्पित नहीं होती। बच्चों को ऐसे अंादोलन में भागीदार बनता देख शायद ही कोई गंभीर व्यक्ति प्रसन्न हो और और विशेषकर वहां जिस देश में स्कूल से बंक मारना छात्रों के लिए नियम विरूद्ध माना जाता हो। बेल्जियम में स्कूल शिक्षा बच्चों के लिए अनिवार्य है छोटे बच्चे प्रदर्शन इत्यादि में भाग नहीं ले सकते और उच्चतर माध्यमिक स्तर के बच्चे अपने माता-पिता की स्वीकृति के आधार पर ही शिक्षण संस्थान से छुट्टी पा सकते हैं। छात्रों के इस आंदोलन में कई सहभागी, स्कूल की पर्याप्त अनुमति के उपरांत भी इस आंदोलन में भागीदारी निभाते देखे गए, आप स्कूली बच्चों की अपने पर्यावरण के प्रति व्यक्त की गई गंभीर चिंता पर अवज्ञा की पराकाष्ठा की सीमा का अंदाजा लगा सकते है, पर्यावरण के प्रति उनके मूल्यवान समर्पण को आंक सकते हैं। इस घटना में खास बात यह है कि ऐसे प्रदर्शन यूरोप के कई देशों का हिस्सा बन रहे हैं वहां के शहरों में प्रति सप्ताह पर्यावरण की चिंता को लेकर संस्थानों के समक्ष प्रदर्शन किए जाते हैं। मूलरूप से छात्रों के इस नियमित प्रदर्शन का विचार स्वीडन की स्कूली छात्रा ग्रेटा थूनबर्ग से प्रेरित है वे पिछले कई माह से वहां की संसद के समक्ष लगातार प्रति शुक्रवार पर्यावरण संरक्षण के लिए धरना दे रही हैं। जर्मनी में भी स्कूली बच्चों सहित व्यावसायिक प्रतिष्ठिानों में प्रशिक्षण पा रहे प्रशिक्षुओं ने इसी प्रकार के प्रदर्शन के लिए शुक्रवार का दिन नियत किया है जहां हजारों छात्र ऐसे कार्यक्रम में भाग लेते हैं।

इस संबंध में हमारे लिए चिंता, दुख और आत्मग्लानि की स्थिति यह है कि पर्यावरण संरक्षण की ऐसी कोई भी चेतना हमारे यहां दिखाई नहीं देती बावजूद इसके कि हमारे यहां खरबों रूपये संभवतः इस मद में अभी तक व्यय किए जा चुके हैं, यद्यपि हमारे यहां राजनीति सदैव चरम पर रहती है। ग्रीनपीस इंडिया ने हाल ही में अपनी वार्षिक रिपोर्ट एयरोपोक्लिएस का तीसरा संस्करण जारी किया है जिसने हमारे शहरों की हवा का हाल बयान किया गया है, इसके अनुसार वर्ष 2017 में देश के 313 शहरों की वायु में पीएम-10 की स्थिति के मान से विश्लेषित अध्ययन बताया गया है। अफसोस यह न केवल एक छोटी खबर बनी बल्कि इसने किसी को भी द्रवित नहीं किया। हमारी नदियां रोज दम तोड़ रही हैं शहरों से ग्रीनरी मिटाई जा रही है, प्रमुख ही नहीं सामान्य शहरों में भी पेयजल सप्ताह में बारी-बारी से दिया जा रहा है, ध्वनि की तीव्रता, हवा की सांद्रता और बढ़ती आबादी की गुत्थम-गुत्था होती जीवनशैली रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है फिर भी कहीं कोई ऐसी चिंता है जो हमारे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति हमें चेताती हो शायद नहीं क्योंकि वर्तमान राजनीति और राजनीतिबाज ही हमारी हर समस्या का निवारण करेंगे हम ऐसा विश्वास कर बैठे हैं !

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