लोकतंत्र के उल्टे कदम – वीरेन्द्र जैन

4:51 pm or April 4, 2019
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लोकतंत्र के उल्टे कदम

  • वीरेन्द्र जैन

लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है, बशर्ते वह अपनी मूल भावना के अन्दर काम कर पा रही हो। हमारे देश में इस के नाम पर जैसे जैसे तमाशे चल रहे हैं, उसको देख कर लगता है कि विविधिता से भरे हुए हमारे समाज के अनेक भाग इस प्रणाली के महत्व और उसके प्रयोग को नहीं समझते। जो समझते हैं वे अलपमत में हैं और बहुमत के सामने पिछड़ जाते हैं।

इन दिनों आमचुनाव चल रहे हैं और कांग्रेस द्वारा अपनी पुरानी भूमिका खो देने के बाद कोई भी एक दल राष्ट्रव्यापी नहीं कहा जा सकता। जो कभी राष्ट्रीय दल रहे वे भी क्षेत्रीय दलों में बदल चुके हैं, उनके मुद्दे और घोषणाएं भी उनके प्रभावक्षेत्र अनुसार, राज्यवार बदल जाती हैं या वे विवादित विषयों पर चुप लगा जाते हैं।

लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुयी सरकार होने की शेखी बघारने वाले दल अपने विचार को मिली सामाजिक स्वीकृतियों के कारण सत्ता में नहीं होते अपितु एक बड़े वर्ग को भावनात्मक रूप से ठग कर सत्ता में आ जाते हैं। भले ही उनके थैले में एक अच्छा सा घोषणा पत्र घुसा हुआ सा मिल सकता है किंतु उसका उनको प्राप्त समर्थन से कोई सम्बन्ध नहीं होता। दिन दहाड़े हत्या, अपहरण, और गम्भीर अपराध करने वाले व्यक्ति भी न केवल अच्छा खासा समर्थन जुटा लेते हैं, पार्टी टिकिट हथिया लेते हैं, अपितु ज्यादातर जीत भी जाते हैं। ऐसी जीत से लोकतंत्र प्रणाली पर विश्वास टूटता है, और जंगली शासन तंत्र पर भरोसा बढता है। जैसे न्यायप्रणाली में होने वाली देरी, और बाद में पैसे वालों द्वारा न्यायिक छिद्रों से निकल भागने में सफल हो जाने का परिणाम यह होता है कि गाँवों, कस्बों के लोग बहुत सारे मामलों में पुलिस के पास जाने की जगह स्थानीय बाहुबलियों का सहारा लेते हैं और बदले में अपना सारा विवेक उसके यहाँ गिरवी रख आते हैं। यही कारण होता है कि ज्यादातर क्षेत्रों में नेता दल बदलते रहते हैं पर उनको मिलने वाला समर्थन नहीं बदलता। राजनेता के यहाँ गिरवी रखा समर्थन नहीं बदलता। इसी आधार पर विश्लेषक विश्वास के साथ यह घोषणा करते रहते हैं कि कब कहाँ से कौन जीत जायेगा।

हम जिस तरह से पीछे लौट कर जा रहे हैं उसे देखते हुए इसे लोकतंत्र का विकास नहीं कहा जा सकता। अगर शेषन जैसे चुनाव आयुक्त, एसोशिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म जैसी संस्थाएं और जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले नहीं आते तो हमारे देश के राजनीतिक दल और स्वार्थी नेता लोकतंत्र को समाप्त कर चुके होते। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त लोगों ने जो सुधार करवाये हैं उनसे मुख्य धारा के दल सबसे अधिक प्रभावित हुये हैं, और इनमें से किसी ने भी मुक्त कंठ से इन सुधारों की प्रशंसा नहीं की। अभी भी ढेरों सुधार अपेक्षित हैं। चुने गये जनप्रतिनिधियों पर चल रहे आपराधिक प्रकरणों को विशेष न्यायालयों के माध्यम से तय समय सीमा में निबटाने का वादा स्वयं नरेन्द्र मोदी ने पिछले आम चुनाव के प्रचार के दौरान किया था। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने उस वादे को कभी याद नहीं किया।

खेद का विषय है कि हम पुराने राजघरानों का प्रभाव उनकी कथित प्रजा के मन से घटाने में सफल नहीं हो सके हैं, जबकि अधिकांश अच्छे शासक नहीं थे। उनके प्रिवीपर्स व विशेषाधिकार समाप्त करने का जो फैसला किसी समय श्रीमती इन्दिरा गाँधी को लेना पड़ा था उसकी प्रतिक्रिया में निर्जीव हो चुके राज परिवार फिर से अंगड़ाई लेकर उठ खड़े हुए और उन्होंने सुविधानुसार अपने अपने राजनीतिक दल चुन लिये और वहाँ दबाव बना लिये। आज तीन सौ के करीब ऐसे राजपरिवारों में से शायद ही कोई ऐसा हो जो किसी न किसी स्तर का जनप्रतिनिधित्व न कर रहा हो। देखा देखी उनके रिश्तेदारों ने भी उसी हैसियत के अनुसार अपने लिए जगहें बना ली हैं। मोटा मोटी वे आज फिर शासक हैं। रोचक यह है कि चुन कर आने का तर्क देने वाले ये लोग अपने पूर्व राजक्षेत्र से अलग चुनाव के मैदान में उतरने पर अपना प्रभाव खो बैठते हैं। जब 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी के विरुद्ध विजयाराजे सिन्धिया को खड़ा किया गया था तो अपने क्षेत्र में सदैव जीतने वाली श्रीमती सिन्धिया बुरी तरह पराजित हो गयी थीं।

जातिविहीन समाज की स्थापना और जातियों में बँटे समाज में सामाजिक समरसता लाने के लिए दलितों और आदिवसियों के लिए आरक्षण जरूरी था और अब तक जरूरी बना हुआ है। पर यह भी विचारणीय है कि इससे हमने लोकतांत्रिक भावना का कितना नुकसान किया है। प्रारम्भिक आम चुनावों में सत्तारूढ दल को राजनीतिक काम किये बिना ही एक सुनिश्चित संख्या में सदस्य बैठे ठाले मिल जाते रहे जो अपने अनुभव, ज्ञान और शिक्षा की कमी से हर प्रस्ताव पर हाथ उठाने का काम करते रहे। उन्होंने लम्बे समय तक अपने वर्ग के हितों के लिए भी सदन में और पार्टी के अन्दर प्रभावी मांगें नहीं उठायीं। क्या यह विचारणीय नहीं है कि श्री जगजीवन राम जैसे कुछ योग्य प्रतिनिधि भी सदैव आरक्षित सीट से चुनाव लड़ते रहे। क्या इतना संशोधन भी नहीं हो सकता कि आरक्षित सीट से चुनाव लड़ कर जीतने का अवसर केवल एक बार मिले। दूसरी बार यदि उसी वर्ग के दूसरे व्यक्ति को अवसर मिलेगा तो आरक्षण के आधार पर सामाजिक उत्थान का उद्देश्य अधिक प्रभावकारी होगा। सम्बन्धित को दूसरा चुनाव सामान्य सीट से लड़ना चाहिए। विशेष प्रतिभाशालियों को राज्यसभा में भेजा जा सकता है। विडम्बना यह है कि आज भी आरक्षित वर्ग का कोई नेता सामान्य सीट से नहीं लड़ना चाहता और अपवाद स्वरूप लड़ता भी है तो जीत नहीं पाता।

पिछले दिनों हमने देखा कि भाजपा ने जिस तरह से अनेक दलों में रह कर और सांसद रहने के बाद भी अपनी पहचान केवल अभिनेत्री की तरह सुरक्षित रखने वाली जयप्रदा को पार्टी ज्वाइन करने के दिन ही उम्मीदवार घोषित कर दिया तो दूसरी ओर काँग्रेस ने उर्मिला मातोंडकर को भी उसी दिन उम्मीदवार बना दिया वह प्रमुख दलों में पार्टी लोकतंत्र के अनुपस्थित होने का संकेत देता है। क्या दलों में उम्मीदवारी के लिए तयशुदा और घोषित मापदण्ड नहीं होने चाहिए? क्या चयन समिति का चयन लोकतांत्रिक ढंग से नहीं होना चाहिए?

पिछले दिनों भाजपा में टिकिट याचना करते हुए उम्रदराज नेताओं का एक वीडियो सामने आया जिसमें लाइन लगाये हुये नेता अपनी बारी आने पर इकलौती कुर्सी पर बैठे मोदी द्वारा नामित अध्यक्ष अमित शाह को फाइल थमाते और पैर [घुटना] छूकर जाते हुए दिखाये गये हैं। बहुजन समाज पार्टी और कुछ हद तक काँग्रेस में भी ऐसे दृश्य देखे जाते हैं। यह घोर अलोकतांत्रिक, सामंती और अवसरवादी प्रवृत्ति है, अगर यह केवल श्रद्धा होती तो ऐसे लोग क्षणों में ही दल नहीं बदल लेते। ऐसी ही अनेक प्रवृत्तियां जो लोकतांत्रिक भावना को कमजोर करती हैं, घटने की जगह बढती जा रही हैं, और इन्हें समाप्त करने के लिए कहीं कोई प्रयास नहीं हो रहे।

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