राजधानी से दिग्गी राजा – जावेद अनीस

7:23 pm or April 6, 2019
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राजधानी से दिग्गी राजा

  • जावेद अनीस

लम्बे समय से भोपाल की लोकसभा सीट कांग्रेस के लिये कठिन बनी रही है जबकि भाजपा के लिये यह  देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों में से एक है. यहां करीब 35 सालों से कांग्रेस जीत दर्ज नहीं करा पायी है लेकिन इस बार कांग्रेस ने यहां से अपना कठिन प्रत्याशी उतार कर इसे हॉट सीट बना दिया है. इस बार भोपाल लोकसभा सीट के लिये उसने मध्यप्रदेश के अपने सबसे चर्चित और जमीनी नेता दिग्विजय सिंह को मैदान में उतार दिया है जिससे मुकाबला टक्कर का हो गया है. दिग्गी राजा के सामने चुनौती भाजपा के इस मजबूत किले को भेदने की हैं और वे इसके लिये पूरी तरह से मैदान में उतर भी चुके हैं. कांग्रेस के इस दावं से भाजपा और संघ हैरान हैं और उन्हें दिग्विजय सिंह के मुकाबले प्रत्याशी तय करने में परेशानी हो रही है.

भोपाल लोकसभा सीट पर भाजपा का वर्चस्व काफी समय से है. कांग्रेस ने यहां अपना आखिरी संसदीय चुनाव 1984 में जीता था जिसके बाद लगातार आठ बार से यह सीट भाजपा के खाते में है. इस बीच कांग्रेस यहां से आरिफ बेग से लेकर मंसूर अली खां पटौदी और सुरेश पचौरी को आजमा कर देख चुकी है लेकिन उसे सफलता नहीं मिली. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के आलोक संजर ने कांग्रेस के उम्मीदवार पी. सी. शर्मा को 3 लाख 70 हजार वोटों के अंतर से हराया था लेकिन इस बार कांग्रेस ने मजबूत चुनौती पेश की है. दिग्विजय सिंह बहुत गंभीरता के साथ चुनाव लड़ते हुये दिखाई पड़ रहे हैं. उम्मीदवारी की घोषण के साथ ही उन्होंने भोपाल में डेरा डाल दिया है.

दिग्विजय सिंह बहुत बेबाकी और खुले तौर पर संघ को निशाने पर लेते रहे हैं और इसके बदले भाजपा और संघ के लोगों द्वारा उन्हें हिंदू विरोधी के रूप में पेश किया जाता है. अब इस चुनाव ने दौरान दिग्विजय सिंह की इस छवि को प्रमुखता के साथ उभारने की सम्भावना है. इसीलिए कांग्रेस और दिग्विजय सिंह की रणनीति पहले से ही खुद को हिन्दूवादी नेता के तौर पर पेश करने की है.

शायद इसलिए कमलनाथ सरकार के वरिष्ठ मंत्री आरिफ अकील दिग्विजय सिंह को सबसे बड़ा हिंदूवादी बताने से चूक नहीं रहे हैं. उन्होंने कहा है कि ‘दिग्विजय सिंह नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं, नियमित पूजा-पाठ,उपवास करते हैं और उनके राघौगढ़ किले में 7 मंदिर हैं अगर उनसे बड़ा हिंदूवादी कोई हो तो मैदान में आ जाये.’ उनके बेटे जयवर्धन सिंह ने भी अपने पिता को सच्चा हिंदूवादी बताते हुये कहा है कि  ‘राघवगढ़ में हमारे घर में 300 सालों से नौ मंदिरों में पूजा हो रही है.’ दिग्विजय सिंह भी अपने हिन्दू पहचान को सामने रखते हुये मंदिरों और संतों-मुनियों के चक्कर लगा रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया है कि अगर संघ हिन्दुओं का संगठन है तो वह भी हिन्दू हैं फिर उनसे बैर क्यों?

हालांकि मंदिरों के साथ वे दरगाहों के भी चक्कर लगा रहे हैं और भोपाल के गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं. गौरतलब है कि भोपाल लोकसभा सीट के अच्छे-खासे मुस्लिम मतदाता हैं.

भोपाल लोकसभा सीट के अंतगत आठ विधानसभा क्षेत्र आते हैं, 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इनमें से 3 सीटों (भोपाल उत्तर, भोपाल मध्य और भोपाल दक्षिण-पश्चिम) पर जीत दर्ज की थी जबकि भाजपा के खाते में 5 सीटें (बैरसिया, हुजूर, नरेला, गोविंदपुरा और सीहोर) आयी थीं. जाहिर है चंद महीनों पहले हुये विधानसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा यहां अपना वर्चस्व बनाये रखने में कामयाब रही है हालांकि इसमें कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा है, 2013 के विधानसभा में कांग्रेस इनमें से केवल एक सीट पर ही जीत दर्ज करने में कामयाब हुयी थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस उम्मीदवार को करीब तीन लाख सत्तर हजार से अधिक वोटों से हराया था जबकि 2018 के विधानसभा में वोटों का यह अंतर करीब 63 हजार वोटों का ही रह गया है.

विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश के सियासी समीकरण बदल चुके हैं. अब चूंकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गयी है और भोपाल से उसके तीन विधयकों में से दो आरिफ अकील और पीसी शर्मा कमलनाथ सरकार में मंत्री हैं. ऐसे में कांग्रेस इस बार से यहां अपनी अच्छी संभावनायें देख रही है.

दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस के इस दावं से पेशो-पेश में है. भाजपा कांग्रेस के इस मुश्किल प्रत्याशी से परेशान लग रही है, दिग्गी राजा के मैदान में आने के बाद से अब यह सीट भाजपा के लिये अजेय नहीं रह गया है. सबको पता है कि दिग्विजय सिंह ने भले ही पंद्रह सालों से चुनाव ना लड़ा हो लेकिन इस दौरान वे राजनीतिक रूप से पूरी तरह से सक्रिय रहे हैं और उनकी जमीनी पकड़ कायम है. विधानसभा चुनाव के दौरान परदे के पीछे वे प्रमुख रणनीतिकार थे और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में लाने में उनकी प्रमुख भूमिका मनाई जाती है.

ऐसे में उनके खिलाफ भाजपा की तरह से किसी मुश्किल उम्मीदवार की सम्भावना जताई जा रही है जिसमें शिवराज सिंह चौहान से लेकर साधवी प्रज्ञा का नाम शामिल है. तमाम संभावनाओं के बीच प्रदेश भाजपा के एक नेता इंद्रेश गजभिए द्वारा अमित शाह को लिखी गई एक चिट्ठी की भी काफी चर्चा है जिसमें उन्होंने दिग्विजय के मुकाबले शिवराज को कमजोर प्रत्याशी बताते हुये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहां से चुनाव लड़ाये जाने की मांग की है. बहरहाल भाजपा की तरफ से किसी हिंदू ब्रांड नेता के उतारे जाने की संभावना है जिससे इसे अलग रूप दिया जा सके .

दिग्विजय सिंह करीब डेढ़ दशक बाद चुनावी मैदान में उतरे हैं. इससे पहले 2003 उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए राघोगढ़ से विधानसभा का चुनाव लड़ा था जिसमें उन्होंने शिवराजसिंह चौहान को हराया था लेकिन इसी के साथ ही उमा भारती ने उन्हें मध्यप्रदेश की सत्ता से बाहर भी कर दिया था. बहरहाल उस समय राघवगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान दिग्विजय सिंह शिवराज को बलि का बकरा कहकर पुकारते थे. अब कुछ लोग उनके बारे में भी यही बात दोहरा रहे हैं. दरअसल दिग्विजय सिंह अपनी परम्परागत सीट  राजगढ़ से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन कमलनाथ द्वारा उनसे ऐसे किसी कठिन सीट से चुनाव लड़ने की “अपील” की गयी थी जहां कांग्रेस लम्बे समय से जीत नहीं दर्ज कर सकी है. जिसे थोड़ा आनाकानी के बाद दिग्विजय सिंह द्वारा स्वीकार कर लिया गया. टिकट मिलने की घोषणा के बाद उन्होंने कमलनाथ और राहुल गांधी का आभार जताते हुये कहा कि ‘मैं हर तरह की चुनौतियां स्वीकार करने को तैयार हूँ, …यह चुनाव दिग्विजय सिंह नहीं कांग्रेस पार्टी लड़ रही है.’

जीवन की तरह राजनीति संभावनाओं और परिस्थितियों का खेल है ऐसे में यह कहना मुश्किल हैं कि इस चुनाव की हार या जीत का दिग्विजय सिंह के सियासी कैरियर पर क्या प्रभाव पड़ेगा. लेकिन भोपाल से उनकी उम्मीदवारी घोषित होने पर उनके बेटे जयवर्धन सिंह ने यह शेर ट्वीट किया था

अगर फलक को जिद है, बिजलियां गिराने की

तो हमें भी ज़िद है,वहीं पर आशियां बनाने की.”

इन दो पंक्तियों के आखिर में उन्होंने लिखा था, “सर्वत्र दिग्विजय, सर्वदा दिग्विजय”. जाहिर है नतीजा चाहे जो हो दिग्विजय सिंह के दावेदारी ने भोपाल को उन चुनिन्दा हाई प्रोफाइल सीटों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है जिसपर पूरे देश की निगाहें होंगीं.

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