चुनाव की सरगर्मी और आईपीएल की जंग – डॉ. महेश परिमल

6:46 pm or April 9, 2019
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चुनाव की सरगर्मी और आईपीएल की जंग

  • डॉ. महेश परिमल

देश में भले ही चुनावी लहर जोरों की चल रही हो, पर हममें से बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें चुनाव अच्छा नहीं लगता। उन्हें तो इन दिनों आईपीएल का बुखार चढ़ा हुआ है। वे नेताओं के झूठे आश्वासनों में नहीं उलझते, उन्हें तो चाहिए खिलाड़ी की स्पिरीट से छलकता हुआ मैच, जिसमें वह पूरे जोश-खरोश के साथ अनजाने में शामिल हो जाता है। इस भरी गर्मी में आईपीएल का होना इस बात का प्रतीक है कि हमें टीवी नहीं छोड़ना है बस…। कई बार कमजोर फील्डिंग, कमजोर विकेट कीपिंग और कमजोर बालिंग हार के लिए जिम्मेदार होती है, तो कई बार कई टीमें शो-बाजी और दर्शकों में छा जाने की इच्छा के कारण हार जाती हैं। जिस तरह से हर जीते हुए मैच की प्रशंसा होती है, वैसे ही यदि चुनाव को एक उत्सव का रूप देने के लिए मतदाताओं की भी प्रशंसा होनी चाहिए।

वैसे लोगों के पास पूरा दिन टीवी के सामने बैठने का समय नहीं होता, पर शाम को टीवी पर मैच देखने का समय हर कोई निकाल ही रहा है। दूसरी ओर नेताओं के जुमले भी सुनने को मिल जाते हैं। कई लोग इसकी प्रशंसा भी करते हैं, तो कई लोग के लिए यह एकदम ही बेमतलब है। जिस तरह से एक कमजोर बाल पर लगने वाले छक्के पर लोग अपनी टिप्पणी देने से नहीं चूकते, वैसे ही नेताओं के कमजोर बयान पर भी जोरदार प्रहार करते हैं। क्रिकेट और राजनीति ऐसा खेल है, जिसमें कमजोर लोग हमेशा साफ दिखाई देने लगते हैं। उधर दर्शक और इधर मतदाता बरसों से ठगे जा रहे हैं। आईपीएल के पीछे व्यापार का गणित हर किसी को समझ में नहीं आता। ठीक उसी तरह राजनीति में चुनाव जीतने के बाद नेताओं की बढ़ती सम्पत्ति किसी को नजर नहीं आती। करोड़ों लोग आईपीएल की जंग देख रहे हैं, तो इधर करोड़ों मतदाता भी चुनाव के साथ जुड़कर खुद को देशभक्त मान रहे हैं। अब प्रजा समझदार हो गई है, उसे अच्छी तरह से पता है कि कब ताली बजानी है और कब चीखना है।

आईपीएल की हर टीम में धुआंधार बल्लेबाज हैं, तो राजनीति के हर दल में एक न एक भाषणबाज है। कई नेता क्राउड पुलर होते हैं, तो कई नेताओं को सुनने कोई नहीं जाता। जब किसी चलताऊ नेता की सभा में भीड़ देखते हैं, तो लोग झट से कह देते हैं कि सुनने वालों को पैसे देकर बटोरा गया है। आईपीएल में भी सट्टेबाज होते हैं। चुनाव में भी कई सट्टेबाज होते हैं। आईपीएल में जब कोई टीम जीतते-जीतते हारने लगती है, तो लोग तुरंत समझ जाते हैं कि ये मामला तो फिक्सिंग का है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही क्षेत्र एग्रेसिव है, दोनों में लोग पूजे जाते हैं। जिस तरह से क्रिकेट में सिक्स मारने वाले लोगों को सर-आंखों में बसाते हैं, ठीक उसी तरह राजनीति में एग्रेसिव भाषण करने वाले का लोग सम्मान करते हैं। यही नहीं, जो कानून की धज्जियां उड़ाता है, सरकार के खिलाफ धरने पर बैठता है और ताल ठोंककर कहता है कि हां मैं अराजकवादी हूं, ऐसा व्यक्ति अरविंद केजरीवाल आज दिल्ली का मुख्यमंत्री है। यही हाल लाेकसभा चुनाव लड़ने वाले कन्हैया कुमार का है।

भारतीय राजनीति इस समय अग्नि की कसौटी से गुजर रही है। पूरा देश एक नई सरकार को चुनने जा रहा है। वर्तमान मोदी सरकार रिपीट होगी या फिर विपक्षी पार्टियां अपना दम-खम बता सकती है, इसके लिए हम सबको 23 मई तक इंतजार करना होगा। आईपीएल का फाइनल मैच 12 मई को फिरोजशाह कोटला के मैदान में खेला जाएगा। बहरहाल आईपीएल की जंग हमें आनंद दिला रही है, तो लोकसभा की जंग देश के विकास की इच्छा रखने वाले लोगों को चुनकर शासन सौंपती है। आईपीएल की जंग और राजनीति की जंग से लोगों को किसी तरह का सीधा लाभ नहीं होता। फिर भी लोग इससे जुड़ ही जाते हैं। मानों यह खुद की जंग हो। कई लोग राजनीति में बिलकुल नहीं पड़ते, तो कई लोगों को खिलाड़ियों के उत्साह, उमंग, जोश को छलकाते मैच अच्छे लगते हैं। नेताओं में खिलाड़ियों की तरह कोई स्पीरिट देखने को नहीं मिलती। यहां तो 44 सीटों वाला दल 300 सीटों वाले दल की अपेक्षा अधिक होशियार है, यह बताने की कोशिश कर रहा है।

आईपीएल की जंग में महेंद्र सिंह धोनी जैसा केप्टन कूल दिखाई देता है, पर देश की राजनीति में ऐसे नेता के दर्शन होना मुश्किल है। अधिकांश नेता उत्तेजित होकर सामने वाले का अपमान करने का काेई भी मौका नहीं चूकते। इन दोनों ही क्षेत्रों से हमें यह सीखना हे कि जीवन में उतावलापन दिखाने से कुछ नहीं होता। धीरज मन के अंदर होना चाहिए। यह अनुभव से ही सीखने को मिलता है। राजनीति में तात्कालिक कोई फल नहीं मिलता, ऐसा ही क्रिकेट में भी देखने को मिलता है। दोनों ही अनुभवों के खेल हैं। दोनों में प्लानिंग की आवश्यकता होती है। इन दिनों राेज दिखने वाले इस गेम से भी लोगों को कुछ न कुछ सीखना चाहिए। क्योंकि लोग भी रोज संघर्ष करते हैं और अनेक चुनौतियाें का सामना करते हैं।

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