वाचालों के कटु वचन से देश आहत – डॉ. महेश परिमल

4:36 pm or April 20, 2019
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वाचालों के कटु वचन से देश आहत

  • डॉ. महेश परिमल

इन दिनों हम सब लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव मना रहे हैं। देखते ही देखते देश के चुनाव शालीन से आक्रामक होने लगे हैं। कहां तो हमने उन्मुक्त चुनाव की अपेक्षा पाल रखी थी और कहां अब चुनाव फ्री स्टाइल कुश्ती की तरह लड़े जा रहे हैं। चुनावी योद्धा आपस में मारामारी नहीं करते, पर जिस तरह से शब्दों की मिसाइल का उपयोग करते हैं, उससे सामने वाला चारों खाने चित्त हो जाता है। शाब्दिक युद्ध इस समय अपने चरम पर है। कहने को चुनाव आयोग भी है, पर वह बिना दांत और नाखून का शेर है, जो केवल नोटिस ही दे सकता है। यदि यह आयोग सख्त हो जाए, तो न जाने कितन चुनावी योद्धा धराशायी हो जाएं। वास्तव में हमारे पीएम जिस तरह से कांग्रेस के लिए सख्त भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, इससे अन्य भाजपाइयों को भी ऊर्जा मिल जाती है। उधर राहुल गांधी भी जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, उससे कांग्रेसियों में एक अजीब-सा उत्साह देखा जा रहा है। इस उत्साह में वे अनर्गल बोलने लगे हैं। यदि ये दोनों नेता अपनी वाणी पर संयम रखें, तो संभव है, दूसरे लोग उनसे प्रेरणा लेकर आत्मसंयम का मार्ग अपना लें।

लोकतंत्र में हर किसी को काफी छूट मिलती है। पर इसका सबसे अधिक उपयोग-दुरुपयोग चुनाव में खड़े प्रत्याशी ही करते हैं। एक तो इनकी मानसिकता ही कुंठित होती है। वे बार-बार चुनाव में खड़े होकर काफी अनुभवी हो जाते हैं। उन्हें पता चल जाता है कि पब्लिक किस तरह की भाषा से रिझती है, और कैसे नाराज होती है। आजम खान ऐसे ही नेता हैं। जिस तरह से क्रिकेट टीम में विकेटकीपर और स्लीप में फिल्डिंग करने वाले महत्वपूर्ण होते हैं। वैसे भी फास्ट बॉलर और स्पीनर के बिना टीम अधूरी लगती है। ऐसा ही राजनीति में भी होता है। हर पार्टी में ऐसे लोगों की ही इज्जत होती है, तो समय आने पर ऊंटपटांग बयान देकर पब्लिक को कुछ समय के लिए अपना बना लेते हैं। टिकट भी ऐसे ही लोगों को मिलता है। सम्मान भी ऐसे ही लोगों का होता है। शालीन रहने और बोलने वालों को कोई नहीं पूछता। अभी तक ऐसी किसी संस्था के बारे में नहीं सुना, जो नेताओं को शालीन भाषा का प्रशिक्षण दे। यहां हरक कोई सत्ता पर काबिज होने आया है, न कि आचार संहिता का पालन करने।

हमारे देश के कई नेता ऐसे भी हैं, जो जैसे ही मंच पर आते हैं, वैसे ही तालियां बजने लगती हैं, सबको पता होता है कि अब ये नेता कुछ तो ऐसा बोल ही जाएंगे, जिससे कुछ न कुछ बवाल होगा ही। ऐसे उम्मीदवार खुद ही कहते हैं कि मुझे रिस्पांस देने वाली आडियंस अच्छी लगती है। ये लोग अपने भाषण में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाते हैं। फिर कहते हैं कि आप लोगों में दम नहीं है, जरा जोर से बोलो, ताकि आपकी आवाज लाहौर तक पहुंच जाए। ऐसे में दूसरी बार का नारा बहुत ही ऊंचे स्वर में बोला जाता है। नेता इसे ही बार-बार आजमाते हैं। आजम खान अपने प्रतिद्वंद्वी को अनाप-शनाप बोलें, तो इसमें कोई नई बात नहीं है, क्योंकि आजम खान खुद ही थ्रो बॉलर हैं। उनसे किसी तरह से शालीन भाषा की अपेक्षा करना बेकार है। शायद उन्हें अच्छा बोलना आता ही नहीं है। वे मुलायम सिंह परिवार के खास हैं। उनसे तो सौम्य भाषा की अपेक्षा करना बेमानी है। साक्षी महाराज, गिरीराज किशोर, नवजोत सिंह सिद्धू, शत्रुघ्न सिन्हा ऐसे नेता हैं, राजनीति में सक्रिय इसीलिए हो पाए, क्योंकि ये अपने विरोधियों पर जो शाब्दिक प्रहार करते हैं, उससे वह चारों खाने चित्त हो जाता है। इस समय जो माहौल है, उससे प्रभावित होकर शिष्ट भाषा का प्रयोग करने वाली मेनका गांधी भी मतदाताओं को धमकी देने लगी। वे कहती हैं कि मैं तो जीतूंगी ही, पर मतगणना के समय यह पता चल जाएगा कि किस गांव के लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया है, तो मैं उनका काम नहीं करूंगी। इस विवाद को देखकर हेमामालिनी सयानी बन गई, उनका कहना है कि मुझे तो कोई वोट दे या न दे, मेरे लिए तो सभी बराबर हैं। पर हां, उनके साथ उनके पतिदेव ने चुटकी अवश्य ले ली कि अगर हेमा जी को वोट नहीं दिया, तो मैं टंकी पर चढ़ जाऊंगा। मेनका गांधी धमकी दे सकती हैं, इस पर विश्वास करना ही कठिन है, पर माहौल ही ऐसा बन गया है कि आसानी से कही जाने वाली सीधी-सच्ची बात किसी के पल्ले ही नहीं पड़ती। हर कोई माहौल का शिकार बन रहा है।

वास्तविकता यह है कि सांसद के रूप में मिलने वाले शाही ठाठ और पेंशन जैसी सुविधाओं ने लोगों को राजनीति के इस धंधे की ओर आकर्षित किया है। चुनाव जीतना आसान नहीं है, पर पुराने योद्धा मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हर पार्टी के पास कुछ जुनूनी प्रत्याशी होते हैं, यदि ऐसे लोग न हों, तो पार्टी लोकप्रिय कैसे बन पाएगी? 2014 की अपेक्षा 2019 की ये चुनावी जंग आक्षेपबाजी में कड़वाहट घोलने वाली है। इस हालात पर काबू पाने के लिए स्टॉर प्रचारकों को अपनी भाषा में संयम रखने की आवश्यकता है। उन्हें सुधरने की आवश्यकता है। इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषा बहुत ही आक्रामक है। वे बोलते हैं, तो लगता है कि वे विपक्ष पर आरी चला रहे हों। इसलिए भाजपा के अन्य नेता भी कुछ अधिक प्रेरणा लेकर कुछ और ही बोल जाते हैं, जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए। यही हाल राहुल गांधी का भी है। कांग्रेसियों के पास उनसे अच्छा कोई नेता ही नहीं है, इसलिए वे उनका अनुकरण करते हैं और बहुत कुछ कड़वा बोल जाते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि प्रतिस्पर्धी पर प्रहार किए बिना भाषण हो ही नहीं सकता। देश में पहले भी चुनाव होते रहे हैं, पर इतने आक्रामक कभी नहीं रहे। यह भी सच है कि आजकल सीधी-सच्ची बातें लोगों को हजम ही नहीं होती। शायद इसीलिए कहा गया है कि ‘एवरी थिंग इज फेयर इन लव, वॉर एंड इलेक्शन’।

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