पश्चिम बंगाल में हिंसा : ममता छोड़े मनमर्जी – डॉ. महेश परिमल

3:47 pm or May 1, 2019
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पश्चिम बंगाल में हिंसा : ममता छोड़े मनमर्जी

  • डॉ. महेश परिमल

यह एक विरोधाभास ही है कि पश्चिम बंगाल के नागरिक बहुत ही सौम्य हैं, पर वहां के राजनेता उतने ही झगड़ालू हैं। वामपंथियों ने 34 साल तक चुनाव में जो हिंसा का धंधा किया है, ठीक वही अब वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं। चुनाव के इस दौर में वहां जिस प्रकार की हिंसा हुई, उससे तो कश्मीर घाटी को भी पीछे छोड़ दिया। वहां की हिंसा देखकर घाटी पहली बार शर्म से लाल हुई। पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है, जिसकी केंद्र सरकार से कभी नहीं पटरी नहीं बैठी। यहां जो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है, वह अपनी प्रजा को छोड़कर बाकी सबका होता है। प्रजा का हित करना इसकी तासीर है। केंद्र में जब भी खिचड़ी सरकार बनती है, तब इनकी बांछें खिल जाती हैं। क्योंकि उन्हें उनकी औकात से अधिक सम्मान मिलने लगता है। केवल कुछ ही सांसदों के बल पर ये सरकार पलट देने की धमकी देते रहे हैं। इसलिए वे जो चाहते हैं, वैसा हो जाता है। पूर्व सरकार में ममता बनर्जी रेल मंत्री जैसा मंत्री पद प्राप्त कर लेती थीं। फिर अपने हिसाब से वही करतीं, जो उनके मन में आता। जब से मोदी सरकार बनी है, ममता अपने मन की नहीं कर पा रहीं हैं। इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी चिढ़ है। इस चिढ़ के पीछे यही बात है कि उन्हें पीएम से मिलने के लिए अपाइटमेंट लेना पड़ता है। इसके पहले तो उनके लिए लाल जाजम बिछाए जाते थे।

पिछले दो दशकों से यह स्थिति थी कि पश्चिम बंगाल के सीएम यदि दिल्ली पहुंचें, तो सत्तारूढ़ दल उनके लिए लाल जाजम लिए तैयार होता था। उस दौरान प्रधानमंत्री से उनका मिलना तय होता था। यदि मुलाकात न हो, तो मीडिया में यह बात पहुंच ही जाती थी कि सरकार के भीतर कुछ चल रहा है, इसलिए पश्चिम बंगाल नाराज हो गया है। मोदी सरकार आने के बाद उन्हें एडवांस में एपाइटमेंट लेना होता है। यह तो ठीक है, पर बंगाल में यदि कोई योजना लागू होेने वाली है, इसकी जानकारी पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों को मिल जाती थी, उसके बाद राज्य सरकार को मिलती थी। समानांतर सरकार खड़े करना यह संघ स्टाइल है। संघ के लिए भले ही यह सामान्य बात हो, पर ममता बनर्जी के लिए तो यह अपमानजनक ही है। जिस ममता बनर्जी को देखकर प्रधानमंत्री की हालत डगमग हो जाती हो, उसी मुख्यमंत्री को दिल्ली में कोई भाव न दे, इसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। यही हालत आजकल उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों की है। इनके लिए भी दिल्ली स्वागत में खड़ी हो जाती थी, उन्हें आजकल बैठने के लिए भी नहीं कहा जा रहा है। खिचड़ी सरकार के समय अपनी मनमानी करने वाली पार्टियाें को पिछले 5 सालों से अपना राजनीतिक प्रभाव खत्म होता दिखाई दे रहा है। दिल्ली में उनकी कोई कीमत ही नहीं है, यह बात ममता को हजम नहीं हो रही है, इसलिए वे अब कुछ ज्यादा ही अकड़ रही हैं।

अपने इसी अपमान का बदला लेने के लिए वे शायद अपने कार्यकर्ताओं को खुली छूट दे रहीं हैं। काफी समय से देखा जा रहा है कि केवल चुनाव ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के जो भी निर्णय हों, उसका विरोध करना ही उनका पहला कर्तव्य हो गया है। उदाहरण के लिए सीबीआई के अधिकारी पूछताछ के लिए जब पश्चिम बंगाल जाते हैं, तो उन्हें विरोध का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर ममता बनर्जी के संबंधी को एयरपोर्ट पर रोक दिया जाता है, तो उसका विरोध किया जाता है। इसी से पता चल जाता है कि उनकी नीयत कैसी है?

ममता बनर्जी के पास ऐसे लोगों की पूरी फौज है, जो कभी भी दंगा करवा सकती है। सभी का यही मानना है कि ममता के इशारे के बिना कोई भी असामाजिक तत्व मतदान केंद्र पर हमला नहीं कर सकता। पश्चिम बंगाल में हमेशा चुनाव के दौरान हिंसा होती ही है, इसलिए यह कहा जा रहा है कि अब वहां चुनाव के दौरान सेना की तैनाती की जाए। चुनाव में हिंसा यह लोकतंत्र के माथे पर एक कलंक की तरह है। इसमें बदलाव आवश्यक है। विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दल के कारण हिंसा संभव है, पर लोकसभा चुनाव में आक्रोश को भविष्य का संकेत माना जाना चाहिए। उधर इस बार महागठबंधन की भी कोई गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही है। महागठबंधन में ममता की भी कोई विशेष भूमिका भी नहीं है। इसलिए उनके समर्थक अपनी खीझ मिटाने के लिए इस तरह से हिंसा में उतारू हो गए हैं।

ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव किसी तरह भी लाभदायी नहीं है। एक तरफ विपक्षी पूरी तरह से एकजुट नहीं दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ मतदान केंद्रों पर हमले से उनकी सरकार बदनाम हो रही है। ऐसा भी नहीं है कि ममता बनर्जी में किसी प्रकार की सकारात्मकता नहीं है। वह रोज 15 कि.मी. पैदल चलती हैं। सरकार से वेतन नहीं लेती, अपनी पेंटिंग्स और पुस्तकों से मिलने वाली रायल्टी से अपना जीवन चलाती हैं। इतनी सकारात्मकता के बाद भी उनके राज्य में चुनावी हिंसा हो रही है, यह उनकी सारी सकारात्मकता को पीछे छोड़ देती है। इससे राजनीति में उनकी काफी बदनामी हो रही है। जब किसी मतदान केंद्र पर पेट्रोल बम फेंका जाता है, तो लोग किस तरह से बेखौफ होकर मतदान करने जा सकते हैं?  इसके बाद भी पश्चिम बंगाल में 70 प्रतिशत मतदान हुआ। यदि लोग बेखौफ होकर मतदान के लिए निकलें, तो तय है कि वहां मतदान का प्रतिशत 85 तक पहुंच जाए। पर ममता बनर्जी के रहते यह संभव नहीं हो पाएगा। ममता बनर्जी अपनी मनमर्जी छोड़ें, तो कुछ अच्छे कार्य हो सकते हैं।

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