चौकीदार की नाक के नीचे नफरत फैलाते रहे उसके साथी – नेहा दाभाड़े

3:48 pm or May 7, 2019
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चौकीदार की नाक के नीचे नफरत फैलाते रहे उसके साथी

  • नेहा दाभाड़े  

देश में चल रहे आम चुनावों में जनता का अधिकाधिक समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा ने जो अभियान शुरू किए हैं, उनमें से एक है ‘मैं भी चौकीदार‘। इस अभियान के अंतर्गत, प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर प्रोफाईल में स्वयं के नाम के आगे ‘चौकीदार‘ शब्द लगाया। इसके बाद, उनके अनेक मंत्री और पार्टी नेता भी चौकीदार बन गए। इस अभियान का उद्देश्य आम लोगों को यह बताना था कि भाजपा सरकार सामाजिक बुराईयों और भ्रष्टाचार के खिलाफ अनवरत लड़ रही है।

‘‘आपका चौकीदार मजबूती से खड़ा है और देश की सेवा कर रहा है। परंतु मैं अकेला नहीं हूं। हर वह व्यक्ति, जो भ्रष्टाचार, गंदगी और सामाजिक बुराईयों से लड़ रहा है, चौकीदार है। जो भी देश की प्रगति के लिए मेहनत कर रहा है, वो चौकीदार है। हर भारतीय कह रहा है मैं भी चौकीदार,‘‘ मोदी ने ट्विटर पर लिखा। इससे ऐसा लगता है मानो प्रधानमंत्री एक ऐसे व्यक्ति हैं जो पूरी मेहनत और लगन से देश की रक्षा कर रहे हैं और देश में कानून-व्यवस्था और कानून का राज बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। जाहिर है कि देश के शीर्ष शासक से यही उम्मीद की जा सकती है। उनके इस अभियान की विभिन्न कारणों से आलोचना हुई। इनमें शामिल हैं बदहाल अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी और जनता के खून-पसीने के हजारों करोड़ रूपये डकारकर नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या और ललित मोदी जैसों का विदेश भाग जाना। सामाजिक मोर्चे पर भी हालात अच्छे नहीं हैं। यद्यपि इस अभियान ने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी की परंतु सच यह है कि यह स्व-नियुक्त, ईमानदार चौकीदार तब चुप रहा आया जब देश के कानूनों का खुलेआम उल्लंघन हुआ। चौकीदार, चुपचाप अपने साथियों और पार्टी के नेताओं को जहर उगलते देखता रहा।

देश में नफरत फैलाने वाले भाषणों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। एनडीटीवी के अनुसार, यूपीए-2 के कार्यकाल (2009-2014) की तुलना में एनडीए शासनकाल (मई 2014 से अप्रैल 2919 तक) में नफरत फैलाने वाले भाषणों की संख्या 490 गुना बढ़ी है। एनडीए शासनकाल में कुल 45 राजनैतिक नेताओं ने नफरत फैलाने वाली टिप्पणियां कीं। इनमें से 35 (78 प्रतिशत) भाजपा से थे और 10 (22 प्रतिशत) कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल से।

नफरत फैलाने वाले भाषणों की संख्या में यह वृद्धि तो चिंताजनक है ही इसका सबसे दुःखद पहलू यह है कि भाषण देने वालों में से अधिकांश शीर्ष पदों पर बैठे लोग हैं जिन्होंने संविधान की रक्षा करने की शपथ ली है। यह अत्यंत चिंताजनक है कि जो पार्टी देश का चौकीदार होने का दावा कर रही है उसके सांसद, केन्द्रीय केबिनेट मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और राज्यों के मंत्री, कानून का उल्लंघन कर रहे हैं और देश का सबसे बड़ा चौकीदार सो रहा है। जब मुसलमानों का दानवीकरण और धर्म के आधार पर लोगों में बैरभाव उत्पन्न करने के लिए इन नेताओं ने खुलेआम नफरत फैलाने वाले भाषण दिए तब उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई। भारतीय दंड संहिता में धर्म के आधार पर नफरत फैलाने की स्पष्ट परिभाषा दी गई है और साथ ही ऐसा करने वालों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है।

आईपीसी की धारा 153ए कहती है ‘‘जो कोई लिखे गए शब्दों या संकेतों या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय या प्रादेशिक समूहों, जातियों या समुदायों के बीच असौहार्द अथवा शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयास करेगा, उसे कारावास या आर्थिक दंड या दोनों से दंडित किया जाएगा।‘‘

एनडीए शासनकाल के शुरूआती दौर में नफरत फैलाने वाले भाषणों को यह कहकर नजरअंदाज करने की बात कही जाती थी कि वे अतिवादी तत्वों की बकवास हैं और इन तत्वों को राजनैतिक नेतृत्व का समर्थन प्राप्त नहीं है। परंतु बाद में, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों ने भी ऐसी ही बातें करनी शुरू कर दीं और कानून-व्यवस्था मशीनरी चुपचाप देखती रही। नफरत फैलाने वाले भाषण अब तथाकथित अतिवादी तत्व नहीं दे रहे हैं वरन् मुख्यधारा के राजनेता, जिनमें संवैधानिक पदों पर बैठे लोग शामिल हैं, ऐसी बातें कर रहे हैं। यह स्थिति देश में पहली बार बनी है। इन भाषणों के कारण धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा है और मुसलमानों के विरूद्ध पूर्वाग्रह और गहरे हुए हैं। इससे मुसलमानों को ‘दूसरा‘ मानने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है। वैसे तो इस तरह के भाषणों की संख्या बहुत बड़ी है परंतु सीमित स्थान के चलते नीचे इनमें से कुछ उद्धत किए जा रहे हैं।

हम केन्द्रीय मंत्रियो से शुरूआत करते हैं। कई केन्द्रीय मंत्रियों ने ऐसी बातें कहीं जिनसे यह धारणा पुष्ट होती है कि मुसलमान और केवल मुसलमान ही आतंकवादी होते हैं। केन्द्रीय लघु व मध्यम उद्योग राज्यमंत्री गिरिराज सिंह ने उत्तरप्रदेश के मुस्लिम-बहुल नगर देवबंद की चर्चा करते हुए कहा, ‘‘देवबंद का पुराना नाम देववृंत था। मुझे नहीं मालूम कि इस जगह में ऐसा क्या है जो यहां से (इस्लामिक स्टेट का संस्थापक) बगदादी और (पाकिस्तानी आतंकवादी) हाफिज सईद जैसे लोग निकलते हैं। यह ज्ञान का मंदिर नहीं बल्कि आतंकवाद का अड्डा है‘‘। अपने एक अन्य भाषण में उन्होंने हिन्दुओें में यह भय जगाने का प्रयास किया कि मुसलमानों की आबादी में तेज वृद्धि के कारण वे जल्दी ही देश के बहुसंख्यक समुदाय बन जाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ते हुए कहा कि वे पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और उस देश से ही प्यार करते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हिन्दू का दो बेटा हो तो मुसलमानों को भी दो ही बेटा होना चाहिए। हमारी आबादी घट रही है। बिहार में सात जिले ऐसे हैं जहां हमारी जनसंख्या घट रही है। जनसंख्या नियंत्रण के नियम बदलने होंगे तभी हमारी बेटियां सुरक्षित रहेंगीं। नहीं तो हमें भी पाकिस्तान की तरह अपनी बेटियों को पर्दे में बंद करना होगा।‘‘

इसी तरह, संसदीय मामलों के केन्द्रीय राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने भी ऐसी टिप्पणी की, जिससे जाहिर होता है कि मुसलमान इस देश के अपने नहीं हैं। ‘‘जो लोग बीफ खाए बिना जिंदा नहीं रह सकते वे पाकिस्तान या अरब देश या दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में जा सकते हैं, जहां बीफ उपलब्ध है‘‘, उन्होंने कहा। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने गाय को राष्ट्रवाद का पवित्र प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि गायों की तस्करी से होने वाला मुनाफा, आतंकवाद को पोषित कर रहा है। ‘‘इस पैसे से बम बनाए जा रहे हैं‘‘ उन्होंने कहा।

इस तरह मुसलमानों को आतंकवादी, गौमांस भक्षक व राष्ट्रविरोधी करार देते हुए यह कहा जा रहा है कि वे इतने ढ़ेर सारे बच्चे पैदा कर रहे हैं कि जल्दी ही उनकी जनसंख्या हिन्दुओं से अधिक हो जाएगी। इस दुष्प्रचार से एक ओर मुसलमानों का दानवीकरण होता है तो दूसरी ओर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना को औचित्यपूर्ण बताना आसान हो जाता है। जिन जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों ने भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ ली है वे तक हिन्दू राष्ट्र की वकालत कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री पारस जैन ने कहा ‘‘इस देश में रहने वाले हर व्यक्ति- चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो – को इस देश को हिन्दू राष्ट्र मानना चाहिए क्योंकि यहां रहने वालों में से बहुसंख्यक हिन्दू धर्म को मानते हैं।‘‘ शिक्षा के भगवाकरण के बारे में पूछे जाने पर आगरा से सांसद और केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया ने कहा, ‘‘हां, शिक्षा का भगवाकरण तो होगा। और देश का भगवाकरण भी होगा। जो अच्छा होगा वह होगा।‘‘

हिन्दू राष्ट्र का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उसमें गैर-हिन्दू द्वितीय श्रेणी के नागरिक होंगे। अन्य समुदायों और उनके प्रतीकों को हिन्दू धर्म और उसके प्रतीकों से निम्न दर्जा दिया जाएगा। केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के अनुसार तो मुसलमान देश के अवैध नागरिक हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के लिए प्रचार करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आपको तय करना है कि दिल्ली में सरकार रामजादों की बनेगी या हरामजादों की। यह आपका फैसला होगा।‘‘ इस तरह के भाषणों और टिप्पणियों ने भारत में नागरिकता पर विमर्श को पूरी तरह बदलकर उसे धर्म से जोड़ दिया है। शिवसेना के एक सांसद ने मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किए जाने की वकालत करते हुए कहा, ‘‘बालासाहेब ने पन्द्रह साल पहले कहा था कि अगर मुसलमानों से वोट देने का अधिकार कुछ सालों के लिए छीन लिया जाए तो उनके वोटों के लिए होने वाली दौड़ बंद हो जाएगी।‘‘

संविधान राज्यपाल को व्यापक शक्तियां देता है और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे पूरी निष्पक्षता और निष्ठा से संवैधानिक प्रावधानों का पालन करेंगे और करवाएंगे। इस उच्च पद की गरिमा के परखच्चे उड़ाते हुए असम के राज्यपाल पी. बी. आचार्य ने कहा, ‘‘वे (भारतीय मुसलमान) कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं। वे यहां (भारत) रह सकते हैं, अगर वे बांग्लादेश या पाकिस्तान जाना चाहते हैं तो वे जा सकते हैं। उनमें से कई पाकिस्तान गए। परंतु जब वहां उन्हें प्रताड़ित किया गया…तस्लीमा नसरीन को वहां प्रताड़ित किया गया और वे यहां आईं। अगर वे यहां आएंगे तो हम उन्हें शरण देंगे।‘‘

भाजपाई मुख्यमंत्री भी इस मामले में पीछे नहीं रहे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने कहा, ‘‘कुछ लोग देश के टुकड़े करने के नारे लगाते हैं। राजनैतिक दलों को ऐसे लोगों को हीरो बनाने से बाज आना चाहिए। जो लोग भारत माता की जय कहना नहीं चाहते उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं है।‘‘ फड़नवीस यह अच्छी तरह से जानते हैं कि देश का संविधान नागरिकों से भारत माता की जय कहने की अपेक्षा नहीं करता और किसी को भी कानून के अंतर्गत भारत माता की जय कहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। परंतु भाजपा के नेता लगातार मुसलमानों से भारत माता की जय का नारा लगाने को कहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि एकेश्वरवादी इस्लाम, अल्लाह और पैगंबर मोहम्मद सहित, किसी को भी मूर्त रूप में पूजने की इजाजत नहीं देता। दादरी में लिंचिंग की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने कहा ‘‘मुस्लिम रहें लेकिन इस देश में बीफ खाना छोड़ना ही होगा उनको। यहां की मान्यता है गऊ।‘‘

भाजपा, जो केन्द्र और कई राज्यों में सत्ता में है, इस गलत धारणा का प्रचार-प्रसार कर रही है कि मुसलमान पाकिस्तान के हैं और भारत हिन्दुओं का देश है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था, ‘‘अगर बीजेपी गलती से भी बिहार में हारती है तो जय-पराजय तो बिहार में होगी, पटाखे पाकिस्तान में छूटेंगे।‘‘ एक अन्य भाजपा सदस्य आर्सीवथम आचार्य ने कहा, ‘‘मैं आपको एक बात बताऊं। भारतीय मुसलमानों के शरीर तो तमिलनाडु में हैं पर उनके दिल पाकिस्तान में हैं।‘‘ यह अतिवादी राष्ट्रवाद का अत्यंत निम्न स्तर है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(3), धर्म के आधार पर वोट मांगने को दंडनीय अपराध घोषित करती है। उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा विधायक जगन प्रसाद गर्ग ने कहा था, ‘‘आपको गोलियां चलानी होंगी, आपको रायफलें उठानी होंगीं, आपको चाकू रखने होंगे। सन् 2017 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं। अभी से अपनी ताकत दिखाना शुरू कर दो।‘‘ इसके बाद भीड़ ने नारा लगाया, ‘‘जिस हिन्दू का खून न खौले, खून नही वो पानी है‘‘। आरएसएस के पूर्व प्रचारक रामपाल सिंह पुण्डीर का एजेंडा हिन्दुओं की प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना था। ‘‘यह चुनाव हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच है क्योंकि हिन्दू असुरक्षित हैं। हमारी मां-बेटियों की इज्जत खतरे में है। हिन्दू व्यापारियों की दुकानों और घरों में चोरियां और डकैतियां होती हैं। उनकी हत्या कर दी जाती है। देवबंद में किसी हिन्दू की हिम्मत नहीं है कि कुछ बोल जाए।‘‘ एक अन्य भाजपा नेता कुंडनिका शर्मा ने ‘विश्वासघाती‘ मुसलमानों से वोट मांगने वाले अन्य दलों को ‘गीदड़‘ बताया। उन्होंने कहा, ‘‘हमें इन विश्वासघातियों के सिर चाहिए। यह चुप बैठने का समय नहीं है। छापा मारो, बुर्का पहनो लेकिन इन्हें घेर-घेरकर ले आओ। एक सिर के बदले दस सिर काट लो।‘‘

क्या कारण है कि अपने आपको 56 इंच के सीने वाला जाबांज और दिलेर नेता बताने वाले हमारे प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी के नेताओं पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। ये कैसे चौकीदार है जो चोरों को देखकर दूसरी तरफ मुंह फेर लेता है। चौकीदार की चुप्पी के कारण नफरत फैलाने वालों का दुःसाहस बढ़ता गया और ऐसी बातें आम बन गईं। संविधान ओर संवैधानिक मूल्यों को कुचला जाता रहा और चौकीदार के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। जाहिर है कि मैं भी चौकीदार अभियान एक ढकोसले से ज्यादा कुछ नहीं है। जब मुख्य चौकीदार  ही अपने काम में इतना अक्षम सिद्ध हुआ है तब उसके चेले-चपाटी तो देश को लुटवा ही देंगे।

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