सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत ईश्वरचन्द्र विद्यासागर – शैलेन्द्र चौहान

3:09 pm or May 22, 2019
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सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत ईश्वरचन्द्र विद्यासागर

  • शैलेन्द्र चौहान

भारत में 19वीं शती में जिन लोगों ने सामाजिक परिवर्त्तन में बड़ी भूमिका निभाई, उनमें ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 26 सितम्बर, 1820 को ग्राम वीरसिंह (जिला मेदिनीपुर, बंगाल) में हुआ था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अपने नाम के अनुरूप ही विलक्षण गुणों की मिसाल थे। कोई एक सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवनादर्शों से किस तरह महानता को प्राप्त करता है और दूसरों को भी ऐसा ही आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देता है, विद्यासागर का सम्पूर्ण जीवन हमें यही सिखाता है। निर्धन परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने अपने शिक्षा, संस्कार, सादगी, ईमानदारी, परिश्रम, दयालुता व स्वावलम्बन के ऐसे आदर्श प्राप्त किये, जिनके कारण वे अमर हो गये। जब वे गर्भावस्था में थे, तब उनकी माता पागल हो गयी थी। घर की आर्थिक तंगी के कारण माता का इलाज उनके पिता चाहकर भी नहीं कर पाये । ईश्वरचन्द्र का जन्म होते ही माता की अवस्था सामान्य हो गयी।

वे अपनी धार्मिक तथा दयालु विचारों वाली माता से रामायण, महाभारत, श्रवण की मातृभक्ति तथा वीर शिवा की कहानियां सुना करते थे। पांच वर्ष की अवस्था में गांव की पाठशाला में भरती होने के बाद उनकी बुद्धिमानी और सदचरित्रता से सभी अध्यापक अत्यन्त प्रभावित थे। कक्षा में यदि कोई लड़का कमजोर या असहाय होता, तो उसके पास स्वयं जाकर उसे पढ़ा देते और उसकी यथासम्भव सहायता करते। वे अपने पिता की कठोरता को भी उनका आशीर्वाद समझते थे । पढ़ाई के समय उनके पिता इतने कठोर हो जाया करते थे कि कई बार विद्यासागर की आखों में सरसों या मिट्टी का तेल भर दिया करते थे। कभी-कभी तो उनकी चोटी को रस्सी से बांधकर खूंटी में अटका दिया करते थे, ताकि विद्यासागर को पढ़ते समय नींद न आ जाये। यद्यपि पिता की कठोरता उन्हें कभी-कभी बहुत खटकती भी थी किन्तु वे यह भी मानते थे कि इसी कठोरता के फलस्वरूप वे अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आते हैं।

बाल्यावस्था में वे हकलाते थे, इस कारण अंग्रेज अध्यापक ने उन्हें दूसरी श्रेणी में पास किया । इस बात पर विद्यासागर इतना अधिक रोये कि उन्होंने कई दिनों तक ठीक से भोजन ग्रहण तक नहीं किया । धार्मिक परिवार होने के कारण इन्हें अच्छे संस्कार मिले।

नौ वर्ष की अवस्था में ये संस्कृत विद्यालय में प्रविष्ट हुए और अगले 13वर्ष तक वहीं रहे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी; अतः खर्च निकालने के लिए इन्होंने दूसरों के घरों में भोजन बनाया और बर्तन साफ किये। रात में सड़क पर जलने वाले लैम्प के नीचे बैठकर ये पढ़ा करते थे। इस कठिन साधना का यह परिणाम हुआ कि इन्हें संस्कृत की प्रतिष्ठित उपाधि ‘विद्यासागर’ प्राप्त हुई। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता घोर आर्थिक तंगी के बाद भी उन्हें कलकत्ता ले गये। अपने गांव से पैदल ही कलकत्ता पहुंचे। इस गरीब पिता-पुत्र के पास पैसे तो थे नहीं, अत: कुछ दिन तंगहाली में गुजारे । बड़ी भागदौड़ के बाद पिता को दो रुपये महीने की नौकरी मिली । विद्यासागर की पढ़ाई शुरू हो गयी । पिताजी की मेहनत और ईमानदारी के कारण उनकी तनख्वाह दो रुपये से दस रुपये हो गयी। ईश्वरचन्द्र अब संस्कृत कॉलेज के विद्यार्थी थे । इसी बीच काम की तलाश कर वे पढ़ाई-लिखाई के साथ जो रुपये कमाने लगे, उसे अपनी मां को भेजने लगे। म्यूनिसिपेलिटी के लालटेन की रोशनी में पढ़ने के कारण तेल का खर्च बच जाता था। स्वयं ही भोजन बनाकर बर्तन साफ कर पढ़ाई करना उनकी नियति का एक अंग था । कॉलेज की पढ़ाई अबल दरजे में पास करने पर उनके अंग्रेज प्रिंसिपल ने स्वयं उनके ज्ञान की परीक्षा ली । इस बुद्धिमान् और होनहार छात्र का सम्मान करने का प्रस्ताव उन्होंने समिति के सामने रखा। हजारों विद्यार्थियों और अध्यापकों की भीड़ में कॉलेज की ओर से उन्हें न केवल विद्यासागर की उपाधि दी गयी, वरन उनका एक चित्र भी कॉलेज के भवन में लगा दिया । 21 वर्ष की अवस्था में विद्यासागर की उपाधि मिलने के बाद कई संस्थाओं से उन्हें नौकरी का आमन्त्रण मिला, किन्तु अन्याय, बेईमानी और दबाव के बीच काम न कर सकने वाले विद्यासागर ने कई नौकरियों से इस्तीफा दे दिया।

1841 में वे कोलकाता के फोर्ट विलियम कालेज में पढ़ाने लगे। 1847 में वे संस्कृत महाविद्यालय में सहायक सचिव और फिर प्राचार्य बने। वे शिक्षा में विद्यासागर और स्वभाव में दया के सागर थे। एक बार उन्होंने देखा कि मार्ग में एक वृद्ध और असहाय महिला पड़ी है। उसके शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी। लोग उसे देखकर मुँह फेर रहे थे; पर ईश्वरचन्द्र जी उसे उठाकर घर ले आये। उसकी सेवा की और उसके भावी जीवन का भी प्रबन्ध किया।

ईश्वरचन्द्र जी अपनी माता के बड़े भक्त थे। वे उनका आदेश कभी नहीं टालते थे। एक बार उन्हें माँ का पत्र मिला, जिसमें छोटे भाई के विवाह के लिए घर आने का आग्रह किया था। उन दिनों वे कोलकाता के सेण्ट्रल कालेज में प्राचार्य थे। उन्होंने प्रबन्धक से अवकाश माँगा; पर उसने मना कर दिया। इस पर ईश्वरचन्द्र जी ने अपना त्यागपत्र लिखकर उनके सामने रख दिया। विवश होकर प्रबन्धक महोदय को अवकाश स्वीकृत करना पड़ा। कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रिंसिपल विद्यासागर के इन गुणों से प्रभावित होकर उन्हें कॉलेज का प्रोफेसर बनाना चाहते थे । विद्यासागर ने अपने पहले आये हुए एक शास्त्री को पहले मौका देने की बात कहकर ईमानदारी का परिचय दिया। प्रिंसिपल साहब ने दोनों को ही प्रोफेसर बना दिया। इस कॉलेज के विद्यार्थियों में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं थी। विद्यार्थियों के साथ-साथ अध्यापक भी देरी से कॉलेज आते थे। दुर्भाग्य से उनके एक गुरु, जो वहां अध्यापक थे, वे सबसे देरी से आते थे। विद्यासागर ने एक रास्ता खोज निकाला। वे कॉलेज खुलने के पांच मिनट पहले ही पहुंच जाते और देरी से आने वाले अध्यापकों से हंसते हुए पूछते- ”क्यों आप अभी आये हैं?” गुरुजी से कुछ न कहते । अब तो उनके गुरुजी भी शिष्य की इस नीति को समझकर नियमित आने लगे । एक बार तो कक्षा के उद्दण्ड लड़कों द्वारा अध्यापकों का अपमान करने पर विद्यासागर ने सारी कक्षा को कॉलेज से बाहर निकाल दिया । सब यह सोचने लगे कि विद्यासागर को अब तो बाजार में तरकारी और गुड़ बेचकर गुजारा करना होगा, किन्तु अध्यापकों के मान-सम्मान व विद्यार्थियों की उद्दण्डता को लेकर समिति ने जब उनके विचार सुने, तो उन्होंने सारा मामला विद्यासागर पर छोड़ दिया । लड़कों को उनसे माफी मांगनी पड़ी। एक अंग्रेज अध्यापक को तो उन्होंने शिष्टाचार का ऐसा सबक सिखाया कि वे जिन्दगी-भर इसे न भूले । आई०सी०एस० की परीक्षा में परीक्षक बनने पर उनके पास नम्बर बढ़वाने की सिफारिशें आती थीं । उन्होंने उसे कभी स्वीकार नहीं किया ।

जिन दिनों महर्षि दयानन्द सरस्वती बंगाल में प्रवास पर थे, तब ईश्वरचन्द्र जी ने उनके विचारों को सुना। वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। उन दिनों बंगाल में विधवा नारियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। बाल-विवाह और बीमारी के कारण बाल विधवाओं का शेष जीवन बहुत कष्ट और उपेक्षा में बीतता था। ऐसे में ईश्वरचन्द्र जी ने नारी उत्थान के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया।

उन्होंने धर्मग्रन्थों के द्वारा विधवा-विवाह को शास्त्र सम्मत सिद्ध किया। वे पूछते थे कि यदि विधुर पुनर्विवाह कर सकता है, तो विधवा क्यों नहीं कर सकती ? उनके प्रयास से 26 जुलाई, 1856 को विधवा विवाह अधिनियम को गर्वनर जनरल ने स्वीकृति दे दी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर, 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर पर पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ।

इससे बंगाल के परम्परावादी लोगों में हड़कम्प मच गया। ऐसे लोगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये गये; पर वे शान्त भाव से अपने काम में लगे रहे। बंगाल की एक अन्य महान विभूति श्री रामकृष्ण परमहंस भी उनके समर्थकों में थे। ईश्वरचन्द्र जी ने स्त्री शिक्षा का भी प्रबल समर्थन किया। उन दिनों बंगाल में राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में काम कर रहे थे। ईश्वरचन्द्र जी ने उनका भी साथ दिया और फिर इसके निषेध को भी शासकीय स्वीकृति प्राप्त हुई।

विद्यासागर जितने दयालु व ईमानदार थे, उतने ही स्वाभिमानी भी थे । एक सज्जन को एक बार विद्यासागर के घर जाना था । विद्यासागर उन्हें लेने स्टेशन पहुंच गये । सज्जन ने उन्हें कुली समझकर अपना सामान उठाने को कहा । विद्यासागर उनका सामान उठाये चुपचाप चल दिये। विद्यासागर के घर के पास पहुंचकर उन्होंने उन्हें इकन्नी देनी चाही । न लेने पर उनके ऊपर फेंक दी । विद्यासागर ने उसे ही अपना घर बताया, तो सज्जन ने कहा- ”विद्यासागर से कहो कि कोई उनसे मिलने आया है ।” ”कहिये! मैं ही विद्यासागर हूं।” यह सुनते ही सज्जन उनके पैरों पर गिर पड़े ।

विद्यासागर ने अपने जीवन में गरीबों, दीन-दुखियों की कभी धन से, तो कभी तन से सेवा की । उनकी इस मानव सेवा की कई मिसालें हमारे सामने हैं, जिनसे यह साबित होता है कि विद्या व्यक्ति को विनय व विनम्रता प्रदान करती है । ईमानदारी, परिश्रम तथा स्वयं का काम स्वयं करने वाले इस विद्या के धनी व्यक्ति को सारा भारतवर्ष मानवता का पर्याय मानता है। विद्या के इस सागर ने अपने जीवनकाल में 52 ग्रन्धों की रचना भी की थी, जो उनके सच्चे विद्याप्रेमी होने का प्रमाण है। नारी शिक्षा और उत्थान के प्रबल पक्षकार श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का हृदय रोग से 29 जुलाई, 1891 को देहान्त हो गया। भारतीय स्त्री समाज उनका चिर ऋणी रहेगा।

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