असम में एनआरसीः मानवता पर हमला – सीएसएसएस तथ्यांवेषण टीम

2:27 pm or July 9, 2019
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असम में एनआरसीः मानवता पर हमला

  • सीएसएसएस तथ्यांवेषण टीम

‘‘नागरिकता, हर मनुष्य का मूलभूत अधिकार है क्योंकि यही अधिकार उसे अन्य अधिकार देता है. इस अमूल्य अधिकार से उसे वंचित कर देने से बचेगा एक राज्य-विहीन व्यक्ति, जिसे उसके ही देश के नागरिक नीची निगाहों से देखेंगे.” ये शब्द जानेमाने विधिवेत्ता अर्ल वारेन के हैं और ये असम के उन लाखों रहवासियों की यंत्रणा को अभिव्यक्त करते हैं, जिनके नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ़  सिटीजन्स (एनआरसी) के अंतिम मसविदे में शामिल नहीं किए गए हैं और उनकी भी, जिन्हें विदेशी घोषित कर राज्य के विभिन्न नजरबंदी शिविरों में कैद कर दिया गया है. पिछले साल जुलाई में प्रकाशित एनआरसी की अंतिम मसविदा सूची में असम के करीब 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं. इसके समानांतर, विदेशी नागरिक न्यायाधिकरण में आरोपियों की सुनवाई चल रही है, जिसके बाद उन्हें नजरबंदी शिविरों में भेजा जा रहा है. इसके चलते पूरे राज्य में घबराहट, आतंक और भय का वातावरण व्याप्त हो गया है. एनआरसी की प्रक्रिया को समझने, इस विषय में विभिन्न दृष्टिकोणों और नागरिकता अधिनियम संशोधन विधेयक के संबंध में लोगों की राय जानने के लिए एक तथ्यांवेषण दल ने 13 से 16 जून 2019 तक असम की यात्रा की.

दल में लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म (सीएसएसएस) के निदेशक इरफान इंजीनियर, गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दिलीप बोरा, जामिया मिलिया इस्लामिया के सेंटर फॉर नार्थ ईस्ट स्टडीज एंड पालिसी रिसर्च के मुखिया प्रोफेसर मुनीरूल हुसैन, सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षाविद् हफीज अहमद, अध्येता व कार्यकर्ता शाईउज जमां अहमद व सीएसएसएस की उप निदेशक नेहा दाभाड़े शामिल थे. दल दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए स्थापित केन्द्रों में गया और इन केन्द्रों  में उपस्थित व्यक्तियों से बातचीत की. इसके अलावा, केन्द्रों के डिस्पोजिंग आफिसर्स (डीओ), पत्रकारों, शिक्षाविदों, राजनैतिक नेताओं और नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों से भी दल ने चर्चा की. इस यात्रा और उसके दौरान हुई चर्चा आदि के आधार पर दल जिन निष्कर्षों पर पहुंचा, उनका विवरण नीचे दिया गया है.

असम समस्या का इतिहास

असम में संघर्ष, टकराव और तनाव की कहानी बहुत पुरानी है. जिन कारणों से एनआरसी को अद्यतन किया जा रहा है, उनकी जड़ें स्वतंत्रता पूर्व के भारत में हैं. जिस विवाद की परिणती, एनआरसी के रूप में हुई है, उसका चरित्र मूलतः साम्प्रदायिक और नस्लीय है और यह बंगालियों और मुसलमानों के प्रति घृणा और उन्माद पर आधारित है. ब्रिटिश शासनकाल में असम की जनसंख्या बहुत कम थी. वहां लाखों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि खाली पड़ी थी. अंग्रेज शासकों को लगा कि इस क्षेत्र की कृषि भूमि का दोहन कर सरकार अपने राजस्व में वृद्धि कर सकती है. अतः राजनैतिक और व्यावहारिक उद्देश्यों से अंग्रेजों ने पड़ोसी बंगाल राज्य, जहां की जनसंख्या अत्यधिक थी, के किसानों को असम में बसने और वहां खेती शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. बड़ी संख्या में बंगाली और अन्य किसानों को असम के चाय बागानों में बसने के लिए भी बढ़ावा दिया गया. इन प्रवासियों में मुसलमान भी शामिल थे. बंगाली हिन्दू और मुस्लिम प्रवासियों ने ब्रम्हपुत्र घाटी को अपना लिया. उन्होंने अपनी बंगाली पहचान को त्याग दिया और असमी भाषा और वहां की संस्कृति को अपनाया.

इसके बावजूद, असम की मूल निवासी बोड़ो जनजाति और अन्य स्थानीय लोग इस अतार्किक भय से ग्रस्त हो गए कि बंगाली मुसलमान और हिन्दू – जिन्हें वे विदेशी मानते थे – उनके लिए खतरा हैं. प्रवासी हिन्दुओं और मुसलमानों में से जो खेती करना जानते थे, उन्हें प्रशासन ने भूमि आवंटित कर दी. इसके अतिरिक्त, प्रवासी, व्यवसाय, उद्योग, सरकारी नौकरियों और मीडिया में भी  पैठ जमाने लगे. ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण, अपने राज्य में बंगालियों का बढ़ता वर्चस्व, असम के लोगों, और विशेषकर वहां के मध्यम वर्ग, को बिलकुल रास नहीं आया. असम के मूल निवासियों को यह डर सताने लगा कि वे अपनी जमीनें, पहचान और संस्कृति खो देंगे और प्रवासी उन पर हावी हो जाएंगे. इसी सोच के चलते, सन् 1920 के दशक में प्रवासियों और मूल निवासियों के बीच संघर्ष शुरू हो गया. इस मुद्दे पर लंबे आंदोलन के बाद, अंग्रेजों ने असम के नक्शे पर मनमानी लकीरें खींचकर राज्य के कुछ हिस्सों में मुसलमानों के बसने पर प्रतिबंध लगा दिया. यह संघर्ष चलता रहा और भारत के विभाजन के पहले, इसने और तीखा स्वरूप अख्तियार कर लिया. मुसलमानों को साम्प्रदायिक हिंसा का सामना करना पड़ा और बड़ी संख्या में उन्हें उनके घरों और जमीनों से बेदखल कर दिया गया.

आल असम स्टूडेन्टस यूनियन (एएएसयू) की अगुवाई में चले लंबे, हिंसक आंदोलन की परिणती, सन् 1985 के असम समझौते में हुई. एएएसयू के आंदोलन के निशाने पर बांग्लाभाषी हिन्दू और मुसलमान दोनों थे परंतु धीरे-धीरे, प्रवासी-विरोधी आंदोलन का चरित्र मुस्लिम-विरोधी हो गया और इसी का नतीजा था नैल्ली जनसंहार, जिसमें हजारों मुसलमान मारे गए. जिस समय राज्य में मुस्लिम-विरोधी और प्रवासी-विरोधी भावनाएं अपने चरम पर थीं, उसी समय असम समझौते के अंतर्गत अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 पारित किया गया. यह अधिनियम केवल असम राज्य के लिए था और इसका उद्देश्य राज्य में रह रहे अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें देश से निर्वासित करना था. इस अधिनियम के अंतर्गत आरोपी के अवैध प्रवासी होने को साबित करने की जिम्मेदारी, शिकायतकर्ता की थी. इस कवायद में  बहुत कम संख्या में लोगों को अवैध प्रवासी घोषित किया गया क्योंकि ऐसा करने के लिए पर्याप्त सबूतों की आवश्यकता थी. इससे यह भी साबित हुआ कि यह दावा कि असम में बंगाली हिंदू और मुस्लिम प्रवासियों की संख्या इतनी अधिक है कि उससे राज्य का जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ रहा है, अतिशयोक्तिपूर्ण और बेबुनियाद है.

इस अधिनियम के अंतर्गत बहुत कम संख्या में विदेशियों की पहचान होने से नाराज, भाजपा नेता सर्वानंद सोनुवाल (जो अब राज्य के मुख्यमंत्री हैं), ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर इस अधिनियम को रद्द करने की मांग की. उच्चतम न्यायालय ने सन् 2005 में इस अधिनियम को रद्द कर दिया. इसी बीच, सन् 1997 में चुनाव आयोग ने राज्य की मतदाता सूचियों के सत्यापन का काम शुरू किया. इसके अंतर्गत, मतदाताओं से कहा गया कि वे ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करें, जिनसे यह साबित होता हो कि वे 1971 या उसके पहले से असम में रह रहे हैं. जो लोग ये दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके उन्हें ‘डाउटफुल’ (संदिग्ध) या ‘डी’ मतदाता घोषित कर दिया गया. यह कवायद अत्यंत मनमाने ढ़ंग से की गई औैर मतदाताओं को अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया.

सन् 2013 में उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को एनआरसी को अद्यतन करने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा. इस तरह वर्तमान में असम में दो प्रक्रियाएं एक साथ चल रहीं हैं. पहली, उच्चतम न्यायालय की निगरानी में एनआरसी का अद्यतीकरण और दूसरी, विदेशी अधिनियम के अंतर्गत विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों के जरिए विदेशियों का पता लगाना.

देश के विभाजन के तुरंत बाद, असम की बार्डर पुलिस ने विदेशी अधिनियम 1946 के अंतर्गत बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाते हुए मनमाने ढ़ंग से उन्हें विदेशी घोषित करना शुरू कर दिया. और यह अब भी जारी है.

एनआरसी के अद्यतीकरण का कार्य, नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत किया जा रहा है. इसके लिए 24 मार्च 1971 को कट-ऑफ़ तिथि घोषित किया गया है. इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति 24 मार्च 1971 के बाद, गैर-कानूनी ढ़ंग से भारत में घुसे और असम में बस गए, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाएगा. एनआरसी में अपना नाम शामिल करने के लिए नागरिकों को 14 दस्तावेजों में से दो प्रस्तुत करना अनिवार्य है. उन्हें यह साबित करना है कि या तो वे या उनके पूर्वज, निर्धारित तिथि के पहले, असम में बस गए थे. पूर्वजों के मामले में, नागरिकों को यह भी साबित करना है कि वे उनकी संतानें हैं.

साबित करने की जिम्मेदारी

एनआरसी के अद्यतीकरण की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू यह है कि यह साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की है कि वह भारत का नागरिक है. यह न्यायशास्त्र के इस सिद्धांत के खिलाफ है कि किसी भी आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी, आरोप लगाने वाले की होती है. पत्रकार गौरव दास का कहना है कि असम के अधिकांश नागरिक वंचित, अशिक्षित और गरीब हैं. वहां की जनजातियों के सदस्य न तो दस्तावेज सहेज कर रखते हैं और ना ही उनमें कृषि भूमि पर मालिकाना हक की अवधारणा है. वहां नदियों के अक्सर अपनी धारा बदलते रहने और बाढ़ के कारण, घर नष्ट होते रहते हैं, जिसके चलते दस्तावेजों को सुरक्षित रखना असंभव होता है.

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार अनूप शर्मा के अनुसार, राज्य सरकार ने लोगों को एनआरसी की प्रक्रिया और उसके लिए आवश्यक दस्तावेजों के बारे में जागरूक करने का कोई प्रयास नहीं किया. सरकार ने अखबारों में विज्ञापन जरूर प्रकाशित करवाए परन्तु अधिकांश लोगों के अशिक्षित होने के कारण, उसकी कोई विशेष उपयोगिता नहीं थी.

दावे और आपत्तियां

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, नागरिकों की सूची में से 40 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं. उनमें से लगभग 15 लाख मुसलमान हैं व 25 लाख हिन्दू व आदिवासी.

हरकुमार गोस्वामी, बारपेटा जिले के निवासी हैं परंतु वे अब गुवाहाटी में रहते हैं. उनका नाम एनआरसी के पहले मसविदे में शामिल किया गया था परंतु बाद में उन्हें पता चला कि सुनवाई के लिए उन्हें समन जारी किया गया है क्योंकि राहुल सूत्रधार और धनमनी काकोटी नामक दो व्यक्तियों ने एनआरसी में उनका नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति की है. गोस्वामी इन दोनों आपत्तिकर्ताओं को नहीं जानते. समन जारी किए जाने की बात सुनकर गोस्वामी बहुत परेशान हो गए. वे चकित थे और स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे थे. उनका कहना है कि गोस्वामी एक असमिया उपनाम है और इस उपनाम वाले व्यक्ति असम में लंबे समय से रहते आए हैं. वे इस बात से अपमानित महसूस कर रहे थे कि उन्हें न केवल सुनवाई में जाना होगा वरन् यह साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी होगी कि वे भारत के नागरिक हैं. उनका कहना था कि अगर वे भारत के नागरिक नहीं हैं तो राज्य को यह साबित करना चाहिए. उन्होंने दोनों आपत्तिकर्ताओं के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाई और एनआरसी के उन अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग भी की जिन्होंने इन आपत्तियों को स्वीकार किया. परंतु आपत्तिकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई.

इसी तरह की परेशानियां वे लोग भी भुगत रहे हैं जिनके नाम एनआरसी के पहले मसविदे में शामिल नहीं किए गए हैं. कई मामलों में एक ही परिवार के कुछ लोगों को नागरिक मान लिया गया तो कुछ को अवैध प्रवासी घोषित कर दिया गया है. सोलह वर्ष के फुलवर अली अपने पिता सुल्तान अली महमूद और अपने परिवार के बारह सदस्यों के साथ सुनवाई केन्द्र पर पहुंचे क्योंकि उनका और उनकी 14 वर्षीय बहन का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किया गया था. उनके परिवार के अन्य दस सदस्यों के नाम सूची में शामिल थे. उनका और उनकी बहन का नाम एनआरसी में इसलिए शामिल नहीं किया गया क्योंकि उनके स्कूलों द्वारा जारी प्रमाणपत्रों में उनके नाम गलत लिख दिए गए थे. फुलवर के माता-पिता मजदूर हैं. उनके दादाजी, जो उनके साथ सुनवाई के लिए पहुंचे थे, कमर के नीचे लकवाग्रस्त हैं. उनके परिवार के बारह सदस्यों को सुनवाई केन्द्र पर पहुंचने के लिए एक निजी वाहन किराए पर लेना पड़ा. वाहन मालिक ने उनसे 6,000  रूपये वसूल किए. इसके अतिरिक्त, उन्हें अपनी दो दिनों की मजदूरी भी खोनी पड़ी. यह एक ऐसे परिवार के लिए बड़ा नुकसान था जो रोज खाता-कमाता है. वे सुनवाई केन्द्र पर सुबह नौ बजे पहुँच गए थे परंतु तथ्यांवेषण दल जब शाम चार बजे वहां पहुंचा तब तक उनकी सुनवाई नहीं हुई थी. उन्होंने कहा कि यदि आज उनका नंबर नहीं लगा तो उन्हें अगले दिन सुबह फिर से आना होगा.

सुनवाई केन्द्रों पर दावेदारों और उनके परिवारों के बैठने के लिए कोई जगह तक नहीं है. उन्हें केन्द्र के बाहर जमीन पर बैठना पड़ता है. हजारों नागरिकों के नाम मामूली गलतियों के कारण एनआरसी में शामिल नहीं किए गए हैं. इनमें नामों की वर्तनी गलत होना शामिल है.

मुसलमानों के विरूद्ध पूर्वाग्रह

यद्यपि एनआरसी की प्रक्रिया में आदिवासी और अन्य समुदायों के लोग भी परेशान हो रहे हैं परंतु सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधिकारियों का मुसलमानों के विरूद्ध पूर्वाग्रह बहुत स्पष्ट है. यह इससे साफ है कि जिन चालीस लाख लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं किए गए हैं, उनमें से पन्द्रह लाख मुसलमान हैं. तथ्यांवेषण दल को बताया गया कि जिन इलाकों में हिन्दुओं की बहुसंख्या है वहां के निवासियों के दस्तावेजों की जांच कड़ाई से नहीं की जाती. इसके विपरीत, मुस्लिम-बहुल इलाकों के रहवासियों के दस्तावेजों को बहुत बारीकी से देखा-परखा जाता है और जरा-सी गलती होने पर उनके दावे खारिज कर दिए जाते हैं.

कुछ अधिकारी मुसलमानों के प्रति अपने तिरस्कार के भाव को छुपाने का प्रयास भी नहीं करते. लुंगीधारी, दाढ़ी वाले व्यक्ति को देखते ही उसे बांग्लादेशी मान लिया जाता है, भले ही उसके दस्तावेज कुछ भी कहते हों.

जिन डीओ से हमने बात की उनकी अपनी समस्याएं हैं. ज्यादातर डीओ कालेज प्राध्यापक हैं और उनके सहायक, स्कूल अध्यापक हैं. उनसे बातचीत करने पर ऐसा लगता है मानो उन पर एनआरसी का काम जबरदस्ती थोप दिया गया हो. कई को तो एसएमएस के जरिए एनआरसी का काम संभालने का निर्देश दिया गया. इस तरह की प्रक्रिया को संपादित करने के लिए न तो उन्हें कोई प्रशिक्षण दिया गया है और ना ही उन्हें इसका कोई अनुभव है. (अगले अंक में जारी…)

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