सबका विश्वास, किसका विश्वास – वीरेन्द्र जैन

2:40 pm or July 9, 2019
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सबका विश्वास, किसका विश्वास

  • वीरेन्द्र जैन

नरेन्द्र मोदी ने सबका साथ, सबका विकास में एक और टुकड़ा जोड़ा है ‘सबका विश्वास’। यह टुकड़ा उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में जोड़ा है जिसका अर्थ है कि वे स्वीकार करते हैं कि स्पष्ट बहुमत वाली सीटें जीत कर भी दोनों बार ही उन्हें देश में सबका विश्वास प्राप्त नहीं था।

हमारे बहुदलीय लोकतंत्र में सरकार बनाने वाले दल को सबका विश्वास सम्भव भी नहीं होता, इसमें मिले हुए समर्थन से भी बड़ा किंतु बिखरा विपक्ष सामने रहता है। दोनों ही बार स्पष्ट बहुमत वाली सदस्य संख्या से सरकार बना लेने के बाद भी भाजपा के पक्ष में क्रमशः 31% और 37% मत ही उन्हें मिले हैं। दक्षिण के राज्यों से उन्हें वैसी जीत नहीं मिली है जैसी मध्य और पश्चिमी राज्यों में मिली है।

असल में सबका विश्वास से उनका आशय सभी जातियों और धर्मों के लोगों का विश्वास प्राप्त करने से लगाया गया है। चूंकि भाजपा एक हिन्दूवादी सवर्ण पार्टी के रूप में जानी जाती है और अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों का समर्थन भाजपा को नहीं मिलता। इतना ही नहीं अपितु माना जाता है कि मुसलमानों का वोट उस पार्टी को जाता है जो भाजपा को हराता हुआ नजर आती है। इस तरह से देश की लगभग बीस प्रतिशत आबादी का मत गैर राजनीतिक आधार पर लुट जाता है। शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, मंहगाई, सुरक्षा आदि के सवाल उनकी पहचान और अस्तित्व की रक्षा के पीछे छुप जाते हैं। जिन्हें ये वोट मिल जाते हैं वे अपने मूल वोटों से मिला कर अपने कमजोर या बिना मुद्दों के भी चुनाव जीत जाते हैं। काँग्रेस, समाजवादी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल काँग्रेस ही नहीं कुछ हद तक वामपंथियों को भी इसका चुनावी लाभ मिला है। इसके विपरीत जनसंघ के नये रूप भाजपा को कट्टर हिन्दूवादी वोट भी ऐसे ही मिल जाते हैं।

लोकतंत्र को नुकसान पहुँचाने वाले ध्रुवीकरण से दोनों तरफ लाभ होता है किंतु हिन्दूवादी दलों को उसका अधिक लाभ मिलता है क्योंकि वे बहुसंख्यक हैं। यही कारण है कि विभिन्न निष्पक्ष जाँच आयोगों ने पाया है कि प्रायोजित दंगों में हिंसा किसी भी पक्ष की ओर से अधिक हुयी हो, पर साम्प्रदायिकता फैलाने का प्रारम्भ बहुसंख्यकों के दलों से जुड़े संगठन ही करते हैं। वे ही नफरत फैलाने और बनाये रखने के लिए मासूम किशोरों व बच्चों को जोड़ कर नियमित बैठकें करते रहते हैं, उन्हें असत्य इतिहास सिखाते हैं व नफरत के बीज बोते हैं। 1992 के बाद इसी होड़ में कुछ मुस्लिम संगठन भी यही काम करके परोक्ष में उनकी मदद करने लगे हैं। इससे वातावरण ज्वलनशील बना रहता है, जिसमें आग लगाने के लिए एक छोटी सी चिनगारी ही काफी होती है। भाजपा इसका उपयोग करने में सिद्धहस्त हो चुकी है। अब तो उसके पास कम्प्यूटराइज्ड आंकड़े और सोशल मीडिया भी दुरुपयोग के लिए उपलब्ध हैं। उल्लेखनीय है कि ताज़ा चुनावों में लगभग नब्बे प्रतिशत सदस्य करोड़पति हैं और 40% से अधिक लोग गम्भीर अपराधों के दागी हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हुआ है क्योंकि चुनाव के मुद्दे वे नहीं थे जो होना चाहिए थे। ध्रुवीकरण, धनबल और बाहुबल ने साथ आकर लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल दिया है।

सवाल उठता है कि जब सरकारी दल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक समर्थन पाकर अधिक सीटों के साथ पुनः सत्तारूढ हो गया है तो सबका विश्वास क्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि सुधारने का जुमला है या सचमुच का बदलाव है? सन्देह इसलिए भी होता है क्योंकि जब तक कि वे एक मध्यम मार्गी राजनीतिक दल के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर लेते, ध्रुवीकरण से दूरी कैसे बना सकते हैं, जो उनकी सफलता का मूल आधार है और उसे छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना होगा। भाजपा का जो मूल वोट है वह मुसलमानों के प्रति नफरत से ही जुड़ा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित आतंकी घटनाओं का स्तेमाल अपने देश के मुसलमानों के प्रति नफरत बढाने में किया जाता है। कश्मीर के अलगाववादियों को भी साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा जाता है और प्रचारित किया जाता है। दूसरी तरफ कुछ मुस्लिम राजनीतिक दल मुसलमानों के बीच इस बात को प्रचारित करने में लगे हैं कि उनका हित धर्मनिरपेक्ष दलों की जगह उनके साथ आने में सुरक्षित है। इन दलों को तेलंगाना, असम, केरल और महाराष्ट्र में समर्थन बढता भी जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि स्वभावतः धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर वामपंथी पार्टियों को समर्थन घटा है। अवसरवादी धर्मनिरपेक्ष दलों के सदस्य कब सत्तारूढ दल की गोदी में बैठ जायें इसकी कोई गारंटी नहीं है।

भाजपा भी अब पुरानी भाजपा नहीं है अपितु वह और अधिक चतुर मोदीशाह जनता पार्टी है, जो अटल बिहारी वाजपेयी तक की रीति नीतियों को सम्मान के साथ याद नहीं करती, अपितु उनके कार्यकाल को भी काँग्रेस शासन से जोड़ कर देखती है। पुराने सारे लोगों को किनारे लगा दिया गया है और उनका भी विश्वास इन्हें हासिल नहीं है। जो लोग चुन कर लाये गये हैं वे चुनाव जिता देने के लिए उपकृत भक्त तो हैं किंतु विश्वसनीय नहीं हैं इसलिए उन्हें सत्ता से दूर रखा जा रहा है। राजनाथ सिंह जैसे इक्के दुक्के पुराने मंत्री भी सत्ता में प्रतीक की तरह हैं और सत्ता के प्रमुख फैसलों के लिए नौकरशाही से लोग लाये गये हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, राम जेठमलानी, आदि का विश्वास तो पहले ही हार चुके थे, अब तो अडवाणी, जोशी, शांता कुमार ही नहीं, सुषमा स्वराज और अरुण जैटली का विश्वास भी प्राप्त नहीं है। सुब्रम्यम स्वामी जैसे लोग तो पहले भी आलोचक रहे हैं और अब तो सारे अर्थशास्त्री भी उन जैसी भाषा बोलने लगे हैं। एनडीए के साथियों में से सबसे प्रमुख दल जेडी[यू] उनसे विमुख हो गया है व शिवसेना भी संतुष्ट नहीं हो पा रही है। अपना दल रूठा हुआ है, तो बीजू जनता दल तो सदा से दूरी बना कर चलता रहा है। तृणमूल काँग्रेस के लिए भरपूर कोशिश की गयी थी किंतु ममता बनर्जी भी फिलहाल दुश्मनी दिखा कर चल रही हैं।

जिन लोगों की हरकतों के कारण दुनिया भर में बदनामी हो रही है, उनके खिलाफ भी केवल जुबानी जमा खर्च चल रहा है, किसी के प्रति भी प्रभावी अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हुयी है। कहा तो यह भी जा रहा है कि आरएसएस भी मोदीजी के कद को जरूरत से ज्यादा बढने में खतरा महसूस कर रहा है और छवि निखारने वाले किसी भी कदम को वापिस लेने का दबाव बना सकता है, जैसा कि प्रारम्भ में कथित गौरक्षकों के खिलाफ दिये गये अपने बयान से मोदी को पीछे हटना पड़ा था। उनका यह कहना भी जुमला ही साबित हुआ कि किसी दलित को मारने की जगह मुझे मारो। अब भी दलित उनके गुजरात में ही घोड़ों से उतार उतार पीटे जा रहे हैं।

क्या सबका विश्वास जीतने का जुमला केवल कुछ मुख्तार अबास नकवी, और शाहनवाज जोड़ने तक सीमित होकर रह जायेगा?

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