बाल यौन शोषण समाज और सरकार के लिए सर्वाधिक उपेक्षित और हाशिये की चिंता है – शैलेन्द्र चौहान

5:19 pm or July 15, 2019
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बाल यौन शोषण समाज और सरकार के लिए सर्वाधिक उपेक्षित और हाशिये की चिंता है

शैलेन्द्र चौहान

हाल ही में जयपुर एक आदतन यौन अपराधी एक सात वर्ष की अबोध बच्ची के साथ बलात्कार कर घायल अवस्था में उसे छोड़कर भाग गया। लोगों के बड़े प्रतिरोध के बाद पुलिस चेती और अपराधी को पकड़ने की मुहिम में तेजी लाई तब अपराधी पकड़ा गया। इससे पहले भी एक चार साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी लेकिन अपराधी पकड़ में नहीं आया था। जबकि ऐसी घृणित और विकृत मानसिकता वाला अपराधी वही व्यक्ति था। वह अपराधी पहले भी ऐसे ही अपराध में पकड़ा जा चुका था। उसके खिलाफ अन्य अपराधों में भी कई मुकदमे दर्ज़ हैं। उसने फौरी तौर पर खुद स्वीकारा है कि कमसेकम ऐसी 25 अन्य घृणित वारदातों को अंजाम दिया है। सवाल ये है कि हमारी पुलिस और हमारा समाज ऐसे अपराधियों के प्रति लचीला और असावधानी वाला रवैया क्यों अपनाते हैं। ऐसे अपराधी जिनकी गतिविधियां संदिग्ध और समाज विरोधी होती हैं उन्हें उनके कुकृत्यों के लिए अनदेखा करते हैं। घरवाले और उनके जानने वाले उन्हें प्रश्रय भी देते हैं। वे इसकी जानकारी पुलिस और प्रशासन को नहीं देते। वहीँ पीड़ित व्यक्ति के संबंधी जब पुलिस में रिपोर्ट करने जाते हैं तो पुलिस टालू रवैया अपनाती है। वह तभी हरकत में आती है जब ऊपर से दबाव पड़ता है या बड़ा प्रतिरोध होता है।
सन 2017 की भारत सरकार और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 प्रतिशत बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं। सन 2016 में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट के तहत 15 हजार मुकदमे दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मामलों में आराेपी को सजा हुई। जबकि 6 प्रतिशत छूट गए और 90 प्रतिशत मामले अभी भी लंबित हैं। कुछ राज्यों की स्थिति तो ऐसी है कि यदि बाल अपराध होना बंद हो जाएं तो भी लंबित मामलों के निपटारे में ही 10 से 40 साल लग जाएंगे। ध्यान देने की बात है कि बाल यौन शोषण एक ऐसा अपराध है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है, क्योंकि लोग इस पर बात करने से बचते हैं। कहा जा सकता है कि बाल यौन शोषण हमारे समाज द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक कुकृत्यों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित और हाशिये पर की चिंता है। इसे नज़रंदाज़ करने के करण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है। बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है। भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है। जबकि इस विषय के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के प्रयासों के द्वारा इस प्रकार की घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
वैसे तो भारत में बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार के खि़लाफ व्यापक कानूनी ढाँचा है। किंतु इतने कानूनों एवं योजनाओं के बावजूद इनकी तकनीकी चूक तथा इनके कार्यान्वयन में अनियमितता, त्वरित कार्रवाई न होने के कारण ये घटनाएँ होती हैं। इसके लिये जरूरी है सजगता एवं जागरूकता। ऐसे में जरूरी है कि प्राथमिक स्तर पर घर-परिवार, माता-पिता एवं परिजन बच्चों से मिलने वालों एवं उनके साथ खेलने वालों के प्रति सजग रहे वहीं बच्चों को भी असामान्य ‘व्यवहार’ के प्रति सजग रहने के लिये प्रेरित करना चाहिये। स्कूलों में जहाँ अनिवार्य मनोवैज्ञानिक कैंप होने चाहिये, तो वहीं डॉक्टर, मीडिया व पुलिस को भी इन घटनाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिये। इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया के अश्लील सामग्री पर अविलंब रोक लगनी चाहिये। वही इंटरनेट साइट्स पर पैरेंटल कंट्रोलिंग के विकल्प को मजबूत करना चाहिये। बाल अधिकारों की रक्षा के लिये ‘संयुक्त राष्ट्र का बाल अधिकार कन्वेंशन (CRC)’ एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो सदस्य देशों को कानूनी रूप से बालअधिकारों की रक्षा के लिये बाध्य करता है।
भारत में बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार के खि़लाफ सबसे प्रमुख कानून 2012 में पारित यौन अपराध के खि़लाफ बच्चों का संरक्षण कानून (POCSO) है। इसमें अपराधों को चिह्नित कर उनके लिये सख्त सजा निर्धारित की गई है। साथ ही त्वरित सुनवाई के लिये स्पेशल कोर्ट का भी प्रावधान है। यह कानून बाल यौन शोषण के इरादों को भी अपराध के रूप में चिह्नित करता है तथा ऐसे किसी अपराध के संदर्भ में पुलिस, मीडिया एवं डॉक्टर को भी दिशानिर्देश देता है। वैसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (बलात्कार), 372 (वेशयावृत्ति के लिये लड़कियों की बिक्री), 373 (वेश्यावृत्ति के लिये लड़कियों की खरीद) तथा 377 (अप्राकृतिक कृत्य) के अंतर्गत यौन अपराधों पर अंकुश लगाने हेतु सख्त कानून का प्रावधान है। 8 जनवरी, 2019 को लोकसभा में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (संशोधन) बिल, 2019 पेश किया। बिल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण एक्ट, 2012 में संशोधन करता है। यह एक्ट यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से बच्चों के संरक्षण का प्रयास करता है।
वर्ष 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय के द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ जिन बच्चों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से 53 प्रतिशत ने कहा कि वह किसी न किसी क़िस्म के यौन शोषण के शिकार हुए हैं। अध्ययन से पता चला कि विभिन्न प्रकार के शोषण में पांच से 12 वर्ष तक की उम्र के छोटे बच्चे शोषण और दुर्व्यवहार के सबसे अधिक शिकार होते हैं तथा इन पर खतरा भी सबसे अधिक होता ह। इन शोषणों में शारीरिक, यौन और भावनात्मक शोषण शामिल होता है। इस अध्ययन के मुताबिक़ आम धारणा है कि मात्र लड़कियों का ही यौन शोषण होता है लेकिन इसके विपरीत लड़कों पर भी बराबर ख़तरा रहता है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि बड़ी संख्या में शोषणकर्ता ‘भरोसे के और देख-रेख करने वाले लोग’ होते हैं जिनमें अभिभावक, रिश्तेदार और स्कूल शिक्षक, घरेलू नौकर, ड्राइवर, पडोसी आदि शामिल हैं। अध्ययन के अनुसार हरेक तीन में से दो बच्चे शारीरिक शोषण के शिकार बने. शारीरिक रूप से शोषित 69 प्रतिशत बच्चों में 54.68 प्रतिशत लड़के थे। 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के शारीरिक शोषण के शिकार थे। 20.90 प्रतिशत बच्चों ने गंभीर यौन शोषण का सामना करने की बात कही, जबकि 50.76 प्रतिशत बच्चों ने अन्य प्रकार के यौन शोषण की बात स्वीकारी। पारिवारिक स्थिति में शारीरिक रूप से शोषित बच्चों में 88.6 प्रतिशत का शारीरिक शोषण माता-पिता ने किया। आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और दिल्ली से अन्य राज्यों की तुलना में सभी प्रकार के शोषणों के अधिक मामले सामने आये। 50 प्रतिशत शोषक बच्चों के जान-पहचान वाले या विश्वसनीय लोग जिम्मेवार थे। 83 प्रतिशत मामलों में माता-पिता ही शोषक थ। 48.4 प्रतिशत लड़कियों ने कहा कि वे लड़के होते तो अच्छा था।  दुनिया में यौन शोषण के शिकार हुए बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है लेकिन फिर भी यहां इस बारे में बात करने में हिचक दिखती है।
एक चिकित्सा निदान के रूप में, बाल यौन शोषण पीडोफिलिया (या पेडोफिलिया), को आमतौर पर वयस्कों या बड़े उम्र के किशोरों (16 या उससे अधिक उम्र) में मानसिक विकार या विकृति के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो गैर-किशोर बच्चों, आमतौर पर 13 साल या उससे कम उम्र के प्रति प्राथमिक या विशेष यौन रूचि द्वारा प्रदर्शित होता है। 16 या उससे अधिक उम्र के किशोर शोषकों के मामले में बच्चे को कम से कम पांच साल छोटा होना चाहिए।  पीडोफ़ीलिया एक ऐसी स्थिति है जिसे समाज घृणित मानता है लेकिन साथ ही साथ उससे जुड़े मामलों से आकर्षित भी होता है। सामान्यतः पीडोफ़ाइल ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जिसे बच्चों के संपर्क से यौन आनंद मिलता है। पीडोफ़ीलिया की स्थिति उत्पन्न होने के लिए एक वयस्क, एक बच्चा और असहमति से बनाए गए यौन संबंध का होना ज़रूरी होता है। पश्चिम के देशों में इसके शाब्दिक अर्थ को पीडोफाइलों द्वारा, जो अपनी पसंद को दर्शाने के लिए प्रतीकों और कोड का इस्तेमाल करते हैं “बाल प्रेम” या “बाल प्रेमी” शीर्षक के तहत बच्चों के प्रति यौन आकर्षण के रूप में बदल दिया गया है। रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) ने पीडोफिलिया को “वयस्क व्यक्तित्व और व्यवहार के विकार” के रूप में पारिभाषित किया है। जिसमें छोटे उम्र के किशोरों या बहुत छोटे उम्र के बच्चों के प्रति यौन रूचि होती है। मनोरोग, मनोविज्ञान, स्थानीय भाषा और कानून प्रवर्तन में शब्द की कई परिभाषाओं को पाया गया है. डाइगनोस्टिक एंड स्टेटिसटिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर्स (DSM) के अनुसार पीडोफिलिया एक पैराफिलिया है जिसमें एक व्यक्ति छोटे बच्चों की ओर भावुक और बारम्बार यौन आग्रहों की दिशा में कल्पनाशील हो जाता है और जिसके बाद वह या तो यथार्थ में इसे पूरा करता है या जो मानसिक रूप से ऐसे प्राप्त करने में सक्रिय रहता है और इंटरनेट तथा अन्य माध्यमों में पोर्नोग्राफी में लिप्त होता है।
बीते दिनों ‘डिजिटल युग में बच्चों के यौन शोषण’ समस्या पर कोलकाता में आयोजित पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों द्वारा इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताते हुए इसकी रोकथाम लिए कई सुझाव पेश किए। सम्मेलन में बताया गया कि भारत में वर्ष 2017 में बच्चों के यौन उत्पीड़न के लगभग 24 लाख मामले सामने आए थे. उक्त सम्मेलन में छह देशों के पुलिस अधिकारियों के अलावा जर्मनी, बांग्लादेश, केन्या और कनाडा समेत 15 देशों के सरकारी प्रतिनिधियों, वकीलों, न्यायाधीशों के अलावा फेसबुक, डेलॉयट व प्राइस वाटरहाउस कूपर्स जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में इस दो-दिवसीय सम्मेलन का आयोजन द वेस्ट बंगाल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइट्स (डब्ल्यूबीसीपीसीआर) ने इंटरनेशनल जस्टिस मिशन (आइजेएम) के साथ मिल कर किया था। सम्मेलन का मकसद दुनिया भर से इस विषय के विशेषज्ञों को एक मंच पर लाकर, विचारों के आदान-प्रदान और परिचर्चा के जरिए एक विस्तृत और प्रभावी समाधान सामने लाना था, ताकि मानव तस्करी में तकनीक की उभरती भूमिका पर बात हो सके। विशेषज्ञों का कहना था कि अपराधियों की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली नई तकनीक ने कानून, प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका के साथ-साथ पीड़ितों को सेवा मुहैया कराने वालों के सामने नई चुनौती पेश की है। ज्यादातर देशों में इन अपराधों से निपटने के लिए संसाधनों की भारी कमी है। ऑनलाइन जांच और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) से सबूत हासिल करने और उनको अदालत में पेश करने में समस्याएं सामने आती हैं।
कानूनी तौर पर वर्ष 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने वाला क़ानून (पॉस्को) बनाया गया ताकि बाल यौन शोषण के मामलों से निपटा जा सके। लेकिन इसके तहत पहला मामला दर्ज होने में दो साल लग गए। वर्ष 2014 में नए क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए लेकिन उसके अलावा इसी साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले; बच्ची पर उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले; यौन शोषण के 4,593 मामले; बच्ची को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए। ये आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पॉस्को लगाया ही नहीं गया। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क़ानून बहुत अच्छा है लेकिन इसके अमल और सज़ा दिलाने की दर में भारी अंतर है। इस पर केवल 2.4 प्रतिशत मामलों में ही अमल हुआ है। राही (रिकवरिंग एंड हीलिंग फ़्रॉम इंसेस्ट) फ़ाउंडेशन- इंसेस्ट और बाल यौन शोषण से लड़ने वाला भारत का पहला संगठन है। इसकी प्रमुख अनुजा गुप्ता कहती हैं अभिभावक सामान्यतः यौन शोषण की बात स्वीकार करने में हिचकते हैं और परिवार के सदस्यों की यौन हिंसा की बमुश्किल कभी शिकायत की जाती है। उनके अनुसार ‘ख़ामोशी के इस षड्यंत्र’ के   पीड़ितों, उनके परिवारों और संपूर्ण समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। “ये पूरी तरह असहायता और सदमा पीड़ित को कमज़ोर कर देते हैं। एक बच्चे के लिए आगे आकर यह कहना बहुत मुश्किल होता है कि उसका शोषण किया गया और किसी ने कुछ नहीं किया। यह उनके लिए बहुत हानिकारक होता है।” दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से एक निर्दलीय सांसद राजीव चंद्रशेखर ने इस समस्या को एक ‘महामारी’ बताते हुए दिल्ली में एक ‘ओपन हाउस’ का आयोजन किया था जिसका उद्देश्य था कि ‘हम बाल यौन शोषण के बारे में बात करना शुरू करें और अपने बच्चों को बचाएं।  “चिंता की बात यह है कि बाल यौन शोषण भारत में एक महामारी बन चुका है। इस समस्या को गोपनीयता और इनकार की संस्कृति ने ढक रखा है और सरकारी उदासीनता से यह बढ़ी है। ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि बाल यौन शोषण उतने बड़े पैमाने पर नहीं है जितना मैं कह रहा हूं लेकिन आंकड़े मेरी बात की गवाही देते हैं।” बैंगलुरु, दिल्ली और भारत भर में बच्चों के यौन शोषण के कई हाई-प्रोफ़ाइल मामले सामने आए हैं- यह आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि देश में हर तीन घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण होता है। इन हैरान कर देने वाले आंकड़ों के बावजूद बाल यौन शोषण पर बात करने की चंद्रशेखर की कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं। विडंबना यह कि ट्विटर पर महीनों तक उन पर ‘भारत को बदनाम करने के पश्चिमी षड्यंत्र का हिस्सा’ होने का आरोप लगाया जाता रहा। उनका कहना है कि यही बाल यौन शोषण और इंसेस्ट (परिवार के अंदर व्यभिचार) को रोकने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है। आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और दिल्ली से अन्य राज्यों की तुलना में सभी प्रकार के शोषणों के अधिक मामले सामने आये।  ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में भारत के 13 राज्यों के 12,500 बच्चों पर किए सरकारी सर्वेक्षण का हवाला दिया गया। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि जवाब देने वाले आधे बच्चों ने कहा कि उन्होंने किसी न किसी प्रकार का यौन उत्पीड़न अनुभव किया है।
इसके निदान और सतर्कता के लिए बेहतर होगा कि अभिभावक खुद अपने बच्चों के इस अपराध के बारे में बताने की कोशिश करें। किसी भी बच्चे का पहली क्लास उसका घर होता है और पहली टीचर उसकी मां होती है। इसलिए समय की आवश्यकता के मुताबिक आज की मम्मी को स्मार्टली अपने बच्चों को इस दूषित वातावरण के बारे में समझाना होगा। अभिभावकों को अपने बच्चों को किसी अजनबी से बात करने को, उससे कोई सामान लेने से मना करना होगा। बच्चों को आप गुड टच और बैड टच के बारे में खुलकर बतायें। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आप अपने बच्चों के सबसे अच्छे दोस्त बनें ताकि बच्चे आप से कोई भी बात छुपाये नहीं और अपने साथ हुई हर बात को वो आपसे बेझिझक शेयर करें। वहीँ समाज में लोगों की संवेदना जगाने के लिए बृहत् प्रयासों की आवश्यकता है ताकि अपराध करने वालों को चिन्हित किया जा सके, उन्हें इन अपराधों से रोका जा सके, समझाया जा सके। इसके लिए सरकार और नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे। सामाजिक समूहों और संस्थाओं को आगे आना होगा ताकि कल हम एक बेहतर और सुरक्षित समाज बना सकें।
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