भूख और भोजन के दो रूप – शब्बीर कादरी

5:18 pm or July 18, 2019
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भूख और भोजन के दो रूप

  • शब्बीर कादरी

विश्व की बड़ी आबादी भारत अनेक विकासशील विसंगतियों से जूझ रहा है जिसमें से एक भुखमरी है। यद्यपि दुनिया के कई देशों में इस अभिशाप के चलते त्राहिमाम की स्थिति है जिसमें उत्तर कोरिया, बांग्लादेश, ईराक और सोमालिया सहित पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी शामिल हैं। हमारे लिए चिंता, लज्जा और दुख की बात यह है कि बर्ल्ड हंगर इंडेक्स में पहले हम 97 क्रम पर थे और अब हमारा नम्बर 100वें स्थान पर आ पहुंचा है। इस आधुनिक युग में जहां नई-नई तकनीक से लैस असंख्य देश अपनी अतुलनीय आधुनिक उपलब्धियों पर प्रतिद्वन्दी से आगे निकलने की होड़ में अपना सब कुछ झोंक रहे हैं। वहीं भुखमरी जैसी स्थिति किसी भी देश के लिए इतनी ढेर उपलब्यिं पर पानी फेरने को तैयार खड़ी है। प्रश्न है कि आदिकाल से चली आ रही यह पस्थिति आज भी समाज में चुनौती बनी क्यों खड़ी है, और क्यों इतनी उन्नत तकनीक और लगभग आत्मनिर्भर बन चुके देश इस बीमारी का सटीक उपचार आज भी नहीं खोज पाए है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 11.3 करोड़ लोग अत्यंत भूख से पीड़ित हो नित्यप्रति जी भी रहे और मर भी रहे हैं। भूख से तड़पते ये लोग विश्व के लगभग 53 देशों में पाए जाते हैं जिसमें भारत भी शामिल है। इस समस्या से सर्वाधिक पीड़ित देश अफ्रीका है और कुल भुखमरी से ग्रस्त यह तीन-चौथाई आबादी युद्ध झेल रहे यमन,सीरिय,अफगानिस्तान और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आफॅ कांगो जैसे आठ देशों में रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक विषेष ऐजेंसी भुखमरी से ग्रस्त देशों का अध्ययन करती है और वर्ष में एकबार इसकी रिर्पोट जारी करती है इस संबंध में उनकी ताजा रिपोर्ट बताती है कि अेफ्रीकी देशों में 7.2 करोड़ लोग विकट भुखमरी से ग्रस्त हैं। याद रहे जीवन के समक्ष संकट और असुरक्षा इस समस्या का प्रमुख कारण है इसके अतिरिक्त रूप बदलता जलवायु परिवर्तन जो सूखा, अकाल और बाढ़ की स्थिति पैदा कर रहा है इसी कारण आर्थिक संकट और भुखमरी पैदा कर रहा हैं।

खाद्यान्न वितरण प्रणाली में सुधार तथा अधिक पैदावार के लिए कृषि क्षेत्र में नित नए अनुसंधान के बावजूद भारत में भुखमरी के हालात बिगड़ते जा रहे हैं यही कारण है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में अपना देश तीन नम्बर और नीचे खिसक गया है। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार गत वर्ष भारत विश्व के कुल 119 में 97 क्रमांक था अब 100 नम्बर तक आ पहुंचा है। सूची में चीन हमसे कहीं आगे अर्थात 29 नम्बर पर, नेपाल 72 नम्बर पर, म्यांमार 77वें नम्बर पर, श्रीलंका 84वें, बांग्लादेश 88वें, पाकिस्तान 106 और अफगानिस्तान 107वें क्रम पर हैं। हंगर इंडेक्स में किसी भी देश में भुखमरी के हालात का आकलन वहां के बच्चों में कुपोषण की स्थिति, शारीरिक अवरूद्धता और बाल मृत्यु दर के आधार पर किया जाता है।

आईएफपी आरआई की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है यहा पांच से कम उम्र के हर पांचवें बच्चे का वजन उसकी लंबाई के हिसाब से बहुत कम है। हमारे यहां देश में 21 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास नहीं हो पाता इसकी बड़ी वजह कुपोषण है। यह भूख और भोजन का एक रूप है।

भूख और भोजन का दूसरा रूप वह वैश्विक आंकड़ा है जो हमें बताता है कि प्रतिवर्ष विश्व में लगभग 1.3 अरब टन से अधिक खाद्य सामग्री बर्बाद हो जाती है और हर सात में से एक व्यक्ति भूखे पेट सोने को मजबूर होता है जबकि प्रतिदिन 20 हजार से अधिक बच्चे भूख और कुपोषण से दम तोड़ देते है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का मत है कि संसार में कुल उत्पादित खाद्य पदार्थ का तिहाई हिस्सा पैदावार, संग्रहण, परिवहन और उपभोग के कारण नष्ट हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का मत है कि वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी मौजूदा सात अरब से बढ़कर नौ अरब तक पहुंचने का अनुमान है ऐसे में जबकि एक विशाल आबादी का आने वाले समय में पेट भरना विकट चुनौती बन सकता है विश्व समुदाय को खाद्यान्न और खाने की बर्बादी पर चेतना होगा। वैसे खाने की सबसे अधिक बर्बादी अमेरिका में होती है जहां प्रति व्यक्ति हर वर्ष लगभग 100 से 120 किलाग्राम खाना नष्ट कर देता है। यूरोप में 60 से 110 किलोग्राम और विकासशील देश 6 से 11 किलोग्राम खाना बर्बाद करते हैं। भारत में विवाह और अन्य समारोहों में परोसे गए भोजन का पांचवां अंश कूड़े में फेंक देते है। बच्चों के कुपोषण के मामले में हम विश्व में दूसरे नम्बर पर हैं। विशेषज्ञों का मत है कि कुशल श्रमशक्ति और आधारभूत सुविधाओं के आभाव में देश के कुल उत्पादित अनाज का 40 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाता है। ऐसे में जबकि पर्यावरण पर बोझ बढ़ाने के बाद भी यदि एक अरब टन से भी अधिक खाद्य सामग्री नष्ट हो जाए तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि सब कुछ व्यर्थ हो गया।

पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर का मत है कि भारत में बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी होती है विशेषकर मध्यम तथा उच्च वर्ग शादी-ब्याह जैसे समारोहों में आवश्यकता से अधिक व्यंजन परोसते हैं जिसका बड़ा भाग जूठन के रूप में कचरे में फेंक दिया जाता है। श्री ठक्कर भंडारगृहों की कमी के चलते खुले में पड़े अनाज के सड़जाने पर भी चिंता व्यक्त करते हैं ंइसे नियति का संयोग कहें, दुर्भाग्य माने या फिर राजनीतिबाजों का असफल सत्तातंत्र, जिसमें यह भारतभूमि आज भी भूख से छटपटाते लगभग 230 मिलियन से अधिक ऐसे बदनसीब लोगों को अपने आंचल में आश्रय का सहारा देने को मजबूर है जो या तो बेसहारा हैं या गरीब से गरीबतर। ग्लोबल फूड एंड वेस्टेज रिपोर्ट के अनुसार लगभग जितना गेहूं आस्ट्रेलिया में पैदा होता है लगभग उतना हमारे यहां रखरखाव की कमी के चलते उपयोगहीन हो जाता है जो लगभग 21 मीट्रिक टन के आसपास या अधिक है। अनुमान है कि देश के कुल फल-सब्जी उत्पादन का 30 प्रतिशत शीतग्रहों की कमी के चलते हमारे यहां खराब हो जाता हैं 30 प्रतिशत गेहूं भी रखने की समुचित व्यवस्था न होने के चलते सड़ जाता है। इस प्रकार होने वाली हानियां हमारे यहां लगभग 50 हजार करोड़ रू. का आंकड़ा प्रतिवर्ष पार करती हैं।

दुनियाभर में लेफ्टओवर अर्थात बचे खाने को फेंकने के विरूद्ध जागृति अभियान चल रहे हैं। कई देशों में बचे हुए खाने को रिसाइकिल कर उसे मवेशियों को खाने लायक बनाने पर काम हो रहा है। गोवंश कूड़े-कचरे में चारा खोजने के चलते प्लास्टिक थैली सहित अन्य जहरीली चीजें खाकर बीमार पड़ रहा है इस प्रवृत्ति से अविलंब बचा जाना चाहिए। अगर शाकाहारी परिवार से प्रतिदिन एकत्रित किए गए बचे जूठन को रिसाइकिल कर चारा बना दिया जाए तो उससे आवारा मवेशियों को लाभ हो सकता है। देश की बढ़ती आबादी को भोजन देने, भुखमरी से मरने वालों के लिए गंभीर उपाय और बचे हुए भोजन का सदुपयोग करने के लिए हम कब सटीक योजनाऐ और कार्यक्रम बनाकर उसे सफलतापूर्वक लागू करेंगे इसकी प्रतीक्षा बाकी देश में कुपोषण और भुखमरी पर नियंत्रण पाने के लिए यद्यपि प्रयास तो किए जा रहे हैं पर इस विसंगति के समूल उन्मूलन हेतु आमजन में जागृति और अधिक कड़े प्रयास की गंभीर जरूरत है।

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