सैंया भये कुतवाल, 49-62 , माबलिंचिंग – वीरेन्द्र जैन

2:53 pm or July 30, 2019
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सैंया भये कुतवाल, 49-62 , माबलिंचिंग

  • वीरेन्द्र जैन

जब बेहूदगियों का नंगा नाच हो रहा हो तो किसी लेख का ऐसा ही शीर्षक सूझता है।

जब पूरा देश ऐसे वीडियो देख कर दहशत में जा रहा हो जिसमें किसी अकेले आदमी को पकड़ कर एक समूह इतनी निर्ममता से पीटता दिखता है कि उसकी जान चली जाये, जिसे दर्जनों भयभीत लोग तटस्थ भाव से देखते रहने को मजबूर हों, या चोरी छुपे वीडियो बना रहे हों तो देश की सम्वेदनशील मेधा उसे चुपचाप नहीं देख सकती। एक समय तक वह आपराधिक घटना मानकर कानून की रखवाली करने वाली सरकार की कार्यवाही की प्रतीक्षा कर सकती है किंतु जब एक ही तरह की घटनाएं देश भर में होने लगें और निष्क्रिय सरकार अपराधियों के बचाव में दिखने लगे तो बुद्धिजीवी चुप कैसे बैठ सकता है। यही कारण था कि देश के जाने माने लेखकों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, और पत्रकारों की नृशंस हत्या के विरोध में विभिन्न क्षेत्रों में देश के शिखर सम्मान प्राप्त लोगों ने अपने सम्मान वापिस कर दिये थे। उल्लेखनीय है कि ऐसा करके उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर जैसे लोगों का अनुशरण किया था जिन्होंने जलियांवाला हत्याकांड के विरोध में अंग्रेजों द्वारा दी गयी उपाधि वापिस कर दी थी। उनके साथ देश भर के अनेक लोगों ने ‘सर’ की उपाधि वापिस की थी किंतु अंग्रेजों ने कभी उन्हें अवार्ड वापिसी गैंग कह कर नहीं पुकारा था। एक बार फिर देश के प्रमुख कला जगत के लोगों ने सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।

उक्त घटनाएं न केवल खराब कानून व्यवस्था का उदाहरण थीं अपितु एक खास विचारधारा के लोगों को हमलों का निशाना बनाया गया था। इन हमलों का आरोप भी उन लोगों पर लगा था जो अलग अलग नामों से सत्तारूढ दल की विचारधारा के समान सोच की संस्थाओं से थे। यही कारण रहा कि कानून व्यवस्था की इस टूटन पर सत्ताधारी दल के लोग चुप्पी साधे रहे। अगर वे इसे किसी असम्बद्ध का आपराधिक कर्म मानते तो उन लोगों के साथ खड़े होते जो इसका विरोध कर रहे थे या जाँच कार्यवाही में युद्धस्तर की कार्यवाही करते अथवा ऐसा बयान ही देते। उसकी जगह उन्होंने अपने पालतू मीडिया या सत्ता से लाभ लोभ के आकांक्षी कमतर लोगों को अधिक संख्या में बुद्धिजीवियों के विरोध में उतार दिया। इन लोगों के कथनों और बयानों में घटनाओं के सम्बन्ध में कहने को कुछ नहीं था किंतु घटनाओं के विरोध में आवाज उठाने वालों को देने के लिए गालियों का भंडार था। खेद की बात है कि इन्हीं की भाषा लेकर देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठ व्यक्ति ने भी उन्हें अवार्ड वापिसी गैंग या टुकड़े टुकड़े गैंग अर्बन नक्सल व पेशेवर निराशावादी कह कर अपनी वैचारिक दरिद्रता का परिचय दिया। ऐसे में 49 बुद्धिजीवियों के अनुरोध पत्र के उत्तर में सरकार 62 सिर गिनाने लगती है भले ही 49 में से किसी एक के मुकाबले पूरे 62 कहीं नहीं ठहरते हों।

हमारी न्याय व्यवस्था और जाँच व्यवस्था के दोषों के कारण बहुत सारे आरोपियों को सजा नहीं मिल पाती या इतनी देर से मिलती है कि वह ‘विलम्बित न्याय अर्थात अन्याय’ के कथन के अंतर्गत आ जाती है। किंतु जनता की आंखों देखी घटनाओं में बाइज्जत बरी हुआ आरोपी भी बरी नहीं होता है। न जाने कितने न्यायिक फैसलों में कोर्ट को लिखना पड़ा है कि आरोपी को इसलिए बरी करना पड़ रहा है क्योंकि प्रासीक्यूशन ने उचित तरीके से केस प्रस्तुत नहीं किया, सबूत पेश नहीं किये या गवाह पलट गये।

घटित घटनाओं पर सम्वेदनशील बुद्धिजीवियों की ईमानदार भावुक अपील पर भाड़े के लोग प्रतिकथन करते हैं कि ये लोग फलां घटना पर नहीं बोले थे पर यह नहीं बताते हैं कि कथित घटना पर वे स्वयं क्यों इसी तरह से नहीं बोले। और यदि बोले हों तो क्या इन बुद्धिजीवियों ने उनकी तरह से उनका विरोध किया! बुद्धिजीवी जिन घटनाओं पर बोले, उन पर क्या ये भाड़े के बुद्धिजीवी और चैनलों के एंकर बोले? ये केवल बोलने की प्रतिक्रिया में ही क्यों बोलते हैं? दायित्व तो यह है कि जिसको जहाँ गलत दिख रहा हो वह उसके खिलाफ बोले और एक दूसरे का सहयोग करे किंतु सरकार की गलतियों का बचाव करने वाले ये लोग घटनाओं को इंगित करने वालों का ही कुत्सित विरोध करके गलत घटनाओं के दोषियों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। किसी भी व्यक्ति को कानून के विरुद्ध हिंसा में सहयोग करना भी अपराध है। पीड़ित व्यक्ति यदि दलित, महिला, या अल्पसंख्यक जैसे कमजोर वर्ग का है तो हमारा संविधान भी उन्हें विशेष अभिरक्षण देने की बात करता है। इन वर्गों के प्रति विशेष सहानिभूति होना किसी सुशिक्षित सम्वेदनशील व्यक्ति का प्राथमिक कर्तव्य होता है। संविधान में आरक्षण व्यवस्था का भी यही आधार है।

निरंतर दुष्प्रचार से इन्होंने समाज के एक वर्ग के मन में यह बैठा दिया है कि मुसलमान विदेशी है, हिंसक है, आतंकियों का मददगार है, पाकिस्तान का पक्षधर है, आबादी में वृद्धि करके देश के संसाधनों का दोहन कर रहा है और एक दिन बहुसंख्यक हो जायेगा। इस दुष्प्रचार का तत्कालीन सत्तालोभियों ने कभी प्रभावी विरोध नहीं किया। यही कारण है कि एक वर्ग उन्हें दुश्मन मानता है और उनके किसी भी नुकसान पर अपनी विजय देखता है। मुसलमानों के अपने राजनीतिक दल भी वोट बैंक के लालच में ऐसी हरकतें करते हैं जिससे इस वर्ग की सोच को बल मिलता है। अखलाख की सरे आम हत्या हो या मुज़फ्फरनगर के दंगे हों उनमें गहराई तक बो दिये गये इस दुष्प्रचार ने मदद की। राजस्थान में शम्भू रैगर द्वारा वीडियो बना कर एक बंगाली मजदूर की गयी हत्या के बाद उसकी पत्नी के खाते में लाखों रुपये भेजने वाले कौन थे? उसके पक्ष में न्यायालय के शिखर पर भगवा झंडा फहराने वाले पचासों नौजवानों को किसने तैयार किया था? उस घटना के विरोध में इन भाड़े के लोगों में से कितने लोग बोले थे? माब लिंचिंग करते समय पीड़ित से जयश्री राम बुलवाना किस बात का प्रतीक है?

सच तो यह है कि दुष्प्रचार से प्रभावित यह वर्ग मोदीशाह वाली भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार आ जाने से ‘सैंया भये कुतवाल’ वाली मानसिकता में आ गया है और गुजरात से लेकर मुजफ्फरनगर तक विभिन्न आरोपियों के बरी होते जाने से प्रोत्साहित हो रहा है। आरोपियों के बचाव में जो लोग आते हैं वे एक ही नाल नाभि से जुड़े लोग हैं। राज्यों में सारी नैतिकताओं को तिलांजलि देकर सरकारें बनायी जा रहे हैं, ताकि दमनकारी ताकतों पर नियंत्रण बना रहे और अभियोजन अपने हाथ में रहे। आरटीआई जैसे कानूनों को बदलकर जनता के हाथों से बचीखुची ताकत छीनी जा रही है। एनएसए जैसी संस्थाओं की ताकत बढाई जा रही है सीबीआई को और पालतू तोतों से भरा जा रहा है।  शायद ऐसी ही स्थिति में इमरजैंसी के दौरान दुष्यंत कुमार ने लिखा था –

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

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