बढ़ रहे हैं महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध – शैलेन्द्र चौहान

2:37 pm or August 1, 2019
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बढ़ रहे हैं महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध

शैलेन्द्र चौहान
कहा जा रहा है किदेश आर्थिक प्रगति के स्‍वर्णिम दौर में है। चौड़ी चौड़ी सड़कें बन रही हैं और उस पर महंगी विदेशी गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। योजनाओं का अम्बार लगा है। कहा जा रहा है कि अगले पांच वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन रुपये की हो जाएगी। देश के गौरव और सुरक्षा की बात जोर शोर से हो रही है। अरबों रुपये हथियार ख़रीदे जा रहे हैं। दुनिया भर में देश की अच्छी छवि बनाने में भी अकूत धन खर्च हो रहा है लेकिन नागरिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर रहस्यमय कार्यशैली दिखती है। महिलाओं के उत्थान और बेटी बचाने की बात भी हो रही है, पर तीन वर्ष से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े सार्वजनिक नहीं किये जा सके हैं। लेकिन 2017 में सार्वजनिक किये गए पुराने आंकड़े आईना दिखा रहे हैं कि कानून व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सरकारें कितनी सजग और संवेदनशील हैं। प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते हुए हम यह क्या कर रहे हैं? क्या इस बात पर गंभीरता से विचार करना जरूरी नहीं है? स्पष्ट है कि यह मुद्दा सरकार की प्राथमिकता में बिलकुल ही नहीं है।
न जाने क्यों अपराध की राष्ट्रीय रिपोर्ट कई दशकों के बाद पहली बार सार्वजनिक नहीं की गई है। जबकि हर साल दिसंबर या उसके बाद के सत्र में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट संसद में पेश की जाती रही है। 13 फरवरी को 16 वीं लोकसभा का संसद सत्र खत्म हो गया मगर यह रिपोर्ट नहीं आई। हैरानी की बात है कि साल 2017 और 2018 के दौरान देश में अपराध कितना बढ़ा, रेप की घटनाएं कम हुई या ज्यादा, मर्डर, चोरी-डकैती, आर्थिक अपराध, बच्चों के साथ अपराधिक घटनाएं, यह सब जानकारी एक रहस्य बनकर रह गई है। जबकि भारतीय और विदेशी समाचार एजेंसियों की मानें तो अपराधों में भयभीत करने वाली वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की अंतिम रिपोर्ट 2017 पेश हुई थी। एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट के बारे में बात करें तो वह 2016 की है। तीन साल केदौरान कोई भी रिपोर्ट जारी नहीं की गई। सभी राज्यों ने पिछले साल ही अपराध रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी थी। इसके बावजूद यह रिपोर्ट संसद तक नहीं पहुंच सकी। एनसीआरबी के सूत्र बताते हैं कि उनके पास सारा रिकॉर्ड है। सरकार जब कहेगी वे रिपोर्ट जारी कर देंगे।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा 2017 में पेश की गई भारत में अपराध रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ कम से कम 39 मामलों की सूचना मिली। जबकि 2007 में यह आंकड़ा 21 था। 2016 में, महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर ( प्रति 100,000 महिला आबादी पर होने वाला अपराध ) 55.2 दर्ज किया गया। 2012 में यह आंकड़े 41.7 थे। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में सबसे ज्यादा मामले “पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता” दर्ज की गई है। 2016 में दर्ज सभी अपराधों में 33 फीसदी हिस्सेदारी पति या उसके रिश्तेदारों द्वाराक्रूरता के मामले हैं। महिलाओं के खिलाफ सभी अपराधों में 11 फीसदी हिस्सेदारी बलात्कार की है। 2016 में बलात्कार के 38, 947 या हर घंटे चार मामले दर्ज किए गए है। साल 2016 में महिलाओं के खिलाफ सजा दर (18.9 फीसदी) यानी जिन मामलों में अदालतों द्वारा परीक्षण पूरा किया गया, उन मामलों में दोषी ठहराए जाने वाले मामलों का प्रतिशत, इस दशक में सबसे कम दर्ज की गई है। पिछले दशक में भारत में महिलाओं के खिलाफ करीब 25 लाख अपराध दर्ज किए गए हैं। दर्ज किए गए महिलाओं के खिलाफ अपराध में मामलों में 83 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 2007 में 185,312 से बढ़ कर 2016 में 338,954 दर्ज किए गए हैं।
दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश में उच्चतम अपराध दर दर्ज की गई है। दिल्ली के लिए यह आंकड़े 160.4 है जबकि राष्ट्रीय औसत 55.2 दर्ज किया गया है। दिल्ली के बाद असम (131.3), ओड़िशा (84.5), तेलंगाना (83.7) और राजस्थान (78.3) का स्थान रहा है। 2016 में भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य, उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सबसे ज्यादा ( 15 फीसदी ) मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में उत्तर प्रदेश के यह आंकड़े 49,262 या हर घंटे छह का रहा है। उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल (32,513), महाराष्ट्र (31,388), राजस्थान (27,422) और मध्यप्रदेश (26,604) का स्थान रहा है।
2016 में, दिल्ली शहर में महिलाओं के खिलाफ 13,803 अपराध या हर दिन 38 मामले दर्ज किए गए हैं और इस आंकड़े के साथ 2016 में 2 मिलियन से अधिक आबादी वाले 19 शहरों में सूची में दिल्ली टॉप पर है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 1 दिसंबर, 2017 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है। दिल्ली शहर का अपराध दर सबसे बद्तर रहा है। दिल्ली के लिए यह आंकड़े प्रति 100,000 महिलाओं पर 182.1 अपराध का दर रहा है जबकि राष्ट्रीय औसत 77.2 दर्ज किया गया है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में हुए सभी अपराधों में से 33 फीसदी हिस्सेदारी पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। 2016 में ऐसे 110,378 मामले या हर घंटे 13 मामले दर्ज किए गए हैं। इस तरह के दर्ज मामलों में 45 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2007 में ऐसे मामलों के लिए आंकड़े 75,930 थे। पति / रिश्तेदारों के द्वारा क्रूरता के तहत दर्ज मामलों के बाद महिलाओं की शीलता भंग करने के इरादे से हमले (25 फीसदी), महिलाओं के अपहरण (19 फीसदी) और बलात्कार (11 फीसदी) के तहत मामले दर्ज हुए हैं। 2016 में, “पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता” के अधिकांश मामले पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए हैं। राज्य के लिए यह आंकड़े 19,302 या हर घंटे दो मामले दर्ज किए गए हैं। 2016 में असम में अपराध दर (58.7) उच्चतम दर्ज की गई है जबकि राष्ट्रीय औसत 18 दर्ज किए गया है। 2016 में, महिला के शील भंग करने के इरादे से किए हमले के तहत कम से कम 84,746 या हर घंटे 10 मामले दर्ज हुए हैं। 2016 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं, करीब 11,396 या हर घंटे एक। अपराध दर के मामले दिल्ली सबसे बद्तर रहा है, 43.6 जबकि राष्ट्रीय औसत 13.8 दर्ज किया गया है। ”महिला की शीलता भंग करने के इरादे से किए जाने वाले हमले” के तहत अधिक गंभीर अपराध जैसे कि यौन उत्पीड़न, अपहृत करने के इरादे से महिलाओं को आपराधिक बल का प्रयोग, पीछा करना इत्यादी शामिल है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं के अपहरण के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं, करीब 12,994। जबकि देश भर में महिलाओं के अपहरण के 65,519 मामले दर्ज हुए हैं। 2016 में, दिल्ली में उच्चतम अपराध दर (40.7) दर्ज किया गया है।
वर्ष 2016 में देश में हर घंटे चार बलात्कार मामले दर्ज किए गए हैं। हम बता दें कि इस संबंध में 2007 में आंकड़े 2 थे। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं, जबकि सिक्किम ने बलात्कार के लिए सबसे ज्यादा अपराध दर (30.3) दर्ज हुए हैं। राष्ट्रीय औसत 6.3 का रहा है। बलात्कार के दर्ज करने के मामलों में 88 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2007 में जहां यह आंकड़े 2007 में 20,737 थे, वहीं 2016 में यह आंकड़े 38,947 दर्ज किए गए हैं। 2016 में 39,068 बलात्कार पीड़ितों में, 43 फीसदी 18 साल से कम उम्र की लड़कियां थी। 95 फीसदी दर्ज मामलों में अपराधी, पीड़ित का जानने वाला था। इनमें से 29 फीसदी पड़ोसी थे, 27 फीसदी पीड़ित से शादी करने के वादे पर ज्ञात व्यक्ति थे जबकि 30 फीसदी अन्य ज्ञात व्यक्ति थे। बलात्कार के मामले में, 2016 में 20 लाख से अधिक आबादी वाले 19 शहरों में सूची में दिल्ली सबसे ऊपर है। बलात्कार के लिए, अपराध दर के मामले में भी दिल्ली सबसे ऊपर है, प्रति 100,000 महिलाओं पर 26.3 मामले जबकि राष्ट्रीय औसत 9.1 का रहा है। महिलाओं के अधिकारों की वकील और महिलाओं और बच्चों को कानूनी सेवाएं प्रदान करने वाली गैर लाभकारी संस्था, मजलिस की सह-संस्थापक, फ्लाविया के अनुसार “अपराध दर में वृद्धि से ज्यादा, दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है।” एग्नेस कहती हैं, “ऐसी घटनाओं के विश्लेषण के लिए कोई तंत्र नहीं हैं। मुझे लगता है कि कुछ बेरहम हिंसक घटनाओं पर मीडिया के दबाव के कारण, अधिक जागरूकता है और महिलाओं को अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए आगे आ रहे हैं। ”
महिलाओं के प्रति हो रहे इन गंभीर और अक्षम्य सामाजिक अपराधों के पीछे अपराधियों का मनोविज्ञान चाहे जो भी हो लेकिन इसमें संशय नहीं रह गया है कि महिलाएं आज की तारीख में कहीं भी महफूज नहीं रह गई हैं। चाहे वह गांव हो,छोटा शहर हो, कस्बा हो या फिर महानगर । दरिंदे अपना वहशीपन कही भी दिखा सकते है। दरिंदगी कहीं भी हो सकती है। इसे सिर्फ एक क्षेत्र, शहर, महानगर तक सीमित नहीं माना जा सकता।
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