क्लाइमेट इमरजेंसी की आहट – शब्बीर कादरी

3:34 pm or August 1, 2019
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क्लाइमेट इमरजेंसी की आहट

  • शब्बीर कादरी

इस बार की गर्मियां याद रहेंगी, अत्यधिक भीषण और रिकार्ड तोड़ते तापमान की वजह स,े साथ ही निराशा की हद को पार करते भूजल स्तर के और अधिक नीचे चले जाने या समाप्त हो जाने के कारण, लू के कारण मरने वाले गरीब, मजबूर लोगों को याद करके और दैवीय प्रकोप का रूपधारण करती घनघोर वर्षा के कारण तबाही मचाता जलप्रलय और समुद्र के स्तर में धीरे ही सही पर लगातार हो रही वृद्धि कारण भी क्योंकि समुद्र के स्तर में वृद्धि ने जागरूक देशवासियों के माथे पर चिंता का भाव उकेर दिया है जिन्हें दिखाई दे रहा है कि आज नहीं तो कल समुद,्र जाने कितने देश जाने, कितनी सभ्यताऐं अपने अंदर समा लेने को एक समान गति से नागरिक बस्तियों की और बढ़ रहा है।

सदियों से एक समान रूप से स्वतः ही निश्चित समय पर सर्दी, गर्मी और बरसात का संतुलित चक्र गतिमान बनाए रखने वाला मौसम अब विश्वभर में पल-पल अपना चक्र, रूप और व्यवहार बदल रहा है। कब खुले हुए साफ वातावरण में घनघोर वर्षा हो जाए, कब प्राकृतिक आपदा के रूप में औले की चादर लहलहाती खेती को अपने अंदर समेट ले और कब मौत का संदेश सुनाती बाढ़ अपने घरों में सोते हुए लोगों को बेघर तो करे ही बेमौत काल का ग्रास बनकर जीवधारियों पर टूट पड़े, कोई नहीं जानता। बदलते मौसम की यही परिस्थिति जलवायु परिवर्तन के रूप में इन दिनों विश्वभर में कहर बरपा रही है। हाल ही में तमिलनाड में भीषण जल संकट के चलते रेल द्वारा पेयजल पहुंचाया गया। प्रसिद्ध अभिनेता लियोनार्डो ने चेन्नई के एक कुंए के पास पानी की आस में खड़े महिलाओं के एक झुंड का फोटो पोस्ट कर मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृति के रवैये की छवि भी प्रस्तुत की। जाहिर है भारत भर में भू-जल के तेजी से गिरते स्तर ने समाज के हर वर्ग को चौकन्ना कर दिया है। घटती वर्षा का आंकड़ा, असहनीय और शरीर जला देने वाली गर्मी का रौद्ररूप तथा सभ्य समाज को पेयजल के रूप में कटग्लास पानी पेश करने की जरूरत हमारे यहां के समाज के हर वर्ग को चिंतनीय बना रहा है।

तेजी से बदलते और बिगड़ते मौसम के मिजाज ने पूरे विश्व के कई शहरों को इन दिनों पर्यावरण आपातकाल लगाने पर मजबूर कर दिया है। दरअसल क्लाइमेंट इमरजेंसी पर्यावरणीय परस्थिति बिगड़ने से पूर्व सुरक्षात्मक दृष्टि से उठाया गया वह एहतियाती कदम है जो हालात को और अधिक भयावह होने से पूर्व खतरे से आगाह कर देता है। फिलहाल फ्रांस के पेरिस और कोलोन सहित ऐसे ही हालात के चलते पिछले तीन वर्षों में 15 अन्य देशों के छोटे-बड़े लगभग 722 विश्वविद्यालयों में पर्यावरणीय आपातकाल लगाया जा चुका है। इस आपातकाल से पहले पेरिस में मार्च ऑफ द सेंचुरी के नाम से जलवायु परिवर्तन रोकने की मांग को लेकर मार्च किया गया। इस मार्च में फ्रांस के लगभग 220 शहरों के साढ़े तीन लाख से अधिक नागरिक सड़क पर उतर आए। प्रर्दशनकारियों का कहना था कि हम उनलोगों के भी खिलाफ हैं जो अधिकाधिक धनोपार्जन के कीर्तिमान तो स्थापित कर रहे हैं पर पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन के नाम पर खामोश हैं उनका कहना है धरती पर मौजूद सभी जीवधारियों को अगर बचाना है तो हमें पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य को हर हाल में प्राप्त करना होगा। भारत अभी कार्बन उत्सर्जन मामले में 7 प्रतिशत की दर से विश्व में चौथे जबकि चीन 27 प्रतिशत के साथ पहले और 15 प्रतिशत की दर से अमेरिका दूसरे नम्बर पर है। पर्यावरण आपातकाल के दौरान पेरिस को साइक्लिंग केपिटल बनाया जाएगा वहां इसके लिए वर्ष 2020 तक साइक्लिंग पाथ 1000 किमी बढ़ा दिए जाऐंगे। खास जगहों पर कार ले जाना बैन होगा, टूरिस्ट बसें का प्रवेश शहर में वर्जित होगा तथा पेरिस के चार अधिक भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर शहरी जंगल भी बनाए जाऐंगे।

दरअसल क्लाइमेट इमरजेंसी की पहल ऑस्ट्रेलिया के शहर डारेबिन से 2016 में प्रारंभ की गई तब इस नगर को पहला क्लाइमेट शहर कहा गया, इस योजना के तहत कार्बन उत्सर्जन को पेरिस समझौते के अनुरूप बनाए रखने के मापदंड का कड़ाई से अनुपालन किया जाता है। अब तक विश्व के 7000 से अधिक कॉलेज और विश्वविद्यालय पर्यावरण को बचाने के लिए इस आपातकाल को अपने यहां लागू कर चुके हैं। इसके बाद आयरलैंड विश्व का दूसरा ऐसा देश बना जिसकी आयरिश ग्रीन पार्टी ने अपनी संसद में देश के संविधान में संशोधन कर इस आपातकाल को अपने यहां लागू किया और संसद में यह बिल बिना मतदान के ही भारी मतों से पारित कर स्वीकार किया गया। इसके बाद अमेरिका के शहर न्यूयार्क में इसी वर्ष जून माह में क्लाइमेट इमरजेंसी लगाई गई है। ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने इसे पूरे देश में लागू किए जाने हेतु भारी दबाव बनाया और इसी वर्ष मई माह में इसे लागू किया है। फ्रांस में वर्ष 2050 तक देश को कार्बन न्यूट्रल बनाने की गहन तैयारी चल रही है और सरकारी स्तर पर संसद में बहस चल रही है। जर्मनी का फ्राइडे फ्यूचर पर्यावरण समूह इस उद्देश्य हेतु अपने यहां आंदोलनरत् है जिसमें वहां के सभी आयु वर्ग के लोग बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं।

भारत में भी पर्यावरण आपातकाल हेतु 16 साल के बच्चे अमन शर्मा द्वारा ऑनलाइन अभियान प्रारंभ किया गया है इस अभियान को देश विदेश में साढ़े चार लाख से अधिक लोगों का समर्थन मिल चुका है। भारत ने पेरिस समझौते के तहत कार्बन उत्सर्जन में 33-35 प्रतिशत कटौती (वर्ष 2005 के मान से कम) करने का लक्ष्य रखा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करते हुए हमारी संसद को हाल ही में बताया गया है कि समुद्र में जलस्तर वृद्धि के चलते पिछले 40-50 वर्षों में मुंबई के समुद्र जलस्तर में 1.3 मिलीमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है, इसी प्रकार पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर स्थित समुद्र के जल स्तर में 1948 से 2005 के बीच 5.16 मिलीमीटर की बढ़ौतरी आंकी गई है गुजरात के कांडला के समुद्र में भी 2.89 मिलीमीटर की वृद्धि हुई है तथा यह भी कहा गया कि हमारे यहां का तापमान 0.6 डिग्री के मान से निरंतर बढ़ रहा है जो चिंता का विषय है।

इस माहौल में यह सुखद है कि ग्लोबल वार्मिंग के भयावह अनुभवों ने हमें अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की और ध्यान केन्द्रित करने पर मजबूर किया है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीटयूट् के अनुसार वर्ष 2020 तक सोलर पॉवर, विंड पॉवर जैसे अक्षय ऊर्जा का बाजार विश्व में 13 लाख करोड़ हो जाने का अनुमान है जबकि बिजली बचाने वाले यंत्रों, इलईडी बल्बों का बाजार प्रतिवर्ष 40 प्रतिशत की वृद्धि के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों को नियंत्रित करने की यह पहल और क्लाइमेट इमरजेंसी को लागू करने की कड़ाई हमारे यहां की आने वाली पीढ़ी के लिए भी कुछ हद तक सुखद जीवन की जीवन रेखा बनेगी ऐसी उम्मीद की जाना चाहिए।

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