आरटीआई के शेर को पालतू बना रही सरकार – सुनील अमर

6:42 pm or August 13, 2019
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आरटीआई के शेर को पालतू बना रही सरकार

  • सुनील अमर

जो आरटीआई कानून केन्द्र सरकार और कुछ मामलों में खुद मोदी के लिए सिरदर्द बना हुआ था, उसको संशोधित करके सरकार ने अब उसे पालतू और मनोनुकूल बना लिया है। इस प्रयोग को आसानी से सफल होते देख निश्चित ही सरकार का हौसला बढ़ा होगा कि इसी तरह वह कुछ अन्य संस्थाओं के शेरों को भी पालतू बना सकती है। इस संशोधन को कांग्रेसी नेता अधीर रंजन चौधरी ने खतरनाक तो पूर्व केन्द्रीय मंत्री डी. राजा ने लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया है।

पूर्ववर्ती आरटीआई कानून की संरचना हमें और केन्द्रीय सूचना आयोग के संप्रभु अधिकारियों को यह ताकत देती थी कि जो सूचनाएं सरकार के लिए संकट का कारण बन सकती थीं, उसे भी सरकार के मुंह में हाथ डालकर निकाला जा सकता था। ऐसा इसलिए था कि आरटीआई के आयुक्त की नियुक्ति कर देने के बाद सरकार उन्हें उनका कार्यकाल पूरा होने तक छेड़ नहीं सकती थी। केन्द्र की जिस कांग्रेसी  सरकार ने यह कानून बनाया था उसे भी इसके चलते बहुत बार संकट झेलना पड़ा था लेकिन उसने अपने दस साल के कार्यकाल में इसे कभी तोड़ने-मरोड़ने की जरा भी कोशिश  नहीं की क्योंकि तमाम भ्रष्टाचार और घोटालों के बावजूद उस सरकार में अपने आपको लोकतांत्रिक दिखाने की शर्म बची हुई थी।

साल 2005 में बने इस कानून में प्रावधान था कि सरकारी संस्थाएं, जनता द्वारा मांगे जाने पर अपने कार्यालय कीं सही सूचनाएं उपलब्ध करायेंगी। यदि ऐसा नहीं होता है तो जनता आरटीआई कानून के तहत ऐसी जानकारियां मांग सकती है। इसके लिए जिस सूचना आयोग नामक संस्था का गठन किया गया उसमें एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा छह सूचना आयुक्त के पद सृजित किये गये। इनका कार्यकाल पाँच साल का रखा गया और इन्हें एक बार नियुक्त करने के बाद कार्यकाल पूरा होने तक हटाया नहीं जा सकता था तथा उनकी सेवानिवृत्ति की उम्र 65 साल की गई थी। इसमें मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन आदि मुख्य चुनाव आयुक्त के बराबर (जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होता है) तथा सूचना आयुक्तों का वेतन चुनाव आयुक्तों के बराबर था। ऐसा इस संस्था की पूर्ण स्वायत्तता को बनाये रखने के लिए किया गया था ताकि इसके अधिकारी सरकार के भय के बिना जनता की सूचनाओं तक पहुंच बनाये रख सकें। पूरे देश  में सूचना आयोग के तन्त्र ने बढ़िया काम किया और करोड़ों लोगों ने इस टूल का इस्तेमाल करके दबा दी गई जानकारियां बाहर निकालीं। ये जानकारियां कितनी मारक व रहस्य और लीपापोती से भरी हुई थीं, इसका अन्दाजा इस एक बात से लगाया जा सकता है कि ऐसी सूचनाएं निकालने के क्रम में देश  में अब तक लगभग 80 से अधिक लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे!

हम जानते हैं कि देश  भर के सरकारी कार्यालयों में जितने भी लोग काम करते हैं, सरकार ही उनकी नियोक्ता होती है और मनोनुकूल काम न होने पर उनके निलम्बन व बर्खास्तगी की कार्यवाही होती रहती है। अभी पिछले दिनों ही केन्द्र सरकार ने कई बड़े अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्ति दे दी है। ऐसे में कर्मचारी/अधिकारी सरकार के भय के नीचे काम करते हैं। देश  में जो अति महत्त्वपूर्ण संवैधानिक व विधायी संस्थाएं बनायी गई हैं उनके कार्य पालकों को इसीलिए उच्च वेतन मान व एक निश्चित कार्यकाल दिया जाता है ताकि उनके ऊपर सरकार के कोप की तलवार लटकने का भय न रहे। लेकिन अब सूचना आयोग का जो स्वरूप इस संशोधन के बाद हो गया है उसमें उसे कितना वेतन दिया जाये, कब तक काम करने दिया जाये तथा किसकी तैनाती वहां की जाये, यह सब सरकार के हाथ में हो गया है।

कानून में भी तब तक कोई संशोधन नहीं किया जाता जब तक कि कोई आधारभूत आवश्यकता न आ गई हो। इसके बजाय अगर संशोधन इसके उलट हो रहा है तो निश्चित तौर पर संशोधन करने वाला उसे बिगाड़ना और निष्प्रयोज्य करना चाहता है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री की हैसियत रखने वाले जितेन्द्र सिंह ने संशोधन  बिल पेश करते हुए तर्क दिया कि मुख्य सूचना आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर रखकर वेतन मान आदि दिया गया है लेकिन यह बराबरी ठीक नहीं है क्योंकि मुख्य सूचना आयुक्त के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है! यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग के फैसलों को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

सूचना के अधिकार कानून ने देश  में सबसे ज्यादा व्यक्तिगत रुप से अगर किसी को परेशान किया है तो निःसन्देह वह नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ही हैं। इन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई और वैवाहिक स्थिति को लेकर चुनाव नामांकन पत्रों में जो जानकारी स्वयं उपलब्ध कराई थी उसकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए सूचना के अधिकार का उपयोग किया गया। इसी प्रकार सरकार के लिए एक भारी सिरदर्द रिजर्व बैंक का मामला था जिसमें आरटीआई के तहत यह जानकारी मांगी गई थी कि सरकारी बैंकों में जो एनपीए यानी कि डूबा हुआ पैसा है वह कितना है तथा देश  के बड़े डिफाल्टर कौन-कौन हैं?

दिलचस्प यह जानना है कि कांग्रेसी  संप्रग के प्रथम कार्यकाल में जब साल 2005 में सूचना का अधिकार कानून बनाया गया तो लागू करने से पहले इसे परीक्षण के लिए संसद की सम्बन्धित समिति को सौंपा गया। उस समिति में अन्य सदस्यों के अलावा जो दो महत्त्वपूर्ण सदस्य थे वे थे- रामनाथ कोविंद, जो कि अब राष्ट्रपति हैं और राम जेठमलानी, प्रख्यात वकील लेकिन अब वे भाजपा में नहीं है! पहले यह प्रस्ताव था कि मुख्य सूचना आयुक्त को केन्द्रीय सचिव स्तर का वेतन मान तथा सूचना आयुक्तों को अतिरिक्त सचिव स्तर का वेतन मान दिया जाये लेकिन इस समिति ने ही सुझाव देकर मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर तथा अन्य आयुक्तो का वेतन सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के बराबर कराया था और अब पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने पर इसी पार्टी और महामहिम ने संशोधन  का यह खेल किया है। खबर है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं और कुछ विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा इस संशोधन  को सर्वोच्च न्यायालय में चैलेन्ज किया जाएगा।

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