धारा 370 की समाप्ति: मिथक और यथार्थ – सुभाष गाताडे

5:07 pm or August 14, 2019
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धारा 370 की समाप्ति: मिथक और यथार्थ

सुभाष गाताडे

ज्यां द्रेज, बेल्जियम में जनमे भारतीय अर्थशास्त्राी और कार्यकर्ता, जिन्होंने खुद नोबेल पुरस्कार विजेताओं – प्रोफेसर अमर्त्य सेन और अंगुस डेटन – के साथ किताबें लिखी हैं, वह पिछले दिनों अचानक सूर्खियों में आए।

दरअसल वजह थी धारा 370 को समाप्त किए जाने के सरकार के विवादास्पद कदम के खिलाफ दिल्ली में आयोजित एक रैली में उनके द्वारा लिए गए प्लेकार्ड की तस्वीर वायरल हो गयी। इस प्लेकार्ड में जम्मू-कश्मीर तथा गुजरात को लेकर विभिन्न विकास सूचकांकों की तुलना की गयी थी, जिसका निचोड़ यही था कि वह किस तरह गुजरात से कई मायनों में आगे है। (https://www.telegraphindia.com/india/jean-dreze-contests-amit-shah-with-gujarat-data/cid/1696457)

इस हक़ीकत के बावजूद कि इस अदद फोटो ने सरकार के वे तमाम दावे धराशायी हो रहे थे कि धारा 370 का जारी रहना दरअसल राज्य की प्रगति में बाधक रहा है, हम लोगों ने यही पाया कि जब वज़ीरे आज़म मोदी ने धारा 370 को हटाने के बारे में अपना पक्ष रखते हुए जब राष्ट के नाम संबोधन किया तो उन्होंने उसी किस्म के दावे दोहराये कि किस तरह स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा आदि के मामले में जम्मू कश्मीर बाकी राज्यों से पिछड़ा है।

फिर इस दावे को प्रश्नांकित करते हुए बीबीसी में बाकायदा एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि किस तरह जम्मू और कश्मीर पहले से कई सूचकांकों में भारत के कई राज्यों से आगे रहा है, जो तथ्य इस दावे को प्रश्नांकित करते थे कि धारा 370 के रहने से जम्मू कश्मीर विकास अवरूद्ध था। ‘विकास के मोर्चे पर क्या वाक़ई पिछड़ा है जम्मू कश्मीर’ (https://www.bbc.com/hindi/india-49279020)  शीर्षक लेख में बीबीसी सम्वाददाता शादाब नजमी बताते हैं:

..हमने देश के अन्य राज्यों की तुलना करने के लिए कुछ संकेतकों को खंगाला.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के मुताबिक़, इन सभी संकेतकों में केरल सर्वश्रेष्ठ राज्य है.
..कई मोर्चों पर यूपी-बिहार से आगे
इसी तरह, कई भारतीय राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में लिंगानुपात भी बेहतर है. जम्मू-कश्मीर में प्रति 1,000 पुरुषों पर 972 महिलाएं हैं. जबकि दिल्ली (854), उत्तर प्रदेश (995) और महाराष्ट्र (952) जैसे राज्यों में लिंगानुपात जम्मू-कश्मीर से कहीं कम है.
जम्मू-कश्मीर अन्य संकेतकों जैसे घरों में बिजली की उपलब्धता के मामले में बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी आगे है.
वहीं जम्मू-कश्मीर में बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र की तुलना में कहीं बेहतर सफ़ाई सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है…
जम्मू-कश्मीर उन कुछ राज्यों में से है जहां शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है. सर्वे यह भी बताता है कि राज्य में मृत्यु दर बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और गुजरात की तुलना में कम है.

आखिर सरकार द्वारा प्रस्तुत की जा रही इन तथ्यहीन बातों को किस तरह देखा जाए ? क्या अब हम ‘अल्टफैक्टस’ अर्थात अल्टरनेटिव फैक्टस /वैकल्पिक तथ्य/के युग में वाकई पहुंच गए हैं जैसा कि राष्टपति टंप के कार्यकाल में बार बार देखने में आ रहा है जहां ‘सरासर झूठ या गलतबयानी को तथ्य के तौर पर पेश किया जाता है। क्या यह कहा जा सकता है कि यह गोबेल्स की उसी रणनीति का प्रतिबिम्बन है जहां माना जाता था कि अगर झूठ को बार बार दोहराया जाए तो सत्य लगने लगता है ? या क्या वाकई यह एक तरीका है जम्मू कश्मीर में जिस तरह फिलवक्त सुरक्षा बलों के सहारे शान्ति कायम किए जाने के दावे किए जा रहे हैं, जहां लोगों को घरों तक सीमित रखा गया है, उसी को लेकर जिस तरह विपक्षी पार्टियां ही नहीं अंतरराष्टीय मीडिया में तथा मानवाधिकार संगठनों के बीच सवाल उठ रहे है, उससे ध्यान हटाने का ?

मामला जो भी हो, अब हम यह भी देख रहे हैं कि अपने इस कदम को औचित्य प्रदान करने के लिए सरकार एक कदम आगे बढ़ गयी है और उसने यह भी कहना शुरू किया कि धारा 370 की समाप्ति दरअसल ‘डा अम्बेडकर और सरदार पटेल के सपनों को साकार करना है ’ जैसा कि प्रधानमंत्राी ने राष्ट के नाम सम्बोधन में कहा।

क्या सरदार पटेल और डा अम्बेडकर ने वाकई धारा 370 के निर्माण का विरोध किया था ?

सबसे पहले, हमें इस बात को समझना होगा कि यह महज विचार कि कैबिनेट मंत्रालय के कुछ सदस्यों को अलग किया जा सकता है – बाद के इतिहासकारों, राजनेताओं द्वारा – उनके किसी कथित विरोध के लिए जो उन्होंने कैबिनेट के किसी फैसले को लेकर किया था, अपने आप में गलत है क्योंकि कैबिनेट हमेशा ही सामूहिक जिम्मेदारी की भावना से चलता है।

दूसरी अहम बात यह है कि इस बात के पर्याप्त दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं जो बताते हैं कि नेहरू की अगुआई में तत्कालीन कैबिनेट आपसी चर्चाओं एवं साझा निर्णयों के आधार पर चलता था और ऐसी स्थिति नहीं थी कि सारी सत्ता प्रधानमंत्राी कार्यालय में केन्द्रित थी जैसी कि स्थिति आज नज़र आती है। जैसा कि पटेल के जीवनीकार राजमोहन गांधी रेखांकित करते हैं:

‘महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल वह त्रिमूर्ति थी जिसने यह तय किया था कि भारत हिन्दु राष्ट नहीं बनेगा बल्कि वहां सभी को समान अधिकार मिलेंगे। गांधी के अवसान के बाद और पटेल की म्रत्यु होने तक, पटेल और नेहरू के बीच कई मामलों में मतभेद दिखाई दिए लेकिन वह बुनियादी तत्वों को लेकर नहीं थे। अन्य अग्रणियों – अम्बेडकर, मौलाना आज़ाद, राजेन्द्र प्रसाद और राजाजी – के सहयोग से उन्होंने संविधान में धर्मनिरपेक्षता की जड़ों मजबूत करने और समानता के सिद्धांत का स्वीकार करने में अहम भूमिका अदा की।’

[Seema Chisti, “The Disputed Legacy of Vallabhbhai Patel”, October 30, 2013,  http://indianexpress.com.]

अगर हम धारा 370 को लेकर चली चर्चाओं को देखें तो हम यह पाते हैं कि स्वतंत्रा पत्राकार/विद्वान इसी बात की ताईद करते हैं कि सरदार पटेल खुद इस धारा के ‘आर्किटेक्ट अर्थात शिल्पकार’ थे। (https://theprint.in/opinion/ironical-that-bjp-wants-article-370-revoked-sardar-patel-was-its-architect/74804)  उन दिनों के घटनाक्रमों पर निगाह डालना इस सन्दर्भ में समीचीन होगा।

जब हिन्दोस्तां आज़ाद हुआ तब तीन रियासतों – जुनागढ़, हैद्राबाद और कश्मीर – के भविष्य का फैसला नहीं हो सका था, यह स्पष्ट नहीं था कि वह भारत में शामिल होंगे या पाकिस्तान में। ‘‘गैरवर्गीक्रत दस्तावेजों, जिसमें कैबिनेट तथा सुरक्षा कमेटी की मीटिंगों के रेकार्ड भी शामिल हैं, पड़ताल बताती है कि नेहरू और पटेल दोनों इस सम्बन्ध में चली चर्चाओं में मुब्तिला थे। ’’ /वही/ कश्मीर के बाहय पहलुओं के अलावा , हम यह भी देखते हैं कि आन्तरिक पहलुओं पर ‘‘नेहरू और पटेल दोनों मिल कर काम कर रहे थे, भले ही उनमें जोर का फरक था।’’ /वही/ हम चाहें तो उस पूरी प्रक्रिया से फिर गुजर सकते हैं जिसके तहत भारतीय संविधान के अन्तर्गत धारा 370 को विशेष दर्जा दिया गया। एन जी अययंगार / जो बिना पोर्टफोलियो के कैबिनेट मंत्राी थे तथा कश्मीर के पूर्व दीवाण थे/ और शेख अब्दुल्ला तथा उनके सहयोगियों के बीच कई माह तक इस मामले में चर्चा चली। निश्चित ही चर्चाएं कठिन थीं, लेकिन नेहरू ने पटेल की सहमति के बिना कोई कदम नहीं उठाया।

‘‘शुरूआती बैठकें 15-16 मई को पटेल के आवास पर ही नेहरू की मौजूदगी में चलीं। जब अययंगार ने एक मसविदा पत्रा तैयार किया जिसके तहत अब तक चली वार्ताओं का सारांश लिखा गया था, जो नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को लिखा गया था, तब उन्होंने इस पत्रा को पटेल के पास इस नोट के साथ भेजा: ‘‘क्या आप जवाहरलालजी को यह बताएंगे कि आप इससे सहमत हैं ? आप की सहमति के बाद ही नेहरू इस पत्रा को शेख अब्दुल्ला के लिए जारी करेंगे।’’ /वही/

इस बात को भी याद किया जा सकता है कि

‘सरदार पटेल ने जम्मू कश्मीर को दिए जा रहे विशेष प्रावधानों पर संविधान सभा की सहमति कायम करने में अहम भूमिका अदा की। भाजपा द्वारा प्रसारित दावे के बावजूद हम यही पाते हैं कि जब कुछ कांग्रेसी सदस्यों एवं नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य अययंगार के बीच कश्मीर को विशेष दर्जा दिलाने को लेकर तकरार एवं विवाद हुआ तब पटेल ने खुद हस्तक्षेप करके इस विवाद को निपटाया ताकि इस प्रावधान पर सहमति बने।  (http://www.firstpost.com/politics/bjps-kashmir-conundrum-article-370-is-stronger-than-partys-ambitions-1812089.html)

वैसे इस मुददे की और पड़ताल करके हम पटेल द्वारा निभायी अहम भूमिका को देख सकते हैं।

उधर हम यही पाते हैं कि न केवल सरदार पटेल बल्कि डा अम्बेडकर को भी अर्द्धसत्यों के सहारे धारा 370 का विरोधी साबित किया जा रहा है  जबकि अम्बेडकर साहित्य के गहन अध्येताओं ने यही पाया है कि ‘‘ पाकिस्तान और भारत के बंटवारे, संविधान सभा की बहसेें आदि को पलटते हुए यही देखा जा सकता है कि इसमें धारा 370 को लेकर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं है, न कोई दस्तावेज मौजूद है।’ (https://www.youthkiawaaz.com/2019/05/article-370-and-dr-ambedkar-a-factcheck/)यह अलग बात है कि अम्बेडकर के नाम से एक उद्धरण लम्बे समय से चर्चा में है जो यह छदम दावा करता है कि उन्होंने ‘धारा 370 को भारतीय संविधान में शामिल करने का विरोध’ किया था:

‘आप सोचते हैं कि भारत आप की सरहद की हिफाजत करेगा, वह आप के इलाके में सड़कों का निर्माण करेगा, वह आप को अनाज आदि पहुंचाएगा और कश्मीर को भारत के बराबर अधिकार भी मिलने चाहिए। लेकिन भारत सरकार को बहुत सीमित अधिकार मिलेंग और भारतीय जनता को भी कश्मीर में कोई अधिकार नहीं होंगे। आप के प्रस्ताव पर सहमति देने का मतलब होगा भारत के हितों के साथ गददारी करना और भारत का कानून मंत्राी होने के नाते मैं वह नहीं करूंगा।’’

इस कथन में कितनी सच्चाई है ?

इस मामले में अम्बेडकर लेखन के अध्येता प्रतीक टेम्भुर्ने जो बात बताते हैं वह विचलित करनेवाली है। उनके मुताबिक ‘अम्बेडकर द्वारा इस प्रावधान से इन्कार का सबसे पहला उल्लेख हमें संघ के मुखपत्रा तरूण भारत के 1991 के अंक में मिलता है जिसमें संघ के श्रेष्ठी बलराज मधोक के मौखिक बयान का हवाला दिया गया है, अर्थात अम्बेडकर के परिनिर्वाण के लगभग चार दशक बाद।’’ यह सोचना मासूमियत की पराकाष्ठा होगी कि संघ के विचारक के मौखिक बयान को सत्य माना जा रहा है जबकि अम्बेडकर की अपनी रचनाएं खामोश हैं।

वेलीवाडा नाम से एक दूसरे अम्बेडकरवादी वेबजर्नल ने – जिसने भी डा अम्बेडकर के मुंह से प्रचारित इस फेक उद्धरण का पर्दाफाश किया वह जोर देकर कहता है ‘‘यह उसी तरह से हो रहा है जैसा कि संघ/भाजपा द्वार नोटबंदी के वक्त़ कहा जा रहा था कि डा अम्बेडकर ने भी नोटबंदी का समर्थन किया था, जो एक सरासर झूठ था।’ (http://velivada.com/2019/08/05/what-ambedkar-had-really-said-about-kashmir-issue/)अपने भाषण में प्रधानमंत्राी मोदी का यह भी कहना था कि धारा 370 की समाप्ति ‘डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्ति भी है’। निश्चित ही उन्होंने इस बात का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा कि  मुखर्जी  की मौत – जिन विवादास्पद परिस्थितियों में हुई थी जब उन्हें कश्मीर को विशेष दर्जा देने का विरोध करने के लिए गिरफतार किया गया था – उन्होंने ही शुरूआत में धारा 370 की अनिवार्यता को स्वीकारा था।

इस मामले में ए जी नूरानी की किताब ‘आर्टिकल 370 : एक कान्स्टिटयुशनल हिस्टरी आफ जम्मू एण्ड कश्मीर’ /आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पेजेस 480/ आज़ादी के तत्काल बाद के झंझावाती समय में जम्मू और कश्मीर की स्थिति को लेकर कई सन्देह दूर करती है।

आधिकारिक दस्तावेजों, पत्रों, ज्ञापनों,श्वेत पत्रों और संशोधनों पर आधारित लेखक का अध्ययन – जो खुद संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं – ने न केवल इस कालखण्ड के बारे में नयी अंतर्दृष्टि प्रदान की है बल्कि उस समय के घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण सारांश भी पेश किया है और विभिन्न स्टेकहोल्डर्स द्वारा निभायी गयी भूमिका पर भी रौशनी डाली है। जबकि हम आज धारा 370 के की समाप्ति पर चर्चा कर रहे हैं, किताब बताती है कि किस तरह इसे प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच वार्ताओं के जरिए आकार दिया गया था और जिस पर सरदार पटेल तथा श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी मुहर थी।

इसमें कोई दोराय नहीं कि धारा 370 को लेकर यह खुलासा – कि इसके प्रति  मुखर्जी   की भी पूर्ण सहमति थी तथा तत्कालीन ग्रहमंत्राी सरदार पटेल की भी यही राय थी – बेहद विस्फोटक कहा जा सकता है। दिलचस्प बात थी कि किताब में किए गए खुलासे के बाद जनाब जितेन्द्र सिंह, जो उन दिनों जम्मू कश्मीर के लिए भाजपा के प्रवक्ता थे और उसकी राष्टीय कार्यकारिणी के सदस्य थे, उन्होंने अप्रत्यक्ष तरीके से गोया लेखक की बात का स्वीकार किया था और कहा था ‘‘दिवंगत नेता ने प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू को यह सुझाया था कि वह धारा 370 पर समयसीमा तय कर ले और यह भी स्पष्ट कर दे कि कब तक उसको लागू रहने दिए जाने की योजना है।’’http://www.siasat.com/english/news/shyama-prasad-mukherjee-never-endorsed-article-370)इस बात पर जोर देना भी जरूरी है कि यह कोई पहला वक्त़ नहीं था कि कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता के प्रति डा mukhकी सहमति का मसला उठा हो। जनाब बलराज पुरी, कश्मीर के अग्रणी पत्राकार ने ‘द ग्रेटर कश्मीर’ के अपने आलेख में  http://www.greaterkashmir.com/news/2010/aug/8/leaf-from-the-past-4.asp  /इस मसले पर अधिक विवरण पेश किया था:

‘‘ नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ श्यामाप्रसाद  मुखर्जी   का राज्य की स्थिति को लेकर लम्बा पत्रव्यवहार, जिसे उस वक्त़ पार्र्टीी ने प्रकाशित किया था, इस मुददे पर उनके स्टैण्ड का सबसे आधिकारिक सबूत है। मिसाल के तौर पर, 9 जनवरी 1953 को, दोनों को लिखे पत्रा में वह लिखते हैं ‘‘ हम इस बात पर तुरंत सहमत होंगे कि घाटी में शेख अब्दुल्ला की अगुआई में विशेष तरीके से चलने दिया जाए, तब तक जब तक वह चाहते हों अलबत्ता जम्मू और लददाख का भारत के साथ तुरंत एकीकरण करना चाहिए।’’ जबकि नेहरू ने इस विचार को सिरेसे खारिज किया  तथा कश्मीर में उसकी प्रतिक्रिया को लेकर तथा उसके अंतरराष्टीय परिणामों को लेकर, चेतावनी दी ; अब्दुल्ला ने एक विस्त्रत जवाब भेजा जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘‘आप शायद इस बात से नावाकीफ हैं कि पाकिस्तान एवं अन्य स्वार्थी तत्वों की तरफ से किस तरह की कोशिशें चल रही हैं ताकि राज्य की एकता को तोड़ा जाए। एक बार जब राज्य की अवाम की कतारों को विभाजित किया जाएगा तो किसी भी किस्म का समाधान उन पर थोपा जा सकेगा।’’

वह आगे जोड़ते हैं कि यह लम्बा पत्रव्यवहार डा मुखर्र्जीी द्वारा नेहरू को लिखे इस पत्रा के साथ / 17 फरवरी, 1953/ समाप्त हुआ था जिसमें उन्होंने सुझाया था:

  1. दोनों पक्ष इस बात पर जोर दें कि राज्य की एकता को बरकरार रखा जाएगा और स्वायत्तता का सिद्धांत जम्मू प्रांत और लददाख तथा कश्मीर घाटी पर भी लागू होगा।
  2. दिल्ली करार पर अमल – जिसमें राज्य को विशेष दर्जा दिया गया था – उसे जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के अगले सत्रा से लागू किया जाएगा।

नेहरू ने जवाब दिया कि तीनों प्रांतों के लिए स्वायत्तता के प्रस्ताव पर उनके बीच तथा अब्दुल्ला के बीच जुलाई 1952 में ही सहमति हुई थी। अगर मुखर्र्जीी को अपनी गलति का एहसास हुआ है तो उन्हें अपने आन्दोलन को बिना शर्त वापस लेना चाहिए।  मुखर्जी   इस बात के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि यह उनकी हार मानी जाती। यह गतिरोध लम्बे समय तक बना रहा, जिसने एक तरह से जनसंघ के लिए ‘‘चेहरा बचाने’’ (face saving)     का बहाना दिया।

यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि  मुखर्जी   की आकस्मिक मौत के बाद, नेहरू ने जम्मू के लोगों से अपील की थी कि वह अपने आन्दोलन को वापस  ले लें क्योंकि स्वायत्तता की उनकी मांग पूरी कर ली गयी है। राज्य सरकार ने इस अपील पर 2 जुलाई को सहमति जताई, जब प्रजा परिषद के नेताओं को रिहा किया गया, जब वह दिल्ली जाकर 3 जुलाई को नेहरू से मिले। इस तरह प्रजा परिषद के आन्दोलन को – क्षेत्राीय स्वायत्तता की गारंटी एवं दिल्ली करार पर तत्काल अमल – के वायदे के साथ वापस लिया गया।

मगर यहां तमाम किन्तु परन्तु मौजूद दिखते हैं। एक कारक जिसने इस करार पर अमल को रोका उसकी वजह प्रजा परिषद और जनसंघ का उससे बाहर होना था। बलराज मधोक, जो बाद में जनसंघ के अध्यक्ष बने, पार्र्टीी ने राज्य की स्वायत्तता तथा क्षेत्राीय स्वायत्तता पर अपनी प्रतिबद्धता नागपुर / संघ का मुख्यालय / के निर्देश पर वापस ली थी। पार्र्टीी ने क्षेत्राीय स्वायत्तता और धारा 370 के खिलाफ अपनी अनवरत मुहिम जारी रखी। ;((http://www.greaterkashmir.com/news/2010/aug/8/leaf-from-the-past-4.asp))आज तक भाजपा कहती आयी है कि अगर सरकार ने इस धारा के प्रति  मुखर्जी   के प्रस्ताव को माना होता तो कश्मीर आज अलग स्थिति में होता, मगर वह अभी यह कहने का साहस नहीं जुटा पायी है कि उन्होंने पहले इस प्रस्ताव पर अपनी लिखित सहमति दी थी।

राष्ट्र  के नाम अपने संबोधन में मोदी ने भी मुखर्जी के मामले में यह सच्चाई साझा करना मुनासिब नहीं समझा।

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