कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना – यह राजनीति है या कूटनीति – वीरेन्द्र जैन

2:58 pm or August 20, 2019
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कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना – यह राजनीति है या कूटनीति

  • वीरेन्द्र जैन

रामकथा का कथानक ऐसा कथानक है जिस पर लगभग तीन सौ रचनाएं लिखी गयी हैं जो सभी अनूठी हैं। यही कारण है कि राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जिन्होंने खड़ी बोली में इस कथानक पर महाकाव्य रचा, कहते हैं –

राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है

कोई कवि बन जाय, सरल सम्भाव्य है

इस कथानक पर रची गयी सभी रचनाओं में एक बात साझा है कि रावण ने जब सीता का अपहरण किया था, तब वह साधु का भेष धर कर आया था। हमारे देश में पिछले दिनों घटित राजनीतिक घटनाओं में यह प्रवृत्ति निरंतर देखी जा रही है।

इसकी शुरुआत तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ता संघर्ष के दौर से हो गयी थी जिन्होंने अपनी ही पार्टी के एक गुट को परास्त करने के लिए खुद को समाजवाद की अग्रदूत बताना शुरू कर दिया था व कम्युनिष्टों से समर्थन पाने के लिए राष्ट्रपति पद पर उनके उम्मीदवार का समर्थन कर दिया था, बैंक व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था तथा पूर्व राजा महाराजाओं के प्रिवीपर्स व विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया था। अपनी छवि बनाने के लिए उन्होंने एक कम्युनिष्ट पार्टी [सीपीआई] के साथ भी गठबन्धन कर लिया था। समाजवादी होने की छवि का भ्रम काफी समय तक बना रहा था, जब तक कि इमरजैंसी में संजय गाँधी ने काँग्रेस के असली चरित्र को प्रकट नहीं कर दिया था। बाद में सीपीआई को समझ आयी थी और 1978 के पंजाब अधिवेशन में उन्होंने अपनी भूल स्वीकारी थी और कुछ वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निकाला था जिनमें वरिष्ठ कम्युनिष्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे भी थे।

तत्कालीन जनसंघ जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में उभरी वह देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रतिद्वन्दी रही। संविद शासन के प्रयोगों में वह इकलौती संगठित पार्टी के रूप में उभरी क्योंकि उसके पीछे आरएसएस का मजबूत संगठन था। यही कारण रहा कि उसने कम्युनिष्ट पार्टी को छोड़ कर शेष सारे राजनीतिक दलों में सेंध लगा ली। समाजवादियों के दसियों दल धीरे धीरे उसमें समाते गये या निर्मूल होते गये।

भाजपा [ तब जनसंघ ] ने सबसे पहला भ्रम जनता पार्टी के गठन के समय जनता में पैदा किया और अपनी पार्टी को जनता पार्टी में विलीन कर दिया पर वे उसके सीमित कार्यकाल में भी गुपचुप रूप से अलग गुट बने रहे। जब उनके इस अलगाव की पहचान हो गयी तब उन्हें जनता पार्टी छोड़ना पड़ी और इसी कारण से पहली गैर कांग्रेसी सरकार का पतन हुआ। इसके कुछ समय बाद ही उन्होंने भारतीय जनसंघ से भारतीय लेकर और जनता पार्टी जोड़ कर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समाजवाद का प्रभाव वे देख चुके थे इसलिए उन्होंने अपने घोषणा पत्र में अपने समाजवाद विरोधी चेहरे पर गांधीवादी समाजवाद का मुखौटा लगा लिया। यह मुखौटा फिट नहीं बैठा इसलिए इसे जल्दी ही उतारना पड़ा।

पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दौर में वे निशाने पर थे किंतु सत्तारूढ न होने के कारण सारे हमले कांग्रेस की ओर मुड़ गये। इस अलगाववादी आन्दोलन से भाजपा के लोग कभी सीधे नहीं टकाराये इसलिए नुकसान केवल कांग्रेस और कम्युनिष्टों को ही झेलना पड़ा। स्वर्ण मन्दिर पर आपरेशन ब्ल्यू स्टार का कहर श्रीमती इन्दिरा गाँधी को झेलना पड़ा जिसमें उनकी हत्या हो गयी। दिल्ली में सिख विरोधी नरसंहार हुआ किंतु भाजपा के लोग निष्क्रिय बने रहे। जब वे बुरी तरह चुनाव हार गये और लोकसभा में उनके कुल दो सदस्य चुने गये तो उन्होंने नई नीति के रूप में राम मन्दिर का मुद्दा तलाशा जो असल में कथित राम जन्मभूमि मन्दिर की जमीन के मालिकाना हक का मामला था जिसे अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण का नाम दे दिया। इससे लाखों लोगों की भावनाएं भड़कीं। निशाने पर ध्रुवीकरण था जिससे हिन्दू बहुसंख्यक समाज में उन्हें समर्थन मिलता गया।

उन्होंने अपने सहयोगी संगठन विश्व हिन्दू परिषद को आगे करके उन्हीं मन्दिरों का मुद्दा उठाया जो विवादास्पद थे और अतीत में कभी भी मुसलमानों के साथ विवाद रहा था। प्रत्यक्ष में हिन्दू धर्मस्थलों की रक्षा थी किंतु परोक्ष में ध्रुवीकरण का लक्ष्य प्राप्त करना था।

मोदी शाह सरकार आने के बाद इस परम्परा को और अधिक करीने से लागू किया गया। ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ऐसे मुद्दे चुने जो प्रत्यक्ष में तो एक आदर्श उपस्थित करते दिखते थे किंतु उसके पीछे मुस्लिम समाज की विसंगतियां उभारना और उसमें अंतर्निहित भेद को बढाना था। तीन तलाक का मुद्दा भी ऐसा ही मुद्दा था। यह मुस्लिम समाज में ऐसी बुरी प्रथा है जो पीड़ित महिला को अधर में निराश्रित छोड़ देती है। किंतु किसी घटना के बाद पूरे मुस्लिम समाज से बदला लेने के लिए निरपराध लोगों को औरतों बच्चों और उनकी सम्पत्तियों को जला देने वालों के पक्षधरों से यह उम्मीद बेमानी थी कि वे उनके भले के लिए यह कदम उठा रहे हैं। इससे प्रगतिशीलता का दावा करने वाले अन्य विपक्षी दलों को विभूचन में छोड़ दिया। उस हिन्दू समाज में जिसके प्रतिनिधि होने का ये दावा करते हैं, में ढेर सारी गलत परम्पराएं हैं, किंतु देवदासियों से लेकर महिलाओं के मन्दिर प्रवेश तक पर ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश तक मानने को तैयार नहीं।

धारा 370 को हटाने की तैयारी इसके लागू करते समय ही थी, और इसी कारण इसमें अस्थायी शब्द जोड़ा गया था। इसके बहुत से प्रावधान जैसे राज्यपाल की जगह राष्ट्रपति होना या मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री होने को पहले से ही हटाया जा चुका था। कश्मीर में भारत के विलय के समर्थक सभी राष्ट्रीय दल थे और सब चाहते थे कि उचित समय पर इसे हटा दिया जाना चाहिए। किंतु इसे जिस तरह से प्रस्तुत किया गया उससे ऐसी छवि बनी कि शेष विपक्षी दल इसे हटाना नहीं चाहते और वे पाकिस्तान के पक्ष के समर्थन में हैं। दूसरी ओर वे यह भी प्रचारित करते हैं कि विपक्षी दल ऐसा वोट बैंक के लालच में कर रहे हैं अर्थात देश के सारे मुसलमान देश्द्रोही हैं व पाकिस्तान समर्थक हैं जो इसी आधार पर गैरभाजपा दलों को समर्थन देते हैं। सीमित सूचनाओं वाले लोग इस पर भरोसा भी कर लेते हैं।

गाँधी नेहरू परिवार का स्वतंत्रता संग्राम में गौरवशाली इतिहास रहा है जिसके प्रति पूरा देश उपकृत महसूस करता रहा है। उनके बाद की पीढी ने उनके इस इतिहास को हद से अधिक भुनाया और कांग्रेस में दूसरा नेत्रत्व ही विकसित नहीं हो सका। ऐसे लोग भी नेतृत्व में आ गये जो इस ऎतिहासिक पार्टी का नेतृत्व करने में उतने सक्षम नहीं थे जितने की आवाश्यकता थी। एक रणनीति के रूप में भाजपा परिवार ने इतिहास को विकृत करते हुए नेहरू जी की छवि को झूठे किस्सों से बिगाड़ने का सोचा समझा खेल खेला। इनका पूरा जोर उन मतदाताओं को फुसलाना होता है जिनकी जानकारियों के स्त्रोत सीमित हैं। इन सीमित स्त्रोतों को भी खरीद कर उनकी सोच को एक अवैज्ञानिक धारा में कैद कर दिया गया है।

भाषा से लेकर प्रतीकों तक ऐसा खेल रचा जा रहा है जिसमें सच को विलोपित किया जा रहा है और झूठ को स्थापित किया जा रहा है। यह सबकुछ चुनावी बहुमत हस्तगत करने के गुणाभाग के अनुसार सोच समझ कर किया जा रहा है। जब उनका ध्यान सच की ओर आकर्षित किया जाता है तो उनका उत्तर होता है कि इसी को तो राजनीति कहते हैं। यह एक गलत उत्तर है, यह राजनीति नहीं कूटनीति है।

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