दूसरे कश्मीर की आवाज़ें – सुभाष गाताडे

3:32 pm or August 24, 2019
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दूसरे कश्मीर की आवाज़ें
जब स्वास्थ्य रक्षक जनता के जिन्दगी एवं स्वास्थ्य के हक़ में आवाज़ बुलन्द करते हैं

– सुभाष गाताडे

कई बार सत्य को कौन जुबां देगा, कौन चौतरफा व्याप्त चुप्पी को तोड़ेगा, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल होता है।

जम्मू कश्मीर के मौजूदा सूरतेहाल को लेकर – जहां विगत पन्दरह दिनों से अधिक समय से लाखों लोग ‘लॉकडाउन’ की स्थिति में है, जहां राज्य की स्वायत्तता को रातों रात खतम करने के फैसले के बाद अभी भी हालात सामान्य नहीं बताए जा रहे हैं, जबकि मुख्यधारा का मीडिया ‘सब ठीक है’ के बोल सुना रहा है, उस वक्त़ चन्द चिकित्सकों एवं चिकित्सा जगत से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा की जा रही बात सच्चाई से परदा हटाते दिखती है।
मीडिया के एक हिस्से में ख़बरें भी आयी हैं कि देश भर में फैले अठारह डॉक्टरों ने – जिनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सक्रिय डा रमणी अतकुरी भी शामिल हैं – बीएमजे, जो अंतरराष्टीय स्तर का चिकित्सकीय क्षेत्रा का रिसर्च जर्नल है , को पत्रा लिखा है और केन्द्र सरकार से यह गुजारिश की है कि कश्मीर में ‘‘सम्प्रेषण और यातायात पर लगी बन्दिशें जल्द से जल्द समाप्त की जाएं’’ (https://www.thehindu.com/news/national/other-states/in-letter-in-bmj-doctors-urge-government-to-allow-patients-in-kashmir-to-access-health-care/article29154655.ece).  उन्होंने कश्मीर में पैदा मानवीय संकट की तरफ ध्यान दिलाया है जिसने लोगों के जिन्दगी एवं स्वास्थ्य सेवा के अधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन होता दिख रहा है।’  ((https://www.bmj.com/content/365/bmj.l4303/rr)
मालूम हो कि दो सप्ताह बीत चुके हैं जबसे कश्मीर अभूतपूर्व सुरक्षा कवच में लिप्त है और जनता के व्यापक प्रतिरोध से बचने के लिए लोगों यह स्थिति बनायी गयी है ताकि सरकार द्वारा धारा 370 की समाप्ति का जो ‘विवादास्पद कदम’ उठाया गया है, उससे निपटा जा सके।
डॉक्टरों का यह ख़त इस बात की ताईद करता है कि जो स्थितियां बनी हैं, उसके चलते न केवल मरीजों को बल्कि अस्पताल के स्टाफ को भी अस्पताल पहुंचने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और कई महत्वपूर्ण दवाइयां भी मेडिकल स्टोर में या तो समाप्त हो चुकी हैं या समाप्ति की कगार पर हैं। ‘‘ इस स्थिति ने पहले से अधिक मानसिक तनाव से गुजर रही आबादी को अधिक तनाव झेलना पड़ रहा है।’’ बयान यह भी बताता है कि राज्य के ‘लॉकडाउन’ में होने तथा सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं एवं नेताओं की गिरफतारी तथा संचार-सम्प्रेषण के तमाम साधनों पर लगी पाबन्दियों के चलते ‘‘ घाटी के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाना भी बहुत कठिन हो चुका है।’  (https://www.bmj.com/content/365/bmj.l4303/rr )
ध्यान देनेयोग्य है कि डॉक्टरों का यह समूह अकेला नहीं है जिसने लोगों के स्वास्थ्य एवं जीवन के अधिकार के बारे में गहरी चिन्ता व्यक्त की है।
अग्रणी ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ‘लान्सेट’ ने अपने सम्पादकीय में जिसका शीर्षक है ‘फीयर एण्ड अनसर्टनिटी अराउंड कश्मीर्स फयूचर’ / कश्मीर के भविष्य के इर्दगिर्द फैलता डर और अनिश्चितता’ में लिखा है कि ‘‘लम्बे समय से जारी हिंसाचार ने वहां जबरदस्त मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा किया है’  (https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(19)31939-7/fulltext)     सम्पादकीय में प्रधानमंत्राी मोदी के इस दावे पर भी प्रश्न उठाया गया है कि ‘‘स्वायत्तता को हटाने से कश्मीर में सम्रद्धि आएगी’। सम्पादकीय का कहना है ‘कि ‘‘कश्मीर के लोगों के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि दशकों से चले आ रहे इस संघर्ष से हुए जख्मों पर पहले थोड़ा मरहम लगे न कि उन्हें हिंसा एवं अलगाव के नए दौर के अधीन किया जाए’’। उसने चन्द आंकड़े भी उदध्रत किए हैं जो बताते हैं कि दशको ंसे चली आ रही अस्थिरता के बावजूद कश्मीर के विकास सूचकांक शेष भारत से अच्छे हैं। वर्ष 2016 में वहां आयु-संभाव्यता पुरूषों के लिए 68.3 साल और स्त्रिायों के लिए 71.8 साल थी जो राष्टीय औसत से अधिक थी।  (https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(19)31939-7/fulltext)
जैसे कि उम्मीद की जा सकती है ‘लान्सेट’ द्वारा उठाए गए इन प्रश्नों के बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसने कहा है कि कश्मीर के बारे में बोलने के लिए जर्नल को कोई अधिकार नहीं है और ‘‘सम्पादकीय निहित बेईमान इरादों को प्रतिबिम्बित करता है।’  (http://www.kashmirtimes.com/newsdet.aspx?q=93851)
अगर हम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की प्रतिक्रिया की पड़ताल करें तो यही लगता है कि जल्दबाजी में उन्होंने न तथ्यों को जांचने की कोशिश की है और न ही प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल के इतिहास को खंगालने की कोशिश की है – जिसके तहत उसने उन मुददों को उठाने में कभी परहेज नहीं किया है, जिसमें राजनीति और चिकित्सा के मुददे घुलेमिले हों क्योंकि उसका मानना रहा है कि ‘हर समाज में स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुददा होता है।’ (https://www.telegraphindia.com/india/lancet-does-what-indian-media-wont/cid)    ऐसा प्रतीत होता है कि यह डॉक्टरगण आम जनमानस में प्रचलित धारणाओं से प्रभावित हुए हैं और कश्मीर के बहाने जो उन्माद पैदा किया जा रहा है, उसका शिकार हुए है।
पहली अहम बात यह है कि क्षेत्रा के मानसिक स्वास्थ्य संकट के बारे में उसके दावे ‘मेडिसिन्स सैन्स फा्रंटियर्स’ /एमएसएफ/अर्थात डॉक्टर्स विदाउट बार्डर्स नामक अंतरराष्टीय स्तर पर प्रतिष्ठित संस्था द्वारा संकलित आंकड़ों पर आधारित है, जो विगत कुछ सालों से जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में लोगों के लिए कौन्सलिंग सेवाएं उपलब्ध करा रही है और जिसने अपने उपरोक्त अध्ययन को कश्मीर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग और इन्स्टिटयूट आफ मेण्टल हेल्थ एण्ड न्यूरोसाइंस के साथ मिल कर अंजाम दिया है।
यह वैज्ञानिक अध्ययन इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है, जिसने इस विचलित करनेवाले आंकड़ों को उजागर किया है कि ‘कश्मीरी आबादी का 45 फीसदी किसी न किसी किस्म के मानसिक तनाव का शिकार है।’ (https://www.msfindia.in/msf-scientific-survey-45-kashmiri-population-experiencing-mental-distress/)

‘अक्तूबर और दिसम्बर 2015 के दरमियान डाक्टर्स विदाउट बार्डर्स द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पता चला है कि कश्मीर घाटी के लगभग 18 लाख वयस्क / आबादी का 45 फीसदी हिस्सा/किसी न किसी किस्म के मानसिक तनाव के लक्षण प्रगट करते हैं ..
इस सर्वेक्षण के मुताबिक जिस अध्ययन का सारांश श्रीनगर के गर्वमेण्ट मेडिकल कालेज में मानसिक स्वास्थ्य पर हुए सेमिनार में प्रस्तुत किया गया, 41 फीसदी वयस्क संभवत: अवसाद, 26 फीसदी घबराहट और 19 फीसदी संभवत: पोस्ट टॉमाटिक स्टेस डिसआर्डर  (Post-Traumatic Stress Disorder)  के लक्षण प्रदर्शित करते हैं।
इलाके में स्थिति की गंभीरता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अंजाम दिए गए एक अध्ययन के मुताबिक /2015/ अपने जीवन में पांच में से एक व्यक्ति को कभी न कभी अवसाद का शिकार होना पड़ता है अर्थात लगभग 20 करोड़ लोग इसका शिकार होते हैं।  (https://www.weforum.org/agenda/2018/04/5-charts-that-reveal-how-india-sees-mental-health/)     अगर हम एक अन्य सर्वेक्षण को देखें तो उसके मुताबिक ‘नेशनल मेडिकल हेल्थ सर्वे बताता है कि भारत के लगभ 15 करोड लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के इलाज की जरूरत है, जिनमें से 70 से 92 फीसदी लोग इसका उचित इलाज भी नहीं कर पाते हैं।’ (https://yourstory.com/2018/10/india-needs-focus-mental-health-wellbeing)     हम फरक नोट कर सकते हैं कि जहां शेष भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मसलों से पीड़ित लोगों की संख्या 15-20 फीसदी है, वहीं कश्मीर में यह आंकड़ा 45 फीसदी तक है।
ध्यान रहे कि यह पहला मौका नहीं है जब ‘लान्सेट’ ने मानसिक स्वास्थ्य के परे जाकर मुददे उठाए हैं।
इस माह की शुरूआत में ही उसने ब्राजिल के राष्टपति जेर बोलसोनारो पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और बताया था कि किस तरह उनकी नीतिया‘‘‘ब्राजिल की देशज आबादी के लिए – जिन्हें वर्ष 1988 के संविधान ने जमीन के विशेष अधिकार की अनुमति दी है –  सबसे गंभीर ख़तरा बन कर आयी है।’’दो माह पहले ही उसने वेनेजुएला के राष्टपति मादुरो की इस रणनीति पर सवाल उठाया था जहां वह ‘‘अनाज वितरण के नियंत्राण’ को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रोफेसर विक्रम पटेल – जो हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में प्रोफेसर हैं ’ उनका इंडियन एक्स्प्रेस का हालिया लेख ‘‘मेंटल इलनेस आफटन स्टेम्स फा्रम अर्ली लाइफ टोमा. इट इज हैपनिंग इन कश्मीर’ में इसी किस्म के सरोकारों को रखा गया है। ( https://indianexpress.com/article/opinion/columns/judgement-day-3-kashmir-unrest-mental-illness-5883899/)  इसमें मोहम्मद अल्ताफ पॉल और वहीदा खान के एक पर्चे के अंश उदध््रात किए गए हैं । गौरतलब है कि यह अध्ययन वर्तमान विवादों के पहले सम्पन्न हुआ था और उसके निष्कर्ष जर्नल कम्युनिटी मेण्टल हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं:
इस पर्चे में शोपियां जिले के 12 स्कूलों के लगभग एक हजार छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर किए गए सर्वेक्षण के नतीजे प्रकाशित किए गए हैं। इसमें एक विचलित करनेवाला निष्कर्ष है: यहां अध्ययनरत तीन में से एक बच्चा चिकित्सकीय निगाह से मानसिक विचलन के दौर से गुजर रहा है, जो आम तौर पर मूड, घबराहट और व्यवहारगत अनियमितताओं के रूप में प्रगट होती है।
हम यह भी याद कर सकते हैं कि यह कोई पहली मर्तबा नहीं है कि घाटी के लोगों की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति का प्रसंग चर्चा में आया है। हम पेंग्विन द्वारा प्रकाशित हुमरा कुरैशी की किताब ‘कश्मीर: द अनटोल्ड स्टोरी’ को भी देख सकते हैं, जिसमें कश्मीर विवाद के ऐसे कई पहलू उजागर किए गए थे । सदमे के बाद की तनाव की स्थिति  ( post traumatic stress disorder)  को लेकर कश्मीर का उनका अध्ययन बताता है कि मनोवैज्ञानिक बीमारियों के इलाज के लिए बने कश्मीर घाटी के एकमात्रा सरकारी अस्पताल के बाह्य रूग्ण विभाग (OPD) आनेवाले मरीजों की संख्या 1990 के छह से इसवी 2000 तक आते-आते रोजाना 250-300 तक पहुंची थी। अस्पताल के रेकार्ड बताते हैं कि वर्ष 1990 में अगर भर्ती हुए मरीजों की संख्या 1760 थी तो यह आंकड़ा 1994 में 18,000 तक पहंुचा जो 2001 तक आते-आते 38,000 तक गया।’’ हम खुद देख सकते हैं कि रोज आने वाले मरीजों की संख्या में जहां चालीस गुना बढ़ोत्तरी हुई वहीं भरती हुए मरीजों की तादाद में 20 गुना वृद्धि हुई।
अश्वेतों के महान नेता मार्टिन ल्यूथर किंग ने कहा था कि ‘हमारे समय की त्रासदी यह नहीं है कि बुरे लोगों के हाथों उत्पीड़न एवं क्रूरता को अंजाम दिया जा रहा है, बल्कि यह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर अच्छे लोग मौन बनाए हुए हैं।’
भारत के अठारह डॉक्टरों की सत्य को उजागर करने की पहल और ‘लान्सेट’ द्वारा इसी कड़ी में पेश बातें – प्रश्न उठता है कि कश्मीर के हालात पर हमारे समय के अच्छे कहे जानेवाले लोग अभी भी मौन धारण किए रहेंगे या कुछ बोल उठेंगे।

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