वे अपने पीछे छोड़ गए हैं एक सुगंधित एहसास – शैलेंद्र चौहान

4:03 pm or October 4, 2019
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वे अपने पीछे छोड़ गए हैं एक सुगंधित एहसास

शैलेंद्र चौहान
1949 में गांधी के बारे में जॉर्ज ऑरवैल ने लिखा था, “सौंदर्यबोध के लिहाज़ से कोई गांधी के प्रति वैमनस्य रख सकता है जैसा कि मैं महसूस कर रहा हूँ. कोई उनके महात्मा होने के दावे को भी खारिज कर सकता है (हालांकि महात्मा होने का दावा उन्होंने खुद कभी नहीं किया). कोई साधुता को आदर्श के तौर पर ही खारिज कर सकता है और इसलिए ये मान सकता है कि गांधी का मूल भाव मानवविरोधी और प्रतिक्रियावादी था. लेकिन एक जन नेता के तौर पर देखने पर और मौजूदा समय के दूसरे तमाम राजनेताओं से तुलना करने पर हम पाते हैं- वे अपने पीछे कितना सुगंधित एहसास छोड़कर गए हैं.” महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अन्याय, भेद-भाव, शोषण अत्याचार के विरुद्ध सत्य अहिंसा पर आधारित सफल सत्याग्रह आंदोलन कर न केवल भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा बल्कि पूरा विश्व इससे प्रभावित हुआ था. भारत में उन्होंने लोक चेतना जागृत कर ‘राष्ट्रीय आन्दोलन’ के आधार को विस्तृत स्वरूप प्रदान किया और देश को आज़ादी दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस आन्दोलन एक सार्वजनिक आन्दोलन बन गया. कांग्रेस संगठन को अधिक सुदृढ़ बनाया गया और उसे अधिक जनतांत्रिक बनाया गया. गांधी जी ने भारतीयों में इतनी अधिक लोक चेतना भर दी कि अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाने के लिए सोचना पड़ा. हालांकि क्रांतिकारी आंदोलन के योग को यहां नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी महती भूमिका थी. यह सच है कि गांधी जी ने सत्य अहिंसा तथा सत्याग्रह के गुणों को ‘जनमानस’ तक पहुँचाया और राष्ट्रीय आन्दोलन में उनका सफलतापूर्वक प्रयोग किया. भारत और विश्व के इतिहास में सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का सामूहिक और राजनैतिक व्यवहार अभूतपूर्व है और यह सदा स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा. नाना जी देशमुख का मानना था कि गांधी जी ने ‘सत्याग्रह’ के माध्यम से जनता में लोक चेतना ‘जागृत’ करके राष्ट्रीय आन्दोलन को जनांदोलन का रूप दिया. गांधी जी से पूर्व किसी नेता ने जनांदोलन के लिए काम नहीं किया था. यद्दपि गांधी जी की कुछ सीमाएं भी थीं. उनके विचार जाति, वर्णाश्रम और धर्मांतरण जैसे प्रश्नों पर सुधारवादी थे, और वे भारतीय परंपरा में ही इसकी काट ढूंढ़ने का प्रयास करते थे. इसका कारण था कि वे समझते थे यदि भारतीय परंपरा में ही इसकी काट ढूढ़ ली जाएगी, तो घोर दकियानूसी मानसिकता वाले हिन्दू भी ऐसे परिवर्तनों को सहज ही स्वीकार कर लेंगे. इससे भारतीय समाज आपसी कलह, संघर्ष और टूटन से बच जाएगा. हम यह भी देखते हैं कि उस समय बाबा साहब अंबेडकर पूरी तरह से आधुनिक राजनीतिक संस्कृति को लागू करने की कोशिश में थे, जिसमें कुछ भी बुरा नहीं था. समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे से भला किसे ऐतराज हो सकता था. लेकिन दलितों और सवर्णों के बीच की जड़ता को वे कम करके आंक रहे थे. जबकि गांधी को उस जड़ता की ठीक-ठीक पहचान थी और सामाजिक हृदय-परिवर्तन के सहारे सांस्कृतिक स्तर पर ही उस जड़ता को हमेशा के लिए दूर करना चाहते थे.
हम आज भी देख सकते हैं कि अत्यधिक आधुनिक मानवतावादी मूल्यों से भरे संविधान को व्यावहारिक रूप से सामाजिक स्तर पर अपना पाने में हमारा समाज कितना विफल रहा है. क्योंकि केवल कानूनी और राजनीतिक साधनों से सामाजिक जड़ता को दूर करना आसान नहीं होता है. तमाम कानूनों और संवैधानिक व्यवस्थाओं के रहते और तमाम राजनीतिक लामबंदी के बावजूद जातीय हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा और अंधविश्वास थमने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि बढ़ ही रहा है. ऐसे गांधी की नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 की शाम को नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन में गोली मारकर हत्या कर दी. जब वे संध्याकालीन प्रार्थना के लिए जा रहे थे तभी नाथूराम गोडसे नाम के व्यक्ति ने पहले उनके पैर छुए और फिर सामने से उन पर बैरेटा पिस्तौल से तीन गोलियाँ दाग दीं. उस समय गान्धी अपने अनुचरों से घिरे हुए थे. इस मुकदमे में नाथूराम गोडसे सहित आठ लोगों को हत्या की साजिश में आरोपी बनाया गया था. आठ लोगों में से तीन आरोपियों शंकर किस्तैया, दिगम्बर बड़गे, सावरकर, में से दिगम्बर बड़गे को सरकारी गवाह बनने के कारण बरी कर दिया गया. शंकर किस्तैया को उच्च न्यायालय में अपील करने पर माफ कर दिया गया. सावरकर के खिलाफ़ कोई सबूत नहीं मिलने की वजह से अदालत ने जुर्म से मुक्त कर दिया. बचे पाँच अभियुक्तों में से तीन – गोपाल गोडसे, मदनलाल पाहवा और विष्णु रामकृष्ण करकरे को आजीवन कारावास हुआ तथा दो- नाथूराम गोडसे व नारायण आप्टे को फाँसी दे दी गयी. नाथूराम इससे पहले भी बापू के हत्या की तीन बार (मई 1934 और सितम्बर 1944 में) कोशिश कर चुका था, लेकिन असफल होने पर वह अपने दोस्त नारायण आप्टे के साथ वापस बम्बई चला गया. इन दोनों ने दत्तात्रय परचुरे और गंगाधर दंडवते के साथ मिलकर बैरेटा नामक पिस्टल खरीदी. असलहे के साथ ये दोनों 29 जनवरी 1948 को वापस दिल्ली पहुँचे और दिल्ली स्टेशन के रिटायरिंग रूम नम्बर 6 में ठहरे और 30 जनवरी 1948 की शाम को उनकी हत्या कर दी.
यह हत्या किन कारणों से की गई यह प्रश्न विचारणीय है. नाथूराम के भाई और हत्या के सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब ‘गांधी वध क्यों’, में किया है.गोपाल गोडसे को फांसी नहीं हुई, क़ैद की सजा हुई थी. जब देवदास गांधी पिता की हत्या के बाद संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने पहुंचे थे, तब नाथूराम गोडसे ने उन्हें पहचाना था. गोपाल गोडसे ने अपनी किताब में लिखा है, “देवदास शायद इस उम्मीद में आए होंगे कि उन्हें कोई वीभत्स चेहरे वाला, गांधी के खून का प्यासा कातिल नज़र आएगा, लेकिन नाथूराम सहज और सौम्य थे. उनका आत्म विश्वास बना हुआ था. देवदास ने जैसा सोचा होगा, उससे एकदम उलट.” यह गोपाल गोडसे का कथन है लेकिन निश्चित तौर पर हम ये नहीं कह सकते कि वाकई में ऐसा रहा होगा. नाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, “मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं. हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक. मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). आज तुमने अपने पिता को खोया है. मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है. तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है. कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव.” देवदास ने तब पूछा, “तब, तुमने ऐसा क्यों किया?” जवाब में नाथूराम ने कहा, “केवल और केवल राजनीतिक वजह से.” नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी. फिर नाथूराम के वक्तव्य में आख़िर ऐसा था क्या? गोपाल गोडसे के अनुसार उसमें नाथूराम ने इन खास पहलुओं का ज़िक्र किया है- पहली बात, वह गांधी का सम्मान करता था. उसने कहा था, “वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है. मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं.” दूसरी बात, जो नाथूराम ने कही, “इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यकीन इस बात में हुआ कि मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते. 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है.” इस नज़रिए के बाद नाथूराम ने गांधी के बारे में सोचा. “32 साल तक विचारों में उत्तेजना भरने वाले गांधी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे. अगर देश को उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था. अगर देश उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता तो वे कांग्रेस से अलग राह पर चलने लगते.” इस सोच ने नाथूराम को गांधी की हत्या करने के लिए उकसाया. नाथूराम ने भी कहा, “इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते. या तो कांग्रेस को गांधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गांधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गांधी के बिना आगे बढ़ना होता.” तीसरा आरोप ये था कि गांधी ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की. नाथूराम ने कहा, “जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था. व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं. लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं.”
नाथूराम के तर्कों के साथ समस्याएं थीं. मसलन, उसकी सोच थी कि गांधी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में गांधी तानाशाह थे, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए गांधी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी. किसी तानाशाह को आदेश देने के सिवा कुछ करने की जरूरत क्यों होगी? नाथूराम ने गांधी की अंतिम भूख हड़ताल (जो उन्होंने पाकिस्तान को फंड जारी करने से भारत के इनकार करने पर की थी) पर सवाल उठाए, लेकिन यह उन्होंने तब किया जब भारत अपने ही वादे से पीछे हट रहा था. गांधी ने इस मौके पर देश को सही एवं उपयुक्त रास्ता दिखाया था. नाथूराम ने अदालत में जो भी कहा, तर्क के आधार पर उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. यह देवदास को दिए बयान से भी उलट है. केवल राजनीति के चलते उसने गांधी की हत्या नहीं की थी. वह गांधी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से नफ़रत करता था. यह वास्तविक सनातन हिंदू धर्म भाव के बिलकुल उलट था. निश्चित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उसका ‘ब्रेनवाश’ किया था. वास्तविकता यही है कि गांधी का कोई भी रास्ता या तरीका ऐसा नहीं है, जिस पर सवाल उठाए जा सकें. यही वजह है कि दशकों बाद भी एक जन-नेता के तौर पर उनकी वैश्विक साख कायम है.
यह विडम्बना ही है कि अब गांधीजी की जयंती और पुण्यतिथि के बीच की अवधि में उनके आदर्शों और मूल्यों के साथ कोई नहीं होता है। बचे-खुचे गांधीवादी भी नहीं. वे गांधीजी का साथ दे भी नहीं सकते हैं क्योंकि आज की जरूरतों और परिस्थितियों ने उन्हें भी सिखा दिया है कि गांधी बनने से केवल प्रताड़ना मिल सकती है, संपदा, संपत्ति नहीं. वैचारिक धरातल में यह खोखलापन एक दिन या एक माह या एक वर्ष में नहीं आया है. जान-बूझकर धीरे-धीरे योजनाबद्ध ढंग से गांधी के सिद्धांतों को समाप्त किया जा रहा है क्योंकि यह मौजूदा स्वार्थों में सबसे बड़े बाधक हैं. गांधी के देश में रोज प्रायोजित हत्याएं हो रही हैं. बच्चे, महिलाएं, वृद्ध, बुद्धिजीवी और गरीब मजदूर किसान मारे जाते हैं लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. कहते हैं कि जो राष्ट्र अपने चरित्र की रक्षा करने में सक्षम नहीं है, उसकी रक्षा कोई नहीं कर सकता है. क्या परमाणु बम भारतीयता की रक्षा कर पाएगा? दरअसल, यह भुला दिया गया है कि पहले विश्वास बनता है, फिर श्रद्धा कायम होती है. किसी ने अपनी जय-जयकार करवाने के लिए क्रम उलट दिया और उल्टी परंपरा बन गई. अब विश्वास हो या नहीं हो, श्रद्धा का प्रदर्शन जोर-शोर से किया जाता है. गांधीजी भी श्रद्धा के इसी प्रदर्शन शिकार हुए हैं. उनके सिद्धांतों में किसी को विश्वास रहा है या नहीं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता. गांधीजी के विचार बेचने की एक वस्तु बनकर रह गए हैं. वे छपे शब्दों से अधिक कुछ नहीं हैं. हर तरफ पाखंड है. इसीलिए गांधी की जरूरत आज पहले से कहीं अधिक है.
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