लहू के दो रंग

4:52 pm or September 22, 2014
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-अखलाक अहमद उस्मानी  –

कुरआन और हदीस में बेशुमार जगह अत्याचारियों को इस बात से रोका गया है कि वे धर्म के आधार पर जुल्म करें।

कुरआन अल्लाह के कथन हैं और हदीस उसके पैगंबर हजरत मुहम्मद के। लेकिन दो सौ साल पहले पैदा हुई ‘वहाबियत’ और इसके मानने वाले ‘वहाबियों’ को इससे मतलब नहीं। इराक में यजीदियों और शिया ही नहीं, बल्कि अंधाधुंध सुन्नी सूफियों के खून में वहाबी आतंकवादियों के हाथ डूबे हुए हैं।

इराकी संसद में अकेली यजीदी सांसद वियान दाखिल की पांच अगस्त की दारुण अपील को दुनिया भर ने देखा। कुर्दिश गठबंधन की सांसद दाखिल ने सिंजर की पहाडि़यों में इस्लामी स्टेट या आइएसआइएस के आतंकवादियों की मुट्ठी में कैद एक पूरी कौम की कारुणिक दशा का वर्णन किया तो दुनिया सकते में आ गई।

इस्लामी स्टेट या आइएसआइएस के आतंकवादियों की नजर में यों तो इंसानी जान की कोई कीमत नहीं, लेकिन यजीदी समुदाय को विशेष रूप से प्रताडि़त करने के पीछे कई विशेष कारण हैं। पहला अपने दाग धोने की बेकार कोशिश के तौर पर समझिए। दरअसल, वर्ष 680 ईस्वी में करबला के मैदान में पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे और खलीफा हजरत अली के पुत्र हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार के इकहत्तर लोगों को तत्कालीन जालिम यजीद की सेना ने शहीद कर दिया था। शिया और सुन्नी सूफी समुदाय आज भी मुहर्रम के महीने में चालीस दिन का शोक करते हैं और इस्लामी इतिहास के इस महान बलिदान को याद करते हैं। दो सौ साल पहले जनमी वहाबी विचारधारा में यजीद को बहुत सम्मान दिया जाता है और हजरत इमाम हुसैन की जंग को राजनीतिक बता कर उनका सम्मान घटाने की घटिया कोशिश की जाती रही है। भारत में मुंबई से इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख और सऊदी अरब राजपरिवार के करीबी डॉ जाकिर नायक कई बार यह हरकत कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश में डॉ जाकिर नायक के कार्यक्रमों पर पूर्ण प्रतिबंध लगवाने और राजस्थान के जोधपुर शहर में हाल ही में अहले हदीस के एक कार्यक्रम को रद्द करवाने वाले युवा सूफी सुन्नी नेता और ऑल इंडिया उलेमा ऐंड मशाइख बोर्ड के महासचिव सैयद बाबर अशरफ इसे वहाबी विचारधारा का मूल मानते हैं कि पैगंबर हजरत मुहम्मद और उनके परिवार के प्रति सम्मान को घटाने से मुसलमान मुहम्मदी आदर्शों से भटक जाएगा। इस तरह धीमे-धीमे मुसलमान को वहाबी बनाया जा सकता है।

यजीद को नायक मानने की वजह से वहाबी को सूफी और शिया किताबों में ‘यजीदी’ भी कहा जाता है। इराक में अल्पसंख्यक यजीदियों का अरबी में दरअसल नाम ‘एज्दी’ है, लेकिन ‘यजीदी’ नाम से वहाबी यह गलतफहमी फैलाने में कामयाब हो गए कि वे तो इमाम हुसैन से दुश्मनी रखने वालों को मिटा रहे हैं, मगर यह नहीं बता रहे कि दरअसल ‘यजीदी’ तो खुद वहाबी ही हैं।

दूसरे प्रकार के यजीदी वर्तमान ‘एज्दी’ या ‘यजदानी’ समाज के प्रताडि़त लोग हैं जिनकी इराक में साढ़े तीन लाख की आबादी में लगभग आधे लोग भूख, प्यास, प्रताड़ना और कत्ल की भेंट चढ़ गए। मरने वालों में बच्चों की तादाद सबसे अधिक है। सूफी संतों की मजार पर वसीला देकर दुआ मांगने और पारसी मंदिरों में जियारत ‘एज्दियों’ के नियमित धार्मिक अनुष्ठान हैं। वहाबियों की नजर में यह चुभता है। रूस को अपना पक्का दुश्मन मानने वाले वहाबी आतंकवादियों ने रूस में निर्वासित पचास हजार और करीबी जॉर्जिया और आर्मेनिया में पचपन हजार एज्दियों के माध्यम से उन सरकारों पर दबाव बनाने की कोशिश की है जो सऊदी-छाप इस्लाम को अपने-अपने देश में पैर नहीं जमाने नहीं दे रहीं। जब से चेचेन्या के सूफी राष्ट्रपति रमजान कादिरोव ने इनकी पोल खोली है, रूस की ओर वहाबियत के सारे दरवाजे बंद हैं।

तीसरी तरह के यजीदी ‘खारिजीन’ हैं। खारिजीन का शाब्दिक अर्थ है ‘निकाले हुए’। इन्होंने इस्लाम के चौथे खलीफा और पैगंबर हजरत मुहम्मद के दामाद हजरत अली का पहले साथ देने का ढोंग किया और फिर इसी गिरोह के इब्न मुलजम ने हजरत अली को इराक के कूफा शहर में शहीद कर दिया था। खारिजीन शिया और सुन्नी दोनों को अधर्मी कहते हैं। यजीद के इस पसंदीदा गिरोह ने खुद को ‘तकफीरी’ कहा, जो आज वहाबी आतंकवादियों को प्रिय संज्ञा है। खारिजीन इस्लाम की महाकट्टरता को वहाबी आतंकवाद ने अपना लिया है और वे यजीद को सम्मान से याद करते हैं।

यजीदी सांसद वियान दाखिल के संसदीय भाषण के बाद ही अमेरिका की गैरत जागी हो और तब उसने आइएसआइएस के अड्डों पर हवाई हमले किए हों, ऐसा नहीं है। दरअसल, आइएसआइएस के जरिए अमेरिका का सीमित मकसद ही पूरा हो रहा था जिसमें लगभग सौ डॉलर प्रति बैरल सस्ता तेल खरीदना शामिल है। दो अमेरिकी पत्रकारों के आइएसआइएस के कब्जे में आने, उनकी हत्या और आइएसआइएस के वीडियो आतंकवाद की अमेरिका को खबर थी। फॉली की निर्मम हत्या का वीडियो सामने आने पर ओबामा और दबाव में आ गए। ओबामा क्या जवाब देते कि इन कथित सीरियाई आतंकवादियों की वे वकालत क्यों करते रहे?

यह वही अमेरिका है जिसने कतर, सऊदी अरब, तुर्की, इजराइल और फ्रांस के साथ मिल कर सीरिया में बशर अलअसद की सरकार को गिराने के लिए इन भेडि़यों को हथियार दिलवाए और इन्हें सीरिया के क्रांतिकारी बताया। रूस, चीन और ईरान की मदद से बची बशर की सेना ने जब इन आतंकवादियों को धकेला तो ये इराक में आ गए।

अगर सीरिया में बशर की सरकार गिरती तो क्रांतिकारी कहलाते, लेकिन बिना अमेरिका की मर्जी के इराक में उसके राजनीतिक उद्देश्यों को पलीता लगाने के लिए सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख बंदर बिन सुल्तान के एजेंडे को पूरा करने के लिए घुस आने पर अमेरिका को ये आतंकवादी नजर आने लगे। आज अमेरिका को लगता है कि इस्लामी स्टेट या आइएसआइएस का खतरा इतना बड़ा हो गया है कि सीरिया की हवाई सीमा में घुस कर ही इन्हें खत्म किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए बशर की मंजूरी नहीं ली जाएगी।

ओबामा किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहे। पहले उन्होंने सीरिया सरकार को गिराने के लिए ‘क्रांतिकारियों’ की मांग और हिंसा को जायज ठहराया और अब उसी सीरिया और इराक के इलाकों में इस्लामी स्टेट या आइएसआइएस के आतंकवादियों को मार गिराने के लिए बेकरार हैं। सीरिया के विदेशमंत्री वलीद मुअल्लिम ने दमिश्क में छब्बीस अगस्त की प्रेसवार्ता में कहा कि वे इस्लामी स्टेट या आइएसआइएस के आतंकवादियों को खत्म करने में अमेरिका का साथ दे सकते हैं। लेकिन कम से कम ओबामा पूछें तो सही। ओबामा पूछेंगे या बशर को साथ लेकर चलेंगे तो उनकी नाक नहीं कट जाएगी? दुनिया को क्या जवाब देंगे कि जिस सांप को दूध पिलाया उसका मुंह क्यों कुचलने लगे? सांप बशर को काट लेता तो अच्छा था। लेकिन इराक में अमेरिकी टोली और कतर के राजनीतिक उद्देश्यों को डसने लगा तो बुरा क्यों हो गया? इतनी बदनामी से थोड़ी बेहयाई अच्छी है।

शिया चिंतक शौकत भारती का कहना है कि अपने आप को सुन्नी कहने वाले अकेले ‘इस्लामी राज्य’ के वहशी आतंकवादियों और इनसे हमदर्दी रखने वाले कथित मौलानाओं और मुफ्तियों को वहम है कि दुनिया में उनके अलावा कोई पाक-साफ नहीं है। इसलिए जो उनकी बात नहीं माने या उनकी पैरवी न करे वह ‘काफिर’ है और वहाबी फिक्र में ‘काफिर’ को जिंदा रहने का कोई हक नहीं। वहाबियों की काफिर की परिभाषा सिर्फ गैर-मुसलमान समाजों के लिए नहीं, बल्कि शिया, बहुसंख्यक सुन्नी सूफियों, इबादी और अहमदियों के लिए भी लागू है।

यानी वहाबी अपने अलावा सभी को काफिर मानता है और ‘वाजिबुल कत्ल’ यानी ‘मृत्यु के लिए नियत’ भी। इसलिए वहाबी अपने आपको ‘तकफीरी’ यानी ‘शुद्धतावादी’ या ‘परिहारी’ भी कहता है। इनके कई साथी खुद को ‘सलफी’ यानी ‘पूर्वार्द्धी’ या ‘पुराना सच्चा इस्लामी’ भी कहते हैं। मगर वहाबी यह चाहता है कि उसकी पहचान सुन्नी के तौर पर हो, क्योंकि ‘वहाबी’ शब्द इन्हें उनके आका इब्न अब्दुल वहाब के नाम और पापों से जोड़ देता है और यह नाम भी उन्हें शिया और सूफी मुसलमानों ने दिया है जिससे उनकी असल पहचान उजागर होती है।

भारत वहाबी चिंतन की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है। सऊदी अरब तक भारत का लोहा मानता है। वहाबी समर्थन की सबसे अधिक किताबें भारत में लिखी गई हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे उदार सूफी सुन्नी मत की सर्वाधिक पुस्तकों का लेखन भारत में हुआ है। मगर अफसोस इस बात का है कि तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले सेक्युलर दल हर टोपी को मुसलमान की टोपी समझ लेते हैं और हिंदू दक्षिणपंथी पार्टियों ने कभी इस बात की जरूरत ही नहीं समझी कि मुसलमान की सामाजिक बनावट और वैचारिक विरोधाभास को ही समझ लें। भारत का कोई सियासी दल नहीं जानता होगा कि सिर्फ वक्फ बोर्ड की मस्जिदों में वहाबी इमामों की नियुक्ति से कितना जहर फैल रहा है। जिस भोंथरी वहाबी विचारधारा को भारत में धार मिली है उसी का नतीजा है कि इराक में तथाकथित जिहाद करने वाले अठारह भारतीय लड़कों की पहचान हो चुकी है।

वहाबियों की कथनी और करनी में विराट अंतर है, उतना ही गहरा अंतर जितना खारिजीन का हजरत अली का साथ देने के नाम पर था। इस्लाम की शक्ल में इस्लाम को बदनाम करने से सिर्फ अरब राजशाही परिवारों की तानाशाही और अय्याशियां बची रह जाएंगी और इसके बदले सामाजिक बदनामी और ‘कॉनफ्लिक्ट जोन’ का फायदा वे देश उठा ले जाएंगे जो हथियारी सौदों को इंसानी जान से ज्यादा जरूरी मानते हैं।

वहाबी आतंकवादी नौजवान इस गलतफहमी में खुदकश बम बन कर मिट जाते हैं कि वे अल्लाह के लिए जान दे रहे हैं, लेकिन उन्हें कौन समझाए कि रियाद और दोहा के महलों की फसीलों को उनके ही खून के दीयों से रोशन किया जाता है। उनके जिहाद का तात्कालिक लाभ इजराइल को उस क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा के रूप में और अमेरिकी टोली को ऊर्जा सुरक्षा और हथियार के व्यापार के रूप में मिलता है। मुसलमान तेल, मुसलमान पैसा, मुसलमान खून और वहाबी कातिल। तेरह सौ साल की विकसित इस्लामी राजनीतिक समझ को वहाबियत सौ साल में यों खा जाएगी, कौन जानता था?

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