इंदौर में ‘मैग्निफिसेंट मध्यप्रदेश’ समिट भरोसे की बांहें थामे, मध्यप्रदेश आ रहे हैं निवेशक – मनोज कुमार

6:19 pm or October 18, 2019
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इंदौर में ‘मैग्निफिसेंट मध्यप्रदेश’ समिट

भरोसे की बांहें थामे, मध्यप्रदेश आ रहे हैं निवेशक

मनोज कुमार
आम आदमी से लेकर बड़े उद्योगपति इस समय मंदी की चपेट में हैं. आप लाख कहिए, लाख कुर्तक दीजिए कि बाजार में मंदी नहीं है, कोई मानने वाला नहीं है. ऐसे कठिन समय में मध्यप्रदेश की जमीन पर उद्योग लगाने के लिए साहस दिखाने वाले उद्योगपति आ रहे हैं तो नाथ सरकार की वे भरोसे की बांहें थामे आ रहे हैं. मध्यप्रदेश में उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं लेकिन इसके लिए पहली शर्त होती है कि उद्योगों की मूलभूत जरूरतों को समझने की. छोटी-छोटी प्रशासनिक कार्यवाहियों में जब उद्योगपतियों को उलझना पड़ता है तो वे प्रोजेक्ट से अपना हाथ खींच लेते हैं. अब तक का अनुभव यही रहा है लेकिन इस बार संदर्भ और कार्यव्यवहार दोनों में फर्क दिख रहा है. मुख्यमंत्री कमल नाथ राजनीतिक हैं, यह उनका एक पक्ष है तो एक पक्ष है कि वे स्वयं उद्योगों से संबद्ध हैं. यही नहीं केन्द्र सरकार में उद्योग मंत्रालय सम्हालने का उनका लम्बा अनुभव है और वे स्वयं जानते हैं कि किस-किस किस्म की जरूरतें उद्योगों को होती है. समिट में ही सारी बातें करने और उद्योगों की स्थापना में देर करने की कवायद से बाहर निकल कर मुख्यमंत्री कमल नाथ अपने व्यक्तिगत संबंधों की बुनियाद पर करीब 6 माह से अधिक समय से उद्योगपतियों से वन-टू-वन चर्चा कर चुके हैं. इसके पहले राउंड टेबल मीटिंग में प्रदेश के चुनिंदा और देश के कुछ बड़े उद्योगपतियों को भी आमंत्रित कर चर्चा भी की जा चुकी है। मध्यप्रदेश में उद्योगों का जाल बिछे, इसके लिए उद्योगों की जरूरत के अनुरूप सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी है. विभागीय अधिकारियों की मानें तो इस बार उद्योगों का जाल बिछाने की तैयारी हर स्तर पर पूरी हो चुकी है. इंदौर में हो रहे ‘मैग्निफिसेंट मध्यप्रदेश’ परिणामोन्नमुखी होगा, इस बात का भरोसा प्रदेश के नागरिक भी कर सकते हैं.
मध्यप्रदेश देश का ह्दय प्रदेश कहलता है लेकिन मध्यप्रदेश के लिए बीमारू रा’य का टेग स्थायी हो गया है. जिस शरीर का संचालन करने वाला ह्दय ही कमजोर हो तो शरीर कैसे स्वस्थ्य रह सकता है? यही बात मध्यप्रदेश के लिए भी लागू होती है. मध्यप्रदेश का राजकोष खाली है और उद्योग-धंधे नए आए नहीं और पुराने उठकर चल दिए हैं या चलने की तैयारी में है.  पुराने आंकड़ों पर मोटा-मोटी गौर करेंं तो बहुत सुखद नहीं है. एसोचैम की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि मध्य प्रदेश में निवेश के लिए वित्तीय वर्ष मार्च 2016 में 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जबकि 5&,000 करोड़ निवेश की कागजों पर ही अंकित रह गई. उल्लेखनीय है कि बीते 1& वर्षों में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पहली ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट अक्टूबर 2007 में इंदौर में और दूसरी समिट अक्टूबर 2010 में खजुराहो में की गई थी। इसके अलावा वर्ष 2008 में जबलपुर, सागर और ग्वालियर में रीजनल समिट की गई थीं। समिट प्रत्येक दो वर्ष में किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती सरकार ने 15 साल के कार्यकाल में पांच जीआइएस आयोजित कर उद्योगपतियों से 20.24 लाख करोड़ के एमओयू साइन किए थे, लेकिन इनमें से महज 40 हजार करोड़ के करार ही जमीन पर उतर पाए। पुराने अनुभवों से इतर मुख्यमंत्री नाथ ‘मैग्निफिसेंट मध्यप्रदेश’ के लिए कई महीनों से होमवर्क कर रहे हैं. मुख्यमंत्री कमल नाथ ने जीआइएस के पहले उद्योग विभाग से जुड़ी जानकारी, भूमि की उपलब्धता, औद्योगिक कॉरीडोर तथा प्रदेश की उद्योग नीति की जानकारी अपनी वेबसाइट में अपलोड करने के निर्देश दिए हैं जिससे औद्योगिक घराने अपनी सुविधा और संसाधनों के अनुसार यह इकाइयां स्थापित कर सकें। मध्यप्रदेश की नई उद्योग नीति में जो प्रावधान किया जा रहा है कि जीआइएस से पहले सिंगल विंडो सिस्टम, एक ही जगह अनापत्ति प्रमाण पत्र और अनुमतियां, निवेश की सारी प्रक्रिया ऑनलाइन एवं निवेशकों की सुविधा के लिए अलग से विंग बनाया जाएगा.
पिछले साल हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में पांच लाख करोड़ के निवेश के प्रस्ताव आए थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छह महीने में एक लाख 85 हजार करोड़ का निवेश अब तक हो चुका है। इस सिलसिले में एसोचैम की रिपोर्ट का अवलोकन करना जरूरी होता है। ‘मध्यप्रदेश के विश्लेषण : अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा और निवेश’ शीर्षक से जारी किए गए एसोचैम की रिपोर्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेश के लिए कई मंजूरी की जरूरत थी जिसकी वजह से ये अब तक अधर में लटका हुआ है। निवेश में देरी का कारण भूमि अधिग्रहण, क‘चे माल की आपूर्ति में आ रही बाधाएं, कुशल श्रम का अभाव, वित्तीय दिक्कतें, और प्रमोटरों के इंटरेस्ट में आ रही कमी को जिम्मेदार ठहराया गया है।  निवेश में निजी निवेशकों के न आने का जिक्र भी किया गया है जिसके लिए अनियमित विकास को प्रमुख कारण बताया गया है। मध्यप्रदेश में उद्योगपतियों को निवेश के लिए आकर्षित करने के लिए कि पिछली चार बड़ी ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में सिर्फ ब्रांडिंग पर 11.56 करोड़ खर्च हुए थे, जबकि चार इन्वेस्टर्स समिट का कुल खर्च 47. 54 करोड़ था। ब्रांडिंग पर सबसे ’यादा खर्च 2.8& करोड़ रुपये 2016 में हुई समिट में हुआ था। यह जानकारी उद्योग विभाग द्वारा विधानसभा सदस्यों और आरटीआई में अलग-अलग समिट की दी गई हैं।
बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि लेई कि पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए उद्योग एवं उद्योग मंत्रालय के अनुभव को जमीन पर उतारने में मुख्यमंत्री नाथ जुट गए हैं। मध्यप्रदेश में औद्योगिक निवेश की संभावना ही नहीं बढ़ती है बल्कि विश्वास को पुख्ता करती है कि गुजरते समय के साथ मध्यप्रदेश में उद्योगों का विस्तार तो होगा ही, रोजगार के विपुल अवसर भी यूथ के लिए होंगे। नाथ सरकार अपने फैसले को मुकम्मल स्वरूप देना चाहती है क्योंकि पिछले अनुभव ना केवल निराश करते हैं बल्कि आशंकाओं को बल देते हैं। मध्यप्रदेश एक बार फिर देखेगा कि उद्योग मध्यप्रदेश की बांहें थामे, कैसे जमीन पर उतरता है और कितनी बड़ी संख्या में युवाओं को अपने ही प्रदेश में रोजगार मिलता है। इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि देश का ह्दय प्रदेश अभी संकट के दौर से गुजर रहा है, वर्तमान सरकार के समक्ष चुनौतियों का पहाड़ है लेकिन दशरथ मांझी ने एक रास्ता दिखाया है कि हौसला हो तो पहाड़ों से भी रास्ता निकाला जा सकता है और उम्मीद की जाना चाहिए कि ऐसा ही काम मध्यप्रदेश में कमल नाथ सरकार कर दिखाएगी। मुख्यमंत्री नाथ ने निवेश और रोजगार को अपनी प्राथमिकता में रखा है।
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