इस हवा के चलते जान जोखिम में – शब्बीर कादरी

5:39 pm or November 6, 2019
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इस हवा के चलते जान जोखिम में

  • शब्बीर कादरी

राजधानी भोपाल अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में अधिक वायु प्रदूषित शहर आंका गया जहां एम्बिऐंट एयर क्वालिटी इंडेक्स में यह 241 पर पहुंच गया। जबकि यह आंकड़ा सांस लेने योग्य शुद्ध हवा के मानक स्तर पर 50 से कम होना चाहिए। जिस दिन यह स्थिति निर्मित हुई उस दिन राजधानीवासी थकावट और सांस लेने में कठिनाई को अनुभव करते पाए गए। केंन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की देशभर के 200 शहरों की इस निगरानी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली-एनसीआर, उत्तरप्रदेश के कई शहर सहित हावड़ा, मुरादाबाद के साथ प्रदेश के रतलाम, देवास और अन्य औद्यौगिक इकाईयों की वायु शुद्धता का मापन किया गया था। विकासशील देशों की नियति है कि वे जिन अनेक प्रकार की विसंगतियों से एक साथ जूझने को बाध्य होते हैं उनमें वायु प्रदूषण प्रमुख है जो सबसे पहले प्रभावित होता है। इस परिस्थिति के चलते हर साल विश्वभर में लगभग 60 से 70 लाख लोग मारे जाते हैं जिसमें से आमतौर पर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में ही वायु प्रदूषण के चलते लगभग 20 लाख लोग प्रतिवर्ष अपनी जान गंवाते हैं।

चिकित्सकीय पत्रिका लांसेट के एक अध्ययन के अनुसार प्रतिदिन हमारे यहां वायु प्रदूषण के कारण दो लोग मारे जाते हैं। क्योंकि वैश्विक तौर पर समय पूर्व जन्म के लगभग 40 लाख मामलों को पीएम 2.5 के प्रभाव से जोड़ा जा सकता है और इन मामलों में सबसे बुरी तरह दक्षिण एशिया प्रभावित होता है जहां लगभग 20 लाख से अधिक जन्म समय पूर्व होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि जैसे-जैसे हवा की गुणवत्ता बिगड़ती जाती है अधिक से अधिक लोगों को हृदयरोग, पक्षाघात, फेफड़े के रोग के साथ पुरानी और तीव्र श्वसन बीमारियों का जोखिम बढ़ता जाता है। वायु प्रदूषण के संबंध में विश्व के चुनिंदा 11 देश जिनमें भारत भी शामिल है का वर्ष 2015 से लेकर 2018 तक एक विस्तृत अध्ययन किया गया जिसमें वहां के नागरिकों को वायु प्रदूषण से होने वाले कष्ट से अनभिज्ञ पाया गया, यहां तक कि सार्वजनिक चर्चाओं में वायु प्रदूषण चर्चा में कहीं नहीं सुनाई दी। लोग सार्वजनिक जीवन में वाहन और उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन से तो अधिक चिंतित है पर इस कारण वायु में निरंतर बढ़ने वाला प्रदूषण उनकी चिंता नहीं है। गेंहू इत्यादि की फसल के बाद जब किसानों द्वारा पराली जलाई जाती है तब हमारा मीडिया राजनीति की चर्चाओं से थोड़ा समय निकाल कर वायु प्रदूषण पर कुछ हलचल मचाने की जवाबदेही तो निभाता है पर इस पर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा करना न अपनी जिम्मेदारी समझता और न आमजन को जागरूक बनाना अपनी प्राथमिकता।

वैश्विक स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन “हेजी पर्सेप्शंस“ में सिफारिश की गई है कि लोगों द्वारा सरकार से अच्छी गणवत्ता की वायु की मांग की जाना जरूरी है। आमजन की इस मांग पर सरकार का इसमें प्राथमिकता से शामिल होकर काम करना वायु की गुणवत्ता को उत्कृष्ट बना सकता है और लोग अच्छे स्वस्थ्य की और सहज ही प्रेरित किए जा सकते हैं। हेजी पर्सेस्शंस की सिफारिशें तीन वर्षों 2015 से 2018 तक के लिए जिन देशों के लिए की गईं उनमें भारत, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाइलैंड, पापुआ न्यू गिनी, मंगोलिया इत्यादि देशों के समाचारों और सोशल मीडिया के आधा अरब से अधिक दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित हैं। वायु प्रदूषण से होने वाली चिंताऐं अब कंपनियों के कर्मियों को सताने लगी हैं और प्रमुख शहरों में कार्यरत विशेषज्ञ अब वहां दीर्घकाल तक रहने से डरने लगे हैं। जाहिर है कंपनियों को अपने दक्ष कर्मियों की सेवा की निरंतरता बनाए रखने के लिए नए-नए आॅफर देने पड़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कार्यरत लगभग 92 प्रतिशत लोग वायु प्रदूषण के घटते-बढ़ते स्तर पर नजर बनाए रखते हैं क्योंकि वे इसे अपने स्वास्थ्य के लिए एक धीमा जहर मानते हैं। कहीं-कहीं वायु प्रदूषित देशों में मौसमी धंुध हो जाने के चलते कर्मियों को या तो छुट्टी देनी पड़ती है या अन्य हल्के-फुल्के काम में लगाना पड़ता है और कभी-कभी इनके मूल वेतन में 10 से लेकर 30 प्रतिशत से अधिक तक विशेष भत्ता के रूप में दिया जाना प्रचलन में है। एक वैश्विक कंपनी ने स्वीकार किया था कि वर्ष 2014 में उसने चीन में काम करने वाले अपने कर्मचारियों को प्रदूषण भत्ता दिया जो अब तक जारी है। इसी प्रकार पेय पदार्थ बनाने वाली कोका कोला भी वायु गुणवत्ता सुधार के लिए 15 प्रतिशत अतिरिक्त भत्ता अपने कर्मियों को दे रही है। हमारे देश की राजधानी दिल्ली में भी इसी प्रदूषित धंुध के चलते काफी कदम उठाने पड़ रहे हैं। राजनीतिक उदासीनता के चलते दुनिया के सबसे प्रदूषित 15 शहरों की सूची में से 11 स्थानों पर भारत के शहरों के नाम हैं। जहां आज नहीं तो कल ऐसे भयावह हालात बन सकते है जाहिर है इन हालात में हमारे कर्मियों की कार्यक्षमता में कमी से भी इनकार नहीं किया जा सकेगा और स्वास्थ्य के स्तर पर जो हानि होगी से अलग।

हम अभी आमचुनाव से निवृत होकर बैठे हैं, लगभग साढ़े चार से पांच करोड़ युवाओं ने इसमें मतदान किया है उन्हें ही इस कल के आधुनिक भारत में अपनी सेवाऐं देनी हैं जहां हर कक्ष में एसी उनकी प्रतीक्षा कर रहा है क्योंकि इसके बिना निरंतर बढ़ता तापमान उन्हें वहां काम नहीं करने देगा। युवाओं ने ऐसी ही सरकार को चुना होगा जो चर्चाओं, वार्ताओं, योजनाओं, नीतियों और कार्यक्रमों की खोखली ढर्राशाही से बाहर निकलकर साफ हवा और पानी की सर्व सुलभता का अपना सपना साकार करेगी। इसके बिना विश्व की एक बड़ी आबादी कैसे जी सकेगी आप सोच सकते है।

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