किस राह पर उत्तर प्रदेश?

6:21 pm or June 23, 2014
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सिध्दार्थ शंकर गौतम-

हाल ही में मुलायम सिंह यादव का एक बयान खासा चर्चित हुआ था जिसमें उन्होंने बलात्कारियों को फांसी देने का विरोध करते हुए कहा था कि बच्चों से गलती हो जाती है। यह अलग बात है कि बच्चों की गलती से कई जिंदगियां तबाह हो जाती हैं जिन्हें मुलायम की पारखी नजर नहीं देख पाती या यों कहें कि देखना नहीं चाहती पर मुलायम के उन्हीं कथित बच्चों की गलती अब उनके खुद के बेटे अखिलेश यादव पर भारी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश में बीते एक पखवाड़े से बलात्कार के जितने भी मामले सामने आए हैं उन्हें बच्चों की मामूली गलती मानना गलत होगा। अभी बदाऊं में दो बहनों की बलात्कार के बाद हत्या का मामला सुलझा भी नहीं था कि अमेठी, बागपत, मुरादाबाद जैसे कई छोटे-बड़े शहरों से इसी तरह के मामले आना शुरू हो गए। सरकारी आकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में हर एक दिन में चार महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ होता है लेकिन वास्तविक आंकड़े इससे इतर कहानी कहते हैं। कई मामले तो पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते और जो पहुंचते हैं वे लेन-देन या सामाजिक वर्जनाओं के कारण अधार में ही खत्म हो जाते हैं किन्तु हाल के दिनों में जिस अमानवीयता से बालिकाओं के साथ बलात्कार और पेड़ से लटकाकर उन्हें मारने के मामले उजागर हुए हैं। उनसे उत्तर प्रदेश वीभस्त प्रदेश में तब्दील नजर आ रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि राज्य के मंत्रियों की नजरों में ये घटनाएं मामूली हैं तो राज्य के डीजीपी एएल बनर्जी मीडिया में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को रूटीन कहकर उसे हमलावर होने का मौका दे रहे हैं। इन मामलों को लेकर राजनीति अपने चरम है और अस्मत लुटा चुकी महिलाएं अपने नसीब को कोस रही हैं। फिर दुष्कर्म ही क्यों प्रदेश में लगातार अपराध के आकड़ों में इजाफा ही हुआ है। सरकार तथा अन्य दलों के नेता मंत्री भी अपराधियों को संरक्षण देते रहे हैं। जिससे पुलिस भी दबाव में है। एक हफ्ते में तीन भाजपा नेताओं की हत्या इस बात का सुबूत है कि प्रदेश में सपा राज की जगह जंगल का कानून चल रहा है। जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे में इन दिनों अराजकता का सा माहौल है और यदि इसकी वजह से अखिलेश यादव की मीडिया में खिंचाई हो रही है तो कोई गलत नहीं हो रही। मायावती के शासनकाल की जिन बुराइयों को उजागर कर सपा जनता के समक्ष गई थी और जनता ने उसपर जो भरोसा जताया था, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी अखिलेश की थी किन्तु वे इसमें नाकाम रहे हैं। एक समय आतंक और अराजकता का प्रतीक बन चुका बिहार आज नीतीश राज में प्रगति-पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है इसके उलट उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था चरमराई हुई है, महिलाएं घरों से निकलने में अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही हैं, सरकार के विधायक तथा मंत्री जनता के लिए काल बनते जा रहे हैं। उस पर भी सरकार के मुखिया का तुर्रा कि सब विपक्षी पार्टियों की चाल है दरअसल सरकार की नाकामी की दास्तां बयां करता है। नि:संदेह प्रदेश की कानून व्यवस्था के संवेदनशील मसले पर अखिलेश सरकार बुरी तरह फेल हुई है चंहु ओर अपराधी बखौफ हो अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। राजनीति तथा चुनाव दोनों अपनी जगह हैं मगर लोगों की सुरक्षा से तो समझौता नहीं किया जा सकता पर आम आदमी की चिंता किसे है? सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। कोई बयानबाजी कर रहा है तो कोई पीड़ित पक्ष के सामने घडियाली आंसू बहा रहा है पर कोई भी प्रदेश की दुर्दशा तथा लचर कानून व्यवस्था से पार पाने की राह नहीं सुझा रहा।

अखिलेश यादव भले ही मुलायम सिंह के पुत्र होने की वजह से सूबे के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बन गए हों किन्तु अब तक प्रशासनिक व शासकीय स्तर पर उनकी वह पकड़ लक्षित नहीं हुई है। जिसका ढोल समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता पीटे नहीं अघाते थे। बसपा के 5 वर्षों के कुशासन से त्रस्त जनता ने सपा को सरकार बनाने का मौका दिया था। उसमें भी मायावती का स्वयं को जीवित देवी की तरह पेश करने हेतु स्वयं की मूर्तियां लगवाने के निर्णय ने जनता-जनार्दन का बसपा सरकार से मोह भंग करा दिया था। प्रदेश की जनता हालांकि पूरवर्ती सपा सरकार में हुए अत्याचारों व गुंडागर्दी को भूली नहीं थी मगर बसपा के मुकाबले उन्हें सपा ही बेहतर विकल्प नजर आई। यह भी अघोषित रूप से तय था कि इस बार यदि सपा सरकार आती है तो सूबे को युवा मुख्यमंत्री की सौगात मिल सकती है और भी कई कारण थे। सपा की सूबे में वापसी के परन्तु अखिलेश के चेहरे को ही सरकार की वापसी का मुख्य मार्ग बताकर प्रचारित किया गया। इन परिस्थितियों में अखिलेश के युवा कांधों पर जिम्मेदारियों का बोझ पड़ता तय था लेकिन यह समझा जाता था कि राजनीति के घाघ खिलाड़ी मुलायम के अनुभव का अखिलेश को लाभ मिलेगा। मगर हुआ इसका उल्टा ही मुलायम को दिल्ली रास आई और अखिलेश पर आजम खान व रामगोपाल यादव हावी हो गए चूंकि बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश का नाम ही हर सफलता-विफलता के लिए जिम्मेदार होता, अत: मंत्रियों से लेकर सपा के वर्तमान कर्णधारों तक की कथित सफलता व सही मायनों में विफलता का ठीकरा अखिलेश के ही सिर फूटा। अखिलेश लाख सफाई देते फिरें कि स्थितियां सामान्य होने में अभी वक्त लगेगा किन्तु वे यह तो तय करें कि इन स्थितयों को ठीक कौन करेगा? क्या आजम खान, रामगोपाल यादव तथा मुलायम सिंह की तिगडी अखिलेश को अपनी छाया से मुक्ति देगी ताकि वे अपनी ऊर्जा का सही मायनों में दोहन कर सूबे के विकास के प्रति गंभीर हों? यदि सूबे का यही हाल रहा तो जनता-जनार्दन का जीवन नरक सामान हो जाएगा वैसे प्रदेश की जनता में अब सरकार तथा कानून व्यवस्था के प्रति गुस्सा पनप रहा है जो किसी भी दिन विस्फोटक रूप धारण कर सकता है विधानसभा चुनाव में अभी समय है और यदि अपराधों का बढ़ना चुनावी टसल का परिणाम है तो आने वाले दिनों में प्रदेश की कानून व्यवस्था को बड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगाद्य अखिलेश को चाहिए कि वे राजनीति करने तथा स्वयं के दोष दूसरों पर मढ़ने के बजाय प्रदेश पर ध्यान दें वर्ना जनता अब जाग रही है और कहीं ऐसा न हो कि उनकी सत्ता को चिरनिद्रा में जाना पड़े? लोकसभा चुनाव में तो समाजवाद का ढोल फट ही चुका है, कहीं विधानसभा चुनाव तक आते-आते मुलायम का समाजवाद कूड़े के ढेर में न खो जाए?

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