प्रशिक्षण का ही हिस्सा है महिलाओं का उत्पीड़न

6:25 pm or June 23, 2014
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रीना मिश्रा-

हिलाओं को लेकर देश की पुलिस मशीनरी का नजरिया, उसकी मानसिकता तथा उत्पीड़क चरित्र की वजहों पर बात करने से पहले मै कुछ वाकयों का जिक्र चाहूंगी। दो साल पहले की बात है। मुंबई पुलिस में सिपाही के पद पर भर्ती लड़कियां पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले रही थीं। उसी वक्त उनमें से कई लड़कियों के गर्भवती होने की खबरें अचानक मीडिया मे आईं। जिन लड़कियों में गर्भावस्था की पुश्टि हुई थी उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान कभी छुट्टी भी नहीं ली थी। काफी हो हल्ला होने के बाद,जब समूचे प्रकरण की गहराई से जांच कराई गई तो पता चला कि प्रशिक्षण देने वाले पुलिस के जवान ही लड़कियों को खराब परफॉर्मेंस की रिपोर्ट भेज प्रशिक्षण से बाहर करवा देने की धमकी देने के नाम पर शुरू से ही उनका सामूहिक यौन शोषण कर रहे थे।

यही नहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस में काम करने वाली एक महिला सिपाही की बात सुनने के बाद प्रदेश में महिलाओं की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण इलाकों के पुलिस थानों में हर दिन दो महिला सिपाही जिला मुख्यालय से डयूटी के लिए भेजी जाती हैं। ये सिपाही दिन भर थाने पर डयूटी करने के बाद, शाम को जिला मुख्यालय वापस लौट जाती हैं। रात को थाने में महिला सिपाही नहीं रहती। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक महिला सिपाही ने मुझे बताया कि थाने में दिन भर सहकर्मी पुरुष सिपाही उन्हे ऐसे घूरते रहते हैं जैसे वह कपड़े के ऊपर से ही सारा शरीर नाप रहे हों। वो बताती हैं कि कई बार तो बड़ी असहज स्थिति पैदा हो जाती है और मन में नौकरी छोड़ देने की इच्छा होती है। यही नहीं, कुछ सिपाही तो खाली वक्त थाने में ही मोबाईल पर अश्लील फिल्में देखते हैं। अब चूंकि नौकरी करना है इसलिए हम इन सबको नौकरी का हिस्सा मानने लगी हैं। वो बताती हैं कि जब थाने के अंदर हम ही सुरक्षित नहीं हैं, उत्पीड़न की शिकार हैं तो आम औरत थाने में सुरक्षित कैसे रह सकती है?

वैसे भी इन दिनों उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मैराथन मामले सामने आ रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही पुलिसवालों पर एक महिला से थाने में ही बलात्कार का आरोप लगा है। यूपी के हमीरपुर जिले के भरुवा सुमेरपुर थाने के अंदर सब इंस्पेक्टर समेत चार पुलिसवालों पर एक महिला ने सामूहिक बलात्कार करने का आरोप लगा दिया। रेप पीड़िता का आरोप है कि जब वह हिरासत में लिए गए अपने पति से मिलने थाने पहुंची थी, तो पुलिसवालों ने उसे बंधक बना लिया और उसके साथ गैंगरेप किया। भले ही इस मामले में तुरंत एसएसपी ने जांच के साथ ही एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए, लेकिन उपरोक्त हालात बताते हैं कि कि महिलाओं के आत्मसम्मान और गरिमा के सवाल पर उत्तर प्रदेश पुलिस ही बदनाम नहीं है बल्कि कमोवेश देश की समूची पुलिस व्यवस्था का चरित्र ही घोर महिला विरोधी और उत्पीड़क का है।

बहरहाल, सवाल यह है कि महिलाओं के साथ आखिर इस तरह की घटनाएं क्यों घट रही हैं? आखिर असल खामी कहां है कि लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही है। क्या सिर्फ एक कठोर कानून बना देने भर से ही समस्या का समाधान हो जाएगा? पुलिस का महिलाओं के उत्पीड़न के पीछे का माइंडसेट क्या है?

दरअसल आज पुलिस का औरतों के प्रति जो नजरिया है वह लंबे समय से चले आ रहे पुरुष प्रधान सामाजिक ताने-बाने की देन होने के साथ ही साथ उनके अमानवीय और जानवर बनाने वाले प्रशिक्षण से भी काफी हद तक जुड़ा हुआ है। चूंकि पुलिस का जवान भी पुरुष प्रधान समाज वाले सामाजिक ताने-बाने से निकला व्यक्ति होता है लिहाजा उसकी मानसिकता में पुरुषों के श्रेष्ठ होने की बात भरी रहती है। भारतीय समाज की औरत और मर्द के बीच रिश्तों की अन्यायपूर्ण संरचना, जहां औरत को दोयम दर्जे का नागरिक जन्म के समय से ही मान लिया जाता है, इस उत्पीड़न के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। वह सामाजिक ताना-बाना जहां औरत एक मनुष्य नही वस्तु हो, जहां उसका भी एक बाजार भाव हो, समाज में सम्मान कैसे पा सकती है? उपभोक्तावादी समाज हर वस्तु को संपत्ति समझता है। औरत को लेकर उसकी यही मानसिकता है। जब तक समाज में वैचारिक पिछड़ापन है, विचारों में उपभोक्तावाद हाबी है, औरत को समाज में उसका सही स्थान कदापि नही मिल सकता।

जहां तक पुलिस का महिलाओं के प्रति नजरिए का सवाल है वह बेहद ही उत्पीड़क किस्म का है। दरअसल पुलिसवालों को जो प्रशिक्षण दिया जाता है वह उन्हे मानव न बनाकर एक जानवर बनाता है। प्रशिक्षण के दौरान हर बात पर मां-बहन की गाली, बात बात पर जलील करना, एक ऐसा जानवर तैयार करता है जो सिर्फ हिंसा और उत्पीड़न की भाषा ही समझता और समझाता है। पूरी प्रशिक्षण प्रणाली ही एक जवान को राज्य के हिंसक चरित्र की प्रतिकृति के बतौर तैयार करती है। ऐसा प्रशिक्षण जहां सिर्फ खूखांर जानवर बनाया जाता हो, उनसे सभ्य और संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। हिंसा राज्य के मूल में होती है और पुलिस राज्य का जीवतं चेहरा है। लिहाजा पुलिस का समूचा चरित्र ही हिंसक होता है। वह हिंसा किसी भी तरह कीहो सकती है। पुलिस का असल चरित्र किसी विद्रोह को दबाने या फिर किसी राज्य के किसी बड़े ऑपरेशन में महिलाओं के खिलाफ सामूहिक हिंसा के रूप में सामने आता है। छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ चलाए गए आपरेशन में पुलिस वालों ने आदिवासी लड़कियों से सामूहिक बलात्कार किए हैं। कुल मिलाकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा पुलिस के प्रशिक्षण का हिस्सा होने के कारण उनके चरित्र मे घर कर जाती है।

सवाल यह है कि क्या ऐसी घटनाओं को कानून बना कर रोका जा सकता है? शायद बिल्कुल नहीं। जो लोग कठोर कानून में ही इस समस्या का हल देखते हैं वे अपराध की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक वजहों पर धयान नहीं देते। अपराध केवल कानून बना देने भर से नहीं रुक सकते। आज देश की महिलाओं के खिलाफ जिस तेजी से अपराध बढ़े है उस पर संजीदा होकर सोचने की जरूरत है। सवाल चाहे थाने का हो या फिर घर का, औरत कहीं भी महफूज नही है। दरअसल समस्या की असल वजह ‘मैस्कुलैनिटी’ मानसिकता और औरत को एक वस्तु मान लेने के चारों ओर घूमती है। जब तक औरत को सेक्स और बच्चा पैदा करने की मशीन समझा जाएगा, समस्या सुलझने वाली नही है। चाहे पुलिस हो या फिर आम आदमी औरतों के खिलाफ अपराध में सब शामिल हैं। जरूरत एक ठोस बदलाव की है। क्या हमारी राजनीति इस बदलाव का वाहक बनने के प्रति बचनबध्द है?

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