उत्तरपूर्व को कैसे संभालेंगे नरेन्द्र मोदी ?

6:39 pm or June 23, 2014
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एल.एस.हरदेनिया-

त्तरपूर्व भारत की समस्याएं कितनी गंभीर हैं वह इस बात से महसूस होता है कि उस क्षेत्र के मामलों की देखरेख के लिये केन्द्र में एक पृथक मंत्रालय का गठन किया गया है। उत्तरपूर्व भारत में स्थित सभी राज्यों में कानून व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण से बाहर रहती है। त्रिपुरा ही शायद ऐसा राज्य है जहां तुलनात्मक शांति है। उत्तरपूर्व में शांति कायम करना मोदी सरकार के लिये सबसे गंभीर चुनौती है। वहां की समस्याओं के प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस चश्में से देखता है, यदि नरेन्द्र मोदी भी वैसा ही नजरिया अपनाते हैं तो समस्याओं को सुलझाना काफी कठिन होगा। संघ के विश्लेषण के अनुसार वहां की समस्याओं के लिये मुसलमान और ईसाई जिम्मेदार हैं। संघ के अनुसार वहां की समस्याओं की जड़ में ईसाई मिशनरियों द्वारा किया जाने वाला धर्मपरिवर्तन और बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। यदि धर्मपरिवर्तन पर रोक लगा दी जाए तथा बांग्लादेशियों को भगा दिया जाए तो वहां शांति हो जायेगी।

उत्तरपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ संजय हजारिका ने दैनिक दि हिन्दू में प्रकाशित अपने एक लेख में उत्तरपूर्व की समस्याओं का काफी बारीकी से विश्लेषण किया है। असम, मणीपुर और मेघालय में आये दिन होने वाली हत्यायों को रोकना मोदी सरकार के सामने सबसे गंभीर चुनौती है। यहां इस बात का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि असम से अभी हाल में चुने गये भाजपा सांसदों ने ऐसे बयान दिये हैं जिनसे स्थिति और गंभीर हो सकती है। इन सांसदों ने मांग की है कि असम को शीघ्र ही ”बांग्लादेशियों से मुक्त कराया जाये”। भाजपा के इस बयान का एक अर्थ यह भी लगाया जाता है कि वह मुख्य रूप से मुसलमानों के बारे में है। जब ”असम को बांग्लादेशियों से मुक्त कराने की बात की जाती है तो वास्तव में उनका अर्थ होता है मुसलमानों से असम को मुक्त कराया जाए।” पिछले कुछ वर्षों से संघ असम में मुसलमान विरोधी वातावरण बनाने में लगा हुआ है। जहां तक असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का सवाल है अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि कौन हैं बांग्लादेशी घुसपैठिये? असम में वर्षों से बांग्लाभाषी मुसलमान रह रहे हैं। असम में अनेक ऐसे मुस्लिम परिवार भी हैं जिन्हें अंग्रेजों ने यहां बसाया था। ये मुस्लिम बंगाल से इसलिये हटाये गये थे क्योंकि वहा घनी आबादी होने के कारण कृषि योग्य भूमि की काफी कमी थी। ठीक इसके विपरीत असम में ऐसी अतिरिक्त कृषिभूमि थी जिस पर कोई भी खेती नहीं कर रहा था। अनेक वर्ष बीत जाने के बाद भी लोग अभी भी अपने घरों में और आपस में भी बांग्लाभाषा में बात करते हैं। संघ के चिन्तन वाले लोग इन्हें भी बांग्लादेशी घुसपैठिये मानते हैं। पाकिस्तान के बनने के बाद भारी संख्या में हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान से असम आए थे। पाकिस्तान के इतिहास में एक समय ऐसा आया जब पूर्वी पाकिस्तान के सर्वमान्य नेता शेख मुजिबुर्रहमान की पार्टी को चुनाव में बहुमत मिल गया। इसके बावजूद उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। इससे पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर आक्रोश फैल गया। आक्रोश को दबाने के लिए पाकिस्तान के शासकों ने पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर तरह-तरह की ज्यादतियां कीं। यहां तक कि पाकिस्तान के फौजियों ने पूर्वी पाकिस्तान की मुसलमान महिलाओं के साथ बलात्कार समेत अन्य अपराध किए। बात इतनी बढ़ी की पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान से अलग हो गया। इस घटना के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारतीय संसद में घोषणा की थी कि ढाका एक नये देश की राजधानी बन गया है। पाकिस्तान की फौजों द्वारा किए गए जुल्म ज्यादतियों से बचने के लिए भारी संख्या में मुसलमानों ने भारत में शरण ली और हमने उन्हें शरण दी। इनमें से कुछ ऐसे बांग्लादेशी अवश्य हैं जो भारत में अभी भी रह रहे हैं। ज्यादतियों से पीड़ित नागरिकों को शरण देना एक आधुनिक परंपरा है। दु:ख की बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी, जो हिन्दू जुल्म ज्यादतियों से पीड़ित होकर भारत आए थे उन्हें शरणार्थी कहती है। परंतु पाकिस्तान की ज्यादतियों से परेशान होकर जो मुसलमान भारत आए उन्हें भारतीय जनता पार्टी समेत संघ परिवार घुसपैठिये कहते हैं। बांग्लादेशी समस्या आज भी काफी गंभीर है। उसका हल नहीं निकल पा रहा है। 1998 से 2004 तक केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार रही परंतु वह एक भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत से निष्कासित नहीं करा पाई। उसी तरह असम गणपरिषद जो बांग्लादेशियों को भगाओ नारे के आधार पर असम में सत्ता में आई थी वह भी अपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी बांग्लादेशी को भारत से नहीं भगा सकी। बात स्पष्ट है कि इस समस्या का निदान कठिन काम है। असम में 23 न्यायाधिकरण बने हुए हैं जिन्हें यह काम सौंपा गया है कि वे बांग्लादेशियों की पहचान करें। परंतु वे भी इस मामले में रंचमात्र प्रगति नहीं कर सके हैं।

असम के अतिरिक्त उत्तरपूर्व के दूसरे राज्यों में भी समस्याएं गंभीर हैं। मेघालय के मुख्यमंत्री के क्षेत्र में अभी हाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति काफी गंभीर हो गई थी। परंतु उस पर नियंत्रण पाने में पुलिस पूरी तरह असफल रही। संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक ने कहा कि रात को पुलिस प्रभावित गांवों में प्रवेश करने का साहस नहीं बटोर पा रही है क्योंकि उन्हें यह धमकी दी गई है कि यदि पुलिस आयेगी तो उसके ऊपर हमला किया जायेगा। असम में और उत्तरपूर्व भारत के अन्य राज्यों में अकेले हिन्दू मुसलमानों की समस्या नहीं है। वहां पर विभिन्न समूह हैं जिन्हें नस्लवादी भी कहा जा सकता है जो आए दिन पुलिस और सरकार को चुनौती देते रहते हैं। इस तरह के संगठनों को हथियार भी मिल रहे हैं। वोडो जिनका असम में गैर-वोडो समूहों और नागरिकों के साथ आएदिन खूनी संघर्ष होता रहता है उनके पास हथियारों का जखीरा है। उन्हें हथियार कहां से मिलते हैं यह अभी भी रहस्य बना हुआ है। अभी हाल में सशस्त्र वोडो ने मुसलमानों पर हमले किए। वे इसलिए नाराज थे क्योंकि उस क्षेत्र के मुसलमानों ने उनके उम्मीदवार को वोट नहीं दिया था।

नागाओं के आंदोलनों से सभी परिचित हैं। 1950 के दशक में नागाओं का विद्रोही आंदोलन मिजोहिल्स, मणिपुर, असम, त्रिपुरा और मेघालय में फैल गया। बाद में समझौते के अनुसार नागालैण्ड में नागाओं की एक सरकार भी बनी। नागा विद्रोहियों ने उसके विरूध्द भी विद्रोह किया। नार्थईस्ट में एक नहीं अनेक विद्रोही आंदोलन चलते रहते हैं। जहां पारस्परिक हिंसा से वहां के लोग पीड़ित हैं वहीं सेना द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों की शिकायतें भी मिलती रहती हैं। उत्तरपूर्वी राज्यों के अनेक निवासियों की यह मांग है कि उनके क्षेत्रों से सेना को हटाया जाए। एक महिला तो मणिपुर से सेना को हटाने की मांग को लेकर कई वर्षों से अनशन पर है। कुल मिलाकर उत्तरपूर्व की समस्याएं काफी जटिल हैं।

मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान यह धमकी दी थी कि जो भी बांग्लादेशी असम में रह रहे हैं वे वापस जाने के लिए अपना सामान बांध लें। उन्होंने यह भी कहा था कि वे बांग्लादेशी असम में रह सकते हैं जो दुर्गा माता की पूजा करें। यह जगजाहिर है कि दुर्गा माता की पूजा कौन करता है? यदि मोदी द्वारा दी गई इस धमकी पर अमल किया जाता है तो सारे उत्तरपूर्व में शांति को काफी धक्का पहुंचेगा और एक ऐसी गंभीर समस्या उत्पन्न हो जायेगी जिसका मुकाबला करना अत्यधिक कठिन काम होगा।

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