आखिर किसके इशारे पर खेल रहे मोदी

7:01 pm or June 23, 2014
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हरे राम मिश्र-

देश में लगभग दो दशक से गंभीर संकटों का सामना कर रही खेती और बर्बादी के मुहाने पर खड़े किसानों की चिंता उस वक्त और बढ़ गई जब अलनीनो के प्रभाव से पड़ने वाले संभावित सूखे की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनने लगीं। भयानक वैश्विक आर्थिक मंदी के इस दौर में, जब देश की अर्थव्यस्था बेतहाशा मंहगाई और जबरजस्त ऋणात्मक विकास के साथ भयंकर बेरोजगारी की समस्या से जूझ रही हो, सूखे की संभावना से ही आर्थिक क्षेत्र में खलबली मचनी तय थी। इन खबरों के बाद आनन-फानन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कैबिनेट की मीटिंग भले ही बुलाई लेकिन, संभावित संकट के समाधान की जो तस्वीर अब उभर कर सामने आयी है उससे साफ हो गया है कि समस्या के प्रभावी हल के लिए मोदी सरकार कोई बड़ा कदम उठाने नहीं जा रही है। इसके लिए चाहे वैश्विक आर्थिक ढांचे की मजबूरियों को जिम्मेदार माना जाए या फिर देश की खस्ताहाल अर्थव्यस्था को, मौजूदा हालात में देश के किसानों को किसी किस्म की कोई राहत मिलने की संभावना दूर-दूर तक नजर नही आ रही है।

गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के वक्त मतदाताओं के बीच में जिन अच्छे दिनों का वादा किया था शायद मौजूदा आर्थिक हालात में उसका एक प्रतिशत भी पूरा होने की संभावना नहीं दिख रही है। यही वजह है कि मोदी ने हाल ही में गोवा में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए साफ कर दिया कि देश हित में कठोर फैसले लेने होंगे। गोवा में उनके संबोधन का कुल सार यह था कि देश के मतदाताओं को अभी किसी किस्म की राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और देश की आर्थिक हालत सुधारने में अभी लंबा वक्त लगेगा। मोदी सरकार का मानना है कि फिलहाल अर्थव्यस्था जिन हालातों से गुजर रही है उसमें दो साल तक आम जनता के लिए किसी राहत के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

कठोर फैसले लेने का नरेन्द्र मोदी का यह वक्तव्य उस वक्त सामने आया है जब अगले महीने बजट पेश होने वाला है और उनके सामने एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था, जो मंदी के महासमुद्र में गोते लगा रही है, को पटरी पर लाने की एक बड़ी जिम्मेदारी है। समस्या तब और बढ़ जाती है जब पिछले एक दशक से देश की विकास दर बेहद नीची रही हो और इसमें सुधार की कोई संभावना भी न दिख रही हो। हलांकि यह सवाल एक अलग बहस का बिंदु है कि क्या देश की बहुसंख्यक आबादी जो पहले से ही मंहगाई, बेरोजगारी, घोटाले और कर्ज के अंधेरे में सिसक रही हो, को और कठोर फैसले लेकर ज्यादा मुश्किल में डाले बिना अर्थव्यस्था को पटरी पर नहीं लाया जा सकता?

बहरहाल, अगर आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो इस समय सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता बजट घाटे पर प्रभावी अंकुश लगाना है। सरकार की कोशिश है कि सन् 2015 तक बजट घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के चार प्रतिशत के आस पास लाया जाए। जाहिर है, ऐसी स्थिति में सरकार दी जा रही सब्सिडियों में कटौती करेगी जिसका प्रभाव खेती और किसानों के भविष्य पर निश्चित रूप से पड़ेगा। पहले से ही घाटे में चल रही खेती सब्सिडी कटौती से और मंहगी हो जाएगी। जाहिर है इन फैसलों से किसान तबाह हो जाएंगे और देश का खाद्य सुरक्षा चक्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में चला जाएगा जो देश में मंहगे अनाज और भीषण भुखमरी की स्थिति पैदा कर देगीं।

अगर नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा संभावित सूखे से निपटने की तैयारियों की बात करें तो ऐसा लगता है कि सरकार के पास इस आपदा से निपटने के लिए किसी ठोस विजन का अभाव है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय करीब तीन लाख करोड़ की सब्सिडी तेल, खाद्य और खाद को मिल रही है। सरकार अर्थव्यस्था की सेहत को सुधारने के नाम पर इस सब्सिडी में लगभग बीस प्रतिशत की कटौती कर सकती है। यही नहीं, डीजल के दामों को जिस तरह से बाजार आधारित बनाने की दिशा में सरकार लगातार आगे बढ़ रही है उससे भी यह साफ है कि आने वाले दिनों में खाद, पानी और अन्य कृषि उपकरणों का मंहगा होना तय है। सब्सिडी में कटौती और मंहगे डीजल से खेती पच्चीस फीसदी तक महंगी हो जाएगी, जो पहले से ही कर्जदार किसानों की कमर तोड़ देगी। ऐसी स्थिति में सूखे की मार से परेशान किसान अर्थव्यस्था के हाशिए पर और तेजी से जा खडे होंगे। यह स्थिति अर्थव्यस्था को तो नुकसान पहुंचाएगी ही, देश की कृषि व्यवस्था की रीढ़ तोड़ देगी। बेहतर होता कि सरकार इस संकट के समय में किसानों को ज्यादा सब्सिडी देकर किसी भी तरह उनके जिंदा रहने की गारंटी करती। आखिर देश के पूंजीपतियों को दी जा रही बेतहाशा सब्सिडी में कटौती का साहस नरेन्द्र मोदी सरकार क्यों नहीं कर पा रही है। आखिर उसकी क्या मजबूरियां हैं जो वह बहुसंख्यक जनता के खिलाफ ही कठोर फैसले ले रही हैं। क्या सब्सिडी पर केवल पूंजीपतियों का ही हक है? उन्हें बेताशा सब्सिडी क्यों? पूंजीपतियों की सब्सिडी को खत्म क्यों नही किया जा रहा है?

             एक बात और, अगर मानसून कमजोर रहा तो मध्यवर्ग को सस्ते कर्ज की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। भले ही सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटता जा रहा हो, लेकिन अर्थव्यस्था अभी खेती को शून्य मानकर आगे बढ़ने का माद्दा नहीं रखती। कुल मिलाकर कमजोर मानसून मंदी के संकट को और बढ़ाएगा। लेकिन अहम सवाल यह है कि मौजूदा कृशि संकट और किसानों की दुर्दशा दूर करने के लिए मोदी सरकार के पास क्या कोई विजन है? क्या खेती को लाभदायक बनाने के लिए मोदी सरकार के पास कोई दीर्घकालीन रणनीति है? आखिर वे कौन से लोग हैं जो चाहते हैं कि इस मुल्क के किसान और यहां की खेती तबाह हो जाए? आखिर मोदी कॉर्पोरेट का हित चिंतन ही क्यों कर रहे हैं? खेती की बर्बादी पर उनकी चुप्पी क्यों हैं?

            कुल मिलाकर, यह सवाल बेहद मौंजू है कि आखिर देश को सबसे ज्यादा रोजगार देने की क्षमता रखने वाली खेती उपेक्षित क्यों है। आखिर देश के दो तिहाई किसान खेती क्यों छोड़ना चाहते हैं? किसानों को कर्ज के मकड़जाल से निकाला कैसे जाए। खेती को रोजगारपरक कैसे बनाया जाए? आखिर वैश्वीकरण की सबसे ज्यादा मार खेती पर ही क्यों पड़ी और राजनैतिक नेतृव ने इस समस्या से निपटने की प्रतिबध्दता क्यों नही दिखाई। आखिर क्या वजह है कि किसी भी दल के पास दम तोड़ रही खेती और आत्महत्या करते किसानों के लिए कोई विजन नहीं है। आखिर अलनीनो के तांडव से बेखबर नरेन्द्र मोदी किसानों को दी जा रही सब्सिडी पर कैंची चलाने के लिए उतावले क्यों हैं। आखिर मोदी किसके इशारे पर खेल रहे हैं और उनकी मंशा क्या है?

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