1 अक्तूबर : अन्तराष्ट्रीय वृद्ध दिवस: एक अहम मुद्दा बुजुर्गों के संरक्षण का

5:52 pm or September 29, 2014
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– डॉ. गीता गुप्त –

वृद्धावस्था सभी देहधारियों की स्वाभाविक नियति है। जन्म के बाद क्रमशः बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और फिर वृद्धावस्था के सोपान पर पहुंचकर मृत्यु को प्राप्त होना अवश्यम्भावी है। इसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन वृद्धावस्था मनुष्य के लिए कष्टप्रद एवं अभिशाप न बने, इसके लिए युवावस्था से ही शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजगता अनिवार्य है। चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों के मतानुसार, हृदय, फेफड़े और अस्थियों में इस प्रकार की क्षमता है कि वे पांच सौ वर्ष तक सहज रूप में क्रियाशील रह सकती है, बशर्ते मनुष्य संयमित जीवन जिये। उसका आहार-विहार, जीवन-शैली, प्राकृतिक नियमों के अनुरूप हो, आचरण संयमित और मानसिक सन्तुलन सही हो तो शरीर की रासायनिक प्रणाली ठीक रहती है और सारे अंग भलीभांति कार्य करते रह सकते हैं। यदि वृद्धावस्था में भी मनुष्य पूर्णतः स्वस्थ हो, उसका शरीर एवं मन दोनों सक्रिय हों तो जीवन वरदान हो सकता है।

वस्तुतः वृद्धावस्था का मनुष्य की मनोदशा से गहरा संबंध है। जीवन के उत्तराद्र्ध में व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका होता है। परिवार की स्थिति, असहनीय दुःख-दर्द, अप्रत्याशित घटनाएं, जीवन में अनायास उपजी निराशा, रोगग्रस्तता, परिजनों द्वारा की जाने वाली अवहेलना आदि बुढ़ापे को कष्टप्रद बना देते हैं। ऐसी दशा में जिजीविषा मर जाती है, वृद्ध परावलम्बी हो जाते हैं अतएव उनका जीवन अपने लिए ही नहीं वरन दूसरों के लिए भी भार हो जाता है। जबकि बुजुर्गों के पास ज्ञान एवं अनुभव का अथाह भण्डार होता है, जिसका उपयोग समाज-हित में किया जा सकता है। स्वस्थ बुजुर्ग संगठन बनाकर दहेज-हत्या, कन्या भ्रूण- हत्या, महंगाई, गरीबी, निरक्षरता,बाल-विवाह, अंधविश्वास, साम्प्रदायिकता जैसी सामाजिक कुरीतियों और विडम्बनाओं को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे अपनी सक्रियता और सकारात्मक सोच से नयी पीढ़ी का मार्गदर्शन कर समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। परन्तु दुर्भाग्य से एकल परिवारों के चलन ने बच्चों को बुजुर्गों के आत्मीय सान्निध्य से वंचित कर दिया है और युवाओं के देश भारत में बुजुर्ग अपने ही परिवार में उपेक्षित हैं।

बदलते सामाजिक परिवेश और पारिवारिक संरचना ने बुजुर्गों के जीवन को कठिन बना दिया है। अपनी सन्तान के उचित पालन पोषण तथा उज्जवल भविष्य-निर्माण हेतु अपना सब कुछ दांव पर लगा देने वाले माता-पिता यदि वृद्धावस्था में संतान से प्यार एवं सम्मान पाने की बजाय मुट्ठी भर दाने और आश्रय तक के मोहताज हो जाएं तो इससे दुःखद और क्या होगा ? भारत में बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा रही है। परन्तु अब पश्चिमी सभ्यता और औद्योगीकरण के दुष्प्रभाववश हमारी परम्पराएं क्षीण होती जा रही हैं। ‘चिरंजीवी भवः’ और ‘सदैव प्रसन्न रहो’ का आशीर्वाद देने वाले बुजुर्ग अब बच्चों के साथ घरों में नहीं रहते, वे वृद्धाश्रमों में पहुंचा दिए जाते हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वृद्ध कितने उपेक्षित किये जा रहे हैं ? आज भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 9.68 करोड़ है। वर्ष 2026 तक देश में बुजुर्गों की आबादी 17 करोड़ और 2050 तक 32.4 करोड़ हो जाने का अनुमान है। वर्तमान में लगभग 10 प्रतिशत आबादी बुजुर्गों की है, अतः भारत युवा देश माना जाता है। मगर यहां बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, अनुमानतः प्रतिदिन 17 हजार लोग 60 वर्ष की उम्र के हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारत बहुत शीघ्र चीन से भी अधिक बुजुर्गों वाला देश हो जाएगा।

भारत में वृद्धों की संख्या वृद्धि ही नहीं, उनके प्रति, अत्याचार में वृद्धि भी चिंताजनक है। अशासकीय संगठन ‘हेल्प एज इण्डिया’ द्वारा किये गए सर्वेक्षण के अनुसार, बुजुर्गों के प्रति अत्याचार में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि आंकी गई है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 23 प्रतिशत था। देश के आठ राज्यों के 12 शहरों में हुए सर्वेक्षण के मुताबिक वृद्ध पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर अधिक अत्याचार किये जाते हैं। जहां 48 प्रतिशत बुजुर्ग पुरुष अपनों के द्वारा सताये जाते हैं, वहीं 52 प्रतिशत महिलाएं प्रताडि़त की जाती हैं। प्रायः बुजुर्गों के साथ गाली-गलौज और अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें सामने आती हैं। पर वे अपने उत्पीड़न के समाधान के लिए पुलिस हेलप लाइन या किसी संस्था का सहारा नहीं लेते। यहां तक कि 41 प्रतिशत बुजुर्ग किसी को अपने सताये जाने की जानकारी तक नहीं देते। गौरतलब है कि प्रथम श्रेणी के शहरों में बेंगलुरू बुजुर्गों पर अत्याचार के मामले में शीर्ष पर है। वहां 75 प्रतिशत वृद्ध परिजनों के द्वारा उत्पीडि़त किए जाते हैं। दूसरी श्रेणी के शहरों में नागपुर शीर्ष पर है, जहां 85 प्रतिशत बुजुर्गों के साथ दुव्र्यवहार होता हैं दिल्ली में 22 प्रतिशत और कानपुर में 13 प्रतिशत बुजुर्ग अवमानना और उत्पीड़न के शिकार होते हैं। यह भी विडम्बना है कि 61 प्रतिशत दामाद और 59 प्रतिशत बेटे अपने बुजुर्गों पर जुल्म ढाते हैं।

आंकड़े कम हों या अधिक, यह तय है कि पूरे देश में वृद्ध अपनों के द्वारा ही सताये जा रहे हैं। हाल ही में झारखण्ड के झरिया गांव का एक हृदयविदारक मामला उजागर हुआ है, जिससे यह ज्ञात होता है कि जन्मदाता के प्रति संताने कितनी निष्ठुर और संवेदनहीन होती जा रही हैं ? झरिया के दिनेश वर्णवाल की 70 वर्षीया वृद्धा मां  का एक पैर टूट गया था। आठ दिनों से उस पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था। ऐसे में उनके बेटे बहू और बच्चों को एक विवाह-समारोह में देवघर जाना था। घर में बूढ़ी मां को अकेली छोड़, बाहर से ताला डालकर वे शादी का जश्न मनाने चले गये। दो दिन के बाद जब भूख-प्यास असह्य हो गई तो वृद्धा शारदादेवी की सिसकियां चीखों के साथ बाहर आई। पुलिस को पड़ोसियों ने सूचना दी तो पुलिस ने उनके घर पहुंचकर ताले तुड़वाये और उन्हें बाहर निकाला गया। दिनेश का यह अमानवीय व्यवहार समाज के समक्ष कई प्रश्न उपस्थित करता है। पहला तो यह कि उसके बच्चे इस घटना से क्या सीखेंगे ? दूसरा, पुलिस हस्तक्षेप के बाद पारिवारिक  रिश्तों में जो तनाव उपजेगा, उसका हल क्या है ? तीसरा, बूढ़े-माता पिता अपनी संतान से कोई आशा न रखें तो किससे रखें ? चैथा, क्या पारिवारिक जीवन की समस्याएं अब पुलिस या अशासकीय संगठनों के सहयोग से ही सुलझायी जाएंगी ? और अंतिम प्रश्न, क्या सारा जीवन संघर्ष करने के बाद बुजुर्ग अपने जीवन के संध्याकाल में अवमानना, तिरस्कार और मानसिक यातनाएं झेलने के लिए अभिशप्त हैं ? उनके पास सम्मानजनक जीवन के लिए कोई विकल्प नहीं ?  आज युवाओं पर भौतिकवाद इस कदर हावी है कि अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों से भाग रहे हैं। मातृत्व-पितृत्व में उनकी आस्था नहीं है इसलिए वे स्वयं ऐसी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। उन्हें रिश्ते बोझ लगते हैं। एकाकी परिवार की प्रचलित एवं बलवती होती अवधारणा ने भी उन्हें बहुत स्वार्थी और संवेदनहीन बना दिया है इसलिए आज उनके दाम्पत्य संबंधों में आत्मीयता, प्रगाढ़ता, कर्तव्यपरायणता, समर्पण, त्याग और कष्टसहिष्णुता, जैसे गुणों का सर्वथा अभाव है। यही कारण है कि ‘परिवार’ का अस्तित्व संकट में है। माता-पिता के बाद सारी सम्पत्ति पर मालिकाना हक भी संतानों को जन्मदाताओं के प्रति दुव्र्यवहार से नहीं रोक पा रहा है। अशिक्षित, अज्ञानी और संस्कारहीन संतानों का अपने बुजुर्गों के प्रति दुव्र्यवहार तो समझ में आता है पर उच्च शिक्षित और स्वावलंबी संतानें भी जब अपने पढ़े-लिखे, आत्मनिर्भर, प्रतिष्ठित, सुसंस्कृत संपन्न माता-पिता के प्रति अमानवीय व्यवहार करती हैं, यहां तक कि विवश होकर कई बार माता-पिताओं को अपनी संतानों से, उनके नाम कर दी गई संपत्ति भी वापस लेनी पड़ती है। तब ऐसे बुजुर्गों की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऐसे में प्रश्न, बुजुर्गों की जीवन-रक्षा का ही नहीं, उनके आत्मसम्मान और आत्मसंतोष का भी है।

ज्ञातव्य है कि केन्द्र का ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007’ बुजुर्गों के हितों की पैरवी के लिए ही है। ऐसे वरिष्ठ नागरिक जिनकी उम्र 60 वर्ष से अधिक है और जो अपनी सम्पत्ति की आय से भरण पोषण करने में असमर्थ हैं, वे अपनी वयस्क संतानों या अपनी सम्पत्ति के उत्तराधिकारियों से भरण-पोषण पाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति बुजुर्गों की अवहेलना करता है या उनका भरण पोषण नहीं करता है तो उसके लिए सजा का प्रावधान है। उसे पांच हजार रुपये का अर्थदण्ड या तीन माह का कारावास या फिर दोनों सजाएं भुगतनी पड़ सकती है। उत्पीडि़त माता-पिता अपने जिले में गठित भरण-पोषण अधिकरण के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर उत्तराधिकारी से प्रति माह भरण-पोषण हेतु दस हजार रुपये प्राप्त कर सकते हैं।

मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2009 में नियम बनाकर केन्द्रीय अधिनियम का पालन सुनिश्चित करने की पहल की। इसे प्रदेश में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण नियम’ नाम दिया गया है। इसके तहत प्रत्येक जिले के उपखण्डों में भरण पोषण अधिकरण तथा जिला स्तर पर अपील अधिकरण गठित किए गए हैं। अब प्रदेश के सामाजिक न्याय विभाग के मुताबिक राज्य सरकार चाहती है कि ऐसे बच्चों को अपने वृद्ध माता-पिता के भरण पोषण के लिए प्रेरित करने हेतु यदि पैतृक संपत्ति से वंचित करने के साथ-साथ दण्ड का भी प्रावधान कर दिया जाए तो बच्चों पर दबाव पड़ेगा। परन्तु ऐसी स्थिति में संपत्तिविहीन बुजुर्गों के भरण-पोषण का मामला कैसे हल होगा ? क्या एक संस्कारसंपन्न देश में निर्धन बुजुर्गों को असहायावस्था में ही संसार से विदाई लेनी होगी ? क्या वृद्धावस्था को उत्पीड़न का पर्याय बनने से नहीं रोका जा सकता ? कानून की बदौलत संपत्ति का लेन-देन और अधिकारों का निर्धारण किया जा सकता है लेकिन क्या माता-पिता के आशीर्वाद, प्यार-दुलार और वात्सल्य की देनदारी भी इस देश में कानून तय करेगा ? भारत की पवित्र भूमि पर जन्म दाताओं के प्रति संतानों का कर्तव्य निर्धारण भी क्या कानून के बिना संभव नहीं ?

वस्तुतः बुजुर्गों के अधिकारों के लिए लड़ने का कोई विशेष सरकारी तंत्र फिलहाल नहीं है। समाज में बुजुर्गों का संरक्षण एक अहम सवाल है। केन्द्र सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के उद्देश्य से अनुदान प्राप्त वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना 15 अगस्त 2014 से आरंभ की है। इस योजना में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के नागरिक न्यूनतम 66665 रुपये और अधिकतम 666665 रुपये निवेश कर 9.38 प्रतिशत ब्याज के अलावा पांच सौ से पांच हजार रुपये तक पेंशन प्राप्त कर सकते हैं। पेंशन का भुगतान मासिक, तिमाही, छःमाही या वार्षिक हो सकता है। निवेशक के निधन की स्थिति में नामित व्यक्ति को पूर्ण खरीद मूल्य का भुगतान किया जाएगा। चालू वित्त वर्ष में पांच लाख वरिष्ठ नागरिकों को इस योजना में अपने सेवानिवृत्त अधिकारियों को भागीदार बनाने के लिए एडहाक टास्कफोर्स का गठन किया है। परन्तु लगभग 90 प्रतिशत वृद्धों के पास सामाजिक सुरक्षा जैसी कोई व्यवस्था नहीं है और 47 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। लगभग 75 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों से हैं और 73 प्रतिशत अशिक्षित। 55 प्रतिशत वृद्धाएं हैं और इनमें से दो करोड़ विधवाएं हैं।

निश्चय ही, इतनी बड़ी संख्या के हितों की अनदेखी उचित नहीं। यह भी सच है कि सरकारी प्रयासों से ही बुजुर्गों का संरक्षण संभव नहीं। समाज और परिवार को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। क्योंकि बुजुर्गों को परिवार में संरक्षण देने वाला कानून बहुत त्रुटिपूर्ण है, उसमें वांछनीय सुधार के बाद ही सार्थक परिणाम की आशा की जा सकती है।

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