नटवर की अनर्गल लीला

10:57 am or August 11, 2014
One Life is Not Enough - by Natwar Singh

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के 2004  में प्रधानमंत्री पद को छोड़ने के पीछे जिन कारणों का खुलासा किया है, हो सकता है कि वे सब अक्षरश: सत्य हों। नटवर सिंह गांधी परिवार के काफी करीबी रहे हैं और यूपीए सरकार में मंत्री भी रहे हैं, इसलिए उनकी बातों को एक बार मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन इन बातों को सत्य मानने से पहले उन सवालों और तथ्यों के जवाबों की तलाश करना भी बेहद जरूरी है जो पूर्व में उठते और सामने आते रहे हैं। पूर्व मंत्री नटवर सिंह की किताब पर जिस तरह से बीजेपी से प्रतिक्रिया आई है और जो लोग मौन रह गए और जिन लोगों ने ऐसे व्यक्तियों से सवाल करना भी जरूरी नहीं समझा उन्हें भी एक बार अपने गिरबां में झांक लेना चाहिए, ताकि भविष्य में शर्मशार न होना पड़े।

             नटवर सिंह का कहना है कि सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से उनके बेटे राहुल गांधी ने रोका था। राहुल को संदेह था कि कहीं उनके पिता और दादी की तरह मां की भी हत्या न हो जाए। यदि ऐसा है भी तो इसमें बुराई क्या है? जिस परिवार के सदस्य आतंकियों की गोलियों की भेंट चढ़ रहे हों, यदि ऐसे में कोई बेटा अपनी मां को लेकर आशंकित होता है तो इसमें बुरा क्या है। कह सकते हैं देश की सेवा करने के लिए लोग जान की परवाह नहीं करते, लेकिन जान देकर ही देश की सेवा होती है, ऐसा तो कोई सिध्दांत नहीं है। वैसे भी यह तर्क विमर्श का विषय नहीं हो सकता, वह इसलिए क्योंकि इस भय को दूर भी किया जा सकता था और ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं लगता कि कांग्रेस में सब दूध पीते बच्चे थे, जिनके पास इस भय से सोनिया गांधी को उबारने के तर्क और सलाहियतें न हों। इंदिरा गांधी अपने सुरक्षागार्डों पर बड़ा भरोसा करती थीं, उन्हीं ने उनकी हत्या कर दी। सोनिया गांधी चाहती तो नहीं करतीं। राजीव गांधी सहज भाव से लोगों के बीच चले जाते थे, ऐसे ही एक वाकया उनकी हत्या की वजह बना। सोनिया पीएम बनने के बाद इस बात से परहेज कर सकती थीं। कहने का मतलब यह कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने आसपास एक अभेद्य सुरक्षा प्राचीर तैयार करा सकती थीं, अपनी जान बचाने के लिए। सिर्फ प्रधानमंत्री का पद त्यागकर ही तो वे अपनी जान बचाने में सफल हो सकती थीं ऐसा ही मान लेना ठीक वैसा होगा जैसे कि उस वक्त सोनिया गांधी के करीब बेहद बुध्दिमान नटवर सिंह ने भी ऐसा ही मान लिया हो। दूसरी बात जो काबिलेगौर है वो यह कि जिस तरह से अपने सियासी दौरों में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सुरक्षा घेरा तोड़कर जनता से मिलते हैं, साफ हो जाता है कि उन्हें कम से कम इस बात का भय तो नहीं है। इसलिए नटवर सिंह जो लिख रहे हैं, उनके शब्दों में सत्य का भाव कितना दूर है यह समझा जा सकता है। दूसरे यह भी कहा जा सकता था कि नटवर सिंह ने पार्टी की सर्वेसर्वा को तब कोई उचित परामर्श नहीं दिया जब उसकी जरूरत थी। आज मनगढ़ंत गढ़े मुर्दे उखाडक़र अपनी प्रबुध्दता का परिचय दे रहे हैं।

             नटवर सिंह के यह दावे इसलिए भी संदेहास्पद हैं क्योंकि सोनिया गांधी की साख पर बट्टा लाने की कोशिशों के तहत उनके प्रधानमंत्री पद को छोड़ने को लेकर पहले भी तरह तरह के दावे सामने आते रहे हैं। बीजेपी नेताओं को खासतौर पर यह दावे याद होंगे जो नटवर की किताब पर लीला कर रहे हैं। इस लीला के बीच में मुझे बीजेपी की सबसे अधिक लीलाधारी सुब्रह्मण्यम स्वामी की याद आ रही है। कभी सुब्रह्मण्यम स्वामी सोनिया गांधी से मिलने के लिए आतुर रहा करते थे। बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में भी स्वामी जी का अहम योगदान रहा है। लेकिन कुछ ऐसा बिगड़ा कि स्वामी जी सोनिया के विरोधी हो गए और फिर इसके बाद सोनिया को लेकर स्वामी जी के विरोधी की लंबी दास्तान है। जब तक दिन में वे एकाध आरोप गांधी परिवार पर न लगा लें उनका खाना हजम नहीं होता। कुछ वक्त पूर्व स्वामी जी ने नटवर सिंह के दावों के एकदम उलट दावा किया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें बुलाकर सोनिया गांधी को पीएम बनाए जाने को लेकर सलाह ली थी। इसके बाद सोनिया को पीएम बनने से यह कहते हुए मना किया था कि इसमें कानूनी अड़चने हैं। जब स्वयं कलाम ने इस बात का खंडन किया तो स्वामी ने यहां तक दावा किया था कि कलाम इतिहास के साथ अन्याय कर रहे हैं। उन्होंने कलाम को चुनौती दी थी कि वे वह चिट्ठी सार्वजनिक करें जो उन्होंने 17 मई की शाम 3.30 बजे सोनिया गांधी को लिखी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि यह पत्र ऑन रिकार्ड है, इसे झुठलाया नहीं जा सकता।

             मतलब एकदम साफ है, एक गांधी परिवार का करीबी और सरकार में मंत्री रहे हैं, दूसरे के पास दिन, तारीख और वक्त तक का हिसाब है, तो जाहिर है दोनों में से कोई एक झूठा है, या फिर दोनों ही झूठे हैं। मजेदार बात यह है कि तब  बीजेपी स्वामी के दावों के साथ थी और आज नटवर सिंह के दावों के साथ है। क्या बीजेपी यह साफ करेगी कि वह तथ्यों और साक्ष्यों के साथ है या फिर सोनिया गांधी के विरोध में उठने वाली आवाजों के साथ है। यदि तथ्यों और साक्ष्यों के साथ है तो यह केवल और केवल सोनिया गांधी के पास हैं। लिहाजा बीजेपी को कोई हक नहीं बनता कि वह बिना किसी जानकारी के सिर्फ किसी के कह देने से उनके निजी जीवन को लेकर कोई टिप्पणी करे। और यदि सिर्फ उन बातों के साथ है जो यदा-कदा असंतुष्ट लोग तब उठाते हैं जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उनकी कड़वाहट बढ़ जाती, तो बड़े अफसोस की बात है। यदि ऐसी ही बातों पर भरोसा किया जाए तो बीजेपी को मौका परस्तों और ललचियों की पार्टी घोषित करने में मिनट भर का वक्त जाया नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह बात किसी नटवर सिंह जैसे करीबी नेता ने नहीं की है बल्कि उस व्यक्ति ने कही है जिसने बीजेपी को पौधे से वृक्ष बनाया है। हालांकि यह नेता भी असंतुष्टों की श्रेणी में खड़े हैं, फिर भी इनका रुतबा नटवर सिंह की अपेक्षा बहुत बड़ा है। लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी विवाद के बीच जब इस्तीफा दिया था तब कहा था कि पार्टी कुछ ऐसे लोगों से घिर गई है जिनका उद्देश्य पार्टी या देश की सेवा करना नहीं है बल्कि अपना स्वार्थ सिध्द करना है।

             जनता को और देश के प्रबुध्दजनों को इसका अहसास है कि ऐसी किताबें क्यों लिखी जाती हैं? खुलासों के इस क्रम में कुछ और लोग भी हैं जो किताब लिखना चाहते हैं, देखना यह है कि आने वाली किताबों के लेखक सत्ता को खुश करने के लिए कितने तथ्यपरक खुलासे करते हैं। मेरे एक मित्र ने इस मामले में बड़ी रोचक टिप्पणी की है। उनके मुताबिक संजय बारू, नटवर सिंह जैसे लोग दरअसल अपनी पेंशन का इंतजाम कर रहे हैं, इसलिए लिख रहे है। ये बेवजह का विवाद है। गांधी परिवार ही क्यों, अगर अटलजी, आडवाणी और मोदी से खुलासे करने वाली किताब बंगारू लक्ष्मण लिख गए होते तो भारतीय उसे भी पढ़ते…खुलासों के नाम पर लुग्दी साहित्य परोसने का ये शगल कब लोगों के समझ में आएगा…भीष्म साहनी, आचार्य कुबेर नाथ राय, भगवती चरण वर्मा, बाबा नागार्जुन, इब्ने इंशा जैसों को पढ़ा होता, तो देश यहां नहीं पहुंचता।

विवेकानंद

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