अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ दोहरी नीति

6:20 pm or September 29, 2014
USA

शैलेन्द्र चैहान –

सहज शब्दों में यदि कहा जाये तो हिंसात्मक घटनाओं के माध्यम से लोगों में भय पैदा करना, आतंकित करना  कहलाता है और यह कार्य आतंक कहलाता है। जब यह आतंक भयानक रूप से सब ओर फैल जाता है तो इसे ‘आतंकवाद’ कहते हैं। आज इसने संपूर्ण विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विश्व का कोई भी राष्ट्र बहुत गंभीरता  साथ इसे खत्म करने का प्रयास  नही कर रहा है।  खास तौर से वे बलशाली देश जो महाशक्ति कहे जाते हैं। बल्कि परोक्ष रूप से कहीं न कहीं वे इसके सूत्रधार भी रहे हैं। यही कारण है कि इस अत्यंत भयानक बुराई का अंत होने के बजाय  इसका विस्तार हो रहा है। ग्यारह सितम्बर 2001 को अमेरिका में हुई ट्विन टावर की आतंकी घटना रही हो,  तेरह दिसंबर  2001 को भारत की संसद पर हमला हो, 12 अक्टूबर  2002, में बाली (इंडोनेशिया) में बम विस्फोट, 16 मई  2003 में मोरक्को में, 27 फरवरी 2004 में फिलीपिंस में, 11 मार्च  2004 को मैड्रिड में बम विस्फोट, 26 नवम्बर  2008 को ताज होटल मुंबई में हमला, 13 जुलाई  2011 को मुंबई में पुनः आतंकी विस्फोट, और 7 सितम्बर 2011 को दिल्ली में भीषण विस्फोट हो, ये सब उदाहरण इस बात का संकेत देते हैं कि आतंकवाद की पहुँच कभी भी, कहीं भी, कैसे भी हो सकती है।  खासकर 11 सितम्बर 2001 की घटना ने विकसित देशों के इस भ्रम  को तोड़ दिया है कि वे आतंकवाद से सुरक्षित हैं। यह संपूर्ण विश्व के लिए एक चुनौती है।  अतः इस समस्या के  समाधान का प्रयास भी वैश्विक स्तर पर किया जाना आवश्यक है। आतंकवाद से निपटने के लिए विश्व स्तर पर कुछ कदम उठाना फायदेमंद हो सकता है जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आतंकवाद की रोकथाम के लिए सकारात्मक निर्णय लिए जाएँ तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से पूर्णतः बहिष्कार किया जाये। उनके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय सहायता भी पूर्णतः बंद कर दी जानी चाहिए। दूसरा सकारात्मक कदम यह भी हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक राष्ट्र यह स्वीकार करे कि वह आतंकवाद से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है तथा अपने निजी स्वार्थ की पूर्ती के लिए न तो आतंकवाद को बढ़ावा देगा और न ही अपने देश को आतंकवाद का आश्रय स्थल बनने देगा। अगर कोई देश जानबूझकर ऐसा करता है तो उसके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मोर्चाबंदी की जानी चाहिए। यहाँ यह स्पष्ट करना भी  आवश्यक है कि मात्र ओसामा बिन लादेन , तालिबान, मुंबई हमले के आरोपी अजमल आमिर कसाब या कुछ आतंकवादी संगठनों का सफाया ‘आतंकवाद का सफाया’ नहीं है।  यह संपूर्ण विश्व में अलग अलग हिस्सों में अलग अलग रूप में सक्रिय है। इसके सफाए के लिए विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौजूद आतंकवाद के विविध स्वरूपों को पहचानना आवश्यक है। विश्व में कुछ इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की सक्रियता के कारण आज आतंकवाद को इस्लामी संप्रदाय से जोड़कर देखा जाने लगा है। इसके कुछ ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। आतंकवादियों की कोई जाति धर्म या संप्रदाय नहीं होता। उनका तो बस एक ही धर्म होता है- आतंक फैलाना। इस दृष्टि से किसी भी धर्म या संप्रदाय को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से उस धर्म या संप्रदाय द्वारा आतंकवाद को और बढ़ावा दिया जाने लगता है। अफगानिस्तान और फिलिस्तीन इस बात के दो अलग अलग उदहारण हैं। अफगानिस्तान में सोवियत संघ को नीचा दिखने के लिए अमेरिका तालिबान की मदद करता है। ओसामा को आतंकवादी होने की ट्रेनिंग देता है। वहीँ फिलिस्तीन के खिलाफ इसराइल को लगातार सहयोग करना स्वतः एक आतंक पैदा करने वाला कदम है। ईराक को मिटाकर वहां आतंवादियों को कदम रखने का मौका अमेरिका ने ही मुहैय्या कराया है। आज बगदाद पर एक आतंकवादी संगठन काबिज हो गया है। जाहिर है आज इस्लाम से आतंकवाद को अलग करना अत्यंत आवश्यक है। तभी आतंकवाद का सफाया करने में इस्लाम का सहयोग मिल सकेगा। लेकिन अमेरिका जैसे राष्ट्र दोहरी नीतियां अपनाने के कायल हैं।

आतंक शब्द का जब भी जिक्र होता है स्वाभाविक रूप से ध्यान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अलकायदा और तालिबान द्वारा फैलाये जा रहे आतंकवाद पर जाता है। आज विश्व के सभी देश आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रयासरत हैं और इसके लिए एक दूसरे को सहयोग भी कर रहे हैं लेकिन इस सहयोग का उपयोग कितने सही तरीके से हो रहा है यह देखना आवश्यक है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को अरबों डॉलर कि सहायता राशि आतंकवाद से लड़ने के लिए दी जाती रही है किन्तु पाकिस्तान ने हमेशा इसका उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया है। यह बात पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी ने भी स्वीकार की है कि अमेरिका द्वारा पकिस्तान को दी जा रही सहायता राशि का उपयोग पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कार्य कर रहे आतंकी संगठनों की सहायता में खर्च करता रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि अमेरिका इससे परिचित है लेकिन वह पाकिस्तान को ऐसा करने से नहीं रोकता। एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान को अलकायदा के खिलाफ अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अमेरिका की तरफ से 5 अरब अमेरिकी डॉलर दिए गए थे मगर इस धन राशि का उपयोग उसने भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में किया। लेकिन अमेरिका को कोई गिला नहीं। यूँ भी अमेरिका बिना जांचे परखे पाकिस्तान को अरबों डॉलर कि सहायता राशि देता आया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2001 से 2011 तक अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को लगभग 17 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि सहायतार्थ दी जा चुकी है। मगर एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी को देखने के बाद  पाकिस्तान को 80 करोड़ डॉलर की सहायता स्थगित कर दी गयी थी।  दोनों देश इस सम्बन्ध में एक दूसरे का सहयोग करने का आश्वासन देते हैं, मगर हकीकत में वे कुछ नहीं करते। यह बेहद चिंताजनक बात है। इस तरह आतंकवाद का सफाया संभव नहीं है।

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