लौहपुरुष के प्रशंसक का मुलायम चेहरा

6:31 pm or September 29, 2014
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– महेश बागी –

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी देश के पहले गृहमंत्री लौह पुरुष सरदार पटेल की जमकर सराहना की थी और उनकी स्मृति में देश की विशालतम प्रतिमा लगाने की घोषणा भी की थी। इससे जनसमुदाय में यह संदेश गया था कि मोदी भी सरदार पटेल की तरह समस्याओं के सीधे-सटीक समाधान के पक्षधर हैं। हैदराबाद को भारतीय संघ में समाहित करने और सोमनाथ की मुक्ति में सरदार पटेल की अहम भूमिका थी। संभवतः उनकी इसी छवि को भुनाने के उद्देश्य से मोदी ने पटेल राग अलापा था। इसके उन्हें तात्कालिक लाभ मिला भी। लोकसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला और वे प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गए। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद लोगों को लगा कि वे जिस व्यक्ति में लौहपुरुष की छवि तलाश कर देश की ज्वलंत समस्याओं का समाधान चाह रहे थे, वह व्यक्ति वास्तव में लच्छेदार भाषण देने भर में ही माहिर है। घरेलू मोर्चे पर महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मोदी सरकार विफल रही है और विदेश नीति में तो उसे मुंह की ही खानी पड़ी है और पड़ रही है।

ताजा मामला चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग की भारत यात्रा का है। इस यात्रा में वे अहमदाबाद भी गए थे। अब खबर आई है कि चीनी राष्ट्रपति वहां जिस होटल में ठहरे थे, वहां तथा शहर के अन्य माॅल्स में काम करने वाले अरुणाचल प्रदेश तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के कर्मचारियों को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया। इतना ही नहीं, चीनी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में गुजरात सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश का गलत नक्शा बांटा गया। इसमंे अरुणाचल प्रदेशव अक्साईचीन को विवादित क्षेत्र बताया गया। कांग्रेस ने इसे चीनी राष्ट्रपति को खुश करने के प्रयास और देश की संप्रभुता से खिलवाड़ करार दिया है। कितने आश्चर्य की बात है कि जो सरकार अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग घोषित करती आ रही है तथा वहां आए दिन होने वाली चीनी सैनिकों की घुसपैठ पर चिंता जताती आई है, वही सरकार अरुणाचल प्रदेश तथा अक्साईचीन को विवादित क्षेत्र बता रही है। चीनी साम्राज्यवादी नीति के चलते भारत को एक बार चीन द्वारा थोपे गए युद्ध का सामना भी करना पड़ा है, जिसमें हमें हार का मुंह देखना पड़ा था। तब से लेकर आज तक चीनी सेना अक्सर भारतीय सीमा में घुसपैठ करती आ रही है।

जिनपिंग की भारत यात्रा से ठीक पहले चीनी सैनिकों ने अरुणाचल प्रदेश के चुमार क्षेत्र में न सिर्फ घुसपैठ की, बल्कि हमारी सीमा में सड़क बनाने का काम भी शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, इसके निकट ही वह बांध बनाने का काम भी तेजी से कर रहा है। चीनी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान देश को यह आशा थी कि ‘लौहपुरुष के प्रशंसक’ नरेन्द्र मोदी चीन को दो टूक कह देंगे कि हम घुसपैठ बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसे देश का दुर्भाग्य ही कह जाएगा कि मोदी ऐसा कहने का साहस नहीं जुटा सके। इसके विपरीत भारतीय प्रदेश को विवादित दर्शा दिया। यात्रा के दौरान मोदी ने इतनाभर कहा कि घुसपैठ से दोनों देशों के संंबंधों पर असर पड़ सकता है। इस पर जिनपिंग ने चीनी सेना को पीछे हटने का आदेश दिया और अब चीन लौटने के बाद वे अपने सैनिकों को संदेश दे रहे हैं कि वे युद्ध के लिए तैयार रहें। इससे एक बार फिर साबित हो गया कि चीन न हमारा भाई बन सकता है और न ही मित्र। उसकी कुदृष्टि भारत पर है और वह अपनी हरकतों  से बात नहीं आएगा। यहां यह तथ्य भी विचारणीय है कि 1965 के भारत-चीन युद्ध की परिस्थिति और आज की स्थिति में बहुत अंतर है। माना कि सैन्य दृष्टि से चीन आज भी भारत से ज्यादा सक्षम है, किंतु अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि चीन हम पर युद्ध थोप सके। वैसे भी चीन को भारत की मैत्री की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि व्यापार का सबसे बड़ा केन्द्र भारत ही है। यदि सरकार आज कठोर निर्णय लेकर चीनी उत्पादों के भारत में विक्रय पर प्रतिबंध लगाने की घोषणाभर कर दे, तो चीन घुटने टेकने को मजबूर हो जाए, लेकिन इसके लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, वह मोदी सरकार में दिखाई नहीं देती।

यह सरकार तो पड़ोसी शत्रु को खुश करने के लिए अपने ही देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने पर आमादा है। अहमदाबाद में पूर्वोत्तर के कर्मचारियों को जबरिया छुट्टी पर भेजने की घटना साधारण नहीं है। जब पूरी दुनिया में नस्लीय भेदभाव को अपराध माना जा रहा है, तब भारत जैसे सहिष्णु और विभिन्न जाति-संस्कृतियों वाले देश में अपने ही नागरिकों को नस्लीय आधार पर भेदभाव किया जाए,तो इसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। ऐसी घटना से अनावश्यक रूप से उत्तर पूर्व के नागरिकों  पर शक जताया गया हैं। इन नागरिकों के मन में पहले से ही यह भय व्याप्त है कि शेष भारत में उनसे भेदभाव किया जाता है। राजधानी दिल्ली में ही इस वर्ग को प्रताडि़त करने के सैकड़ों मामले प्रकाश में आ चुके हैं। ऐसे में जिनपिंग की यात्रा में उनसे हुआ भेदभाव क्या राष्ट्रीय अपराध नहीं है ? हालांकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इस घटना की जांच के आदेश दिए है, किंतु क्या इससे पूर्वोत्तर के लोगों के दिलों पर लगा जख्म भरा जा सकता है ? वैसे भी यह तथ्य सर्वविदित है कि किसी भी बड़े मामले की जांच की घोषणा उसे ठंडे बस्ते में डालने की ही कोशिश मानी जाती है। यह तथ्य गले ही नहीं उतरता कि सरकार की मर्जी के खिलाफ कोई अधिकारी उक्त हरकत करने में कामयाब कैसे हो गया ? इसके अलावा गुजरात सरकार द्वारा भारत का गलत नक्शा बांटे जाने को क्या कहा जाएगा ? क्या यह एक शत्रु के आगे हथियार डालने के समान नहीं है ? जिस सरकार की नीति में जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए अलग है, वहीं सरकार पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव करे, तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए ? यही कि हमारा मौजूदा नेतृत्व अपने लोगों के सामने भीगी बिल्ली की तरह मिमियाने लगता है ?

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