उपचुनावों में मतदाताओं ने भाजपा की सांप्रदायिक अपील को नकारा है

6:37 pm or September 29, 2014
090620145

– एल.एस.हरदेनिया –

सितंबर (2014) माह में हुये उपचुनावों के नतीजों से भारतीय जनता पार्टी को न सिर्फ झटका लगा है वरन् यह भी स्पष्ट संकेत मिले हैं कि चुनाव प्रचार के साम्प्रदायिककरण से विजय हासिल नहीं होती है। भाजपा को लगता था कि चूंकि हमने उत्तरप्रदेश की 73 लोकसभा सीटों में अपनी विजय पताका फहरा दी है इसलिए अब हमें बड़ी से बड़ी ताकत शिकस्त नहीं दे सकती। वह अपने आप को अजेय समझने लगी थी। इसलिये भाजपा ने उत्तरप्रदेश के उपचुनाव के लिये प्रचार का उत्तरदायित्व घनघोर साम्प्रदायिक नेताओं को सौंप दिया था। ये नेता ऐसे हैं जब भी मुंह खोलते हैं जहर उगलते हैं। इस तरह के नेताओं की सूची में सबसे ऊपर थे महंत आदित्यनाथ। ये सांसद भी हैं। इन्हें उत्तरप्रदेश में होने वाले चुनावों का प्रभारी बनाया गया था। इनने अपने भाषणों में ‘लव जिहाद’ का मुद्दा उठाया। इनका आरोप था कि मुसलमान युवक हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसा लेते हैं। कभी-कभी वे अपने को हिन्दू बताकर ऐसा करते हैं। जब हिन्दू लड़की उनके जाल मंे फंस जाती है, उसके बाद उस पर इस्लाम धर्म कुबूल करने का दबाव बनाते हैं। आदित्यनाथ ने यह भी दावा किया कि बड़े पैमाने पर हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बनाया जा रहा है। आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में यह भी कहा कि जिस शहर या कस्बे में मुसलमान बहुसंख्यक होते हैं वहां ही साम्प्रदायिक दंगे होते हैं।

आदित्यनाथ की नकल करते हुये ऐसी ही जहरीली बातें उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और अनेक केन्द्रीय मंत्री भी कहने लगे थे। इस तरह की बातों के प्रचार के लिये पंचायतें और महापंचायतें आयोजित की जाने लगीं थीं। भाजपा नेताओं ने जाटों और मुसलमानों के बीच में फूट डालने का प्रयास किया। भाजपा के ऐसे वक्ताओं के भाषणों के दौरान जय जयकार होने लगा। भाषणों के दौरान तालियां भी पीटी जाने लगीं थीं। भाजपा के ऐसे वक्ता यह समझने लगे कि अब उन्होंने मैदान जीत लिया है और नतीजे में जितनी विधानसभा सीटों पर चुनाव होने वाले हैं वे सब फिर से उनकी झोली में आने वाली हैं।

उत्तरप्रदेश के जिन 11 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव होने वाले थे पिछले आम चुनाव में वे सब सीटें भाजपा ने जीती थीं। उपचुनाव में उनमें से सिर्फ 3 सीटें भाजपा बचा सकी और बाकी 8 सोशलिस्ट पार्टी ने जीतीं।

चुनाव के नतीजों से यह स्पष्ट हो गया कि उत्तरप्रदेश का मतदाता साम्प्रदायिक प्रचार से प्रभावित होकर मतदान नहीं करता है। उत्तरप्रदेश के मतदाता इसके पूर्व भी भाजपा का भ्रम तोड़ चुके हैं। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को संघ परिवार ने अपनी महान सफलता मानी थी। अनेक भाजपा नेताओं ने यह दावा किया था कि मस्जिद को तोड़कर हमने मुसलमान आक्रामकों से बदला ले लिया है। इसके बाद 1993 में चुनाव हुये। उन चुनावों में उत्तरप्रदेश में भाजपा के हाथ में सत्ता नहीं आई। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी थी उस समय उत्तरप्रदेश में भाजपा का शासन था और कल्याण सिंह वहां के मुख्यमंत्री थे। इसके बावजूद 1993 के चुनाव में वहां से भाजपा हारी। उत्तरप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश समेत अनेक राज्यों में भी भाजपा हारी थी। स्पष्ट है कि उत्तरप्रदेश समेत देश के मतदाताओं ने भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति को न सिर्फ नकारा था वरन् चुनाव में हराकर भाजपा को दंडित भी किया था।

उपचुनावों में उत्तरप्रदेश के अतिरिक्त गुजरात व राजस्थान में भी भाजपा को अच्छा खासा झटका लगा है। राजस्थान में चार विधानसभा सीटों में चुनाव हुए थे। पिछले आम चुनाव में इन चारों सीटों से भाजपा के उम्मीदवार चुने गये थे। जिन चार सीटों में उपचुनाव हुये वे थीं सूरजगढ़, वैर, नसीराबाद और कोटा दक्षिण। इनमें से कोटा दक्षिण को छोड़कर बाकी तीन सीटें भाजपा से छीनकर कांग्रेस ने जीतीं। जानकार पर्यवेक्षकों के अनुसार पिछले दिनों राजस्थान की भाजपा सरकार ने कुछ जनविरोधी फैसले किये हैं। उनके प्रति वहां के मतदाताओं ने अपना आक्रोश प्रगट किया। वहां की मुख्यमंत्री रानी वसुंधरा राजे की कार्यप्रणाली के विरूद्ध भी राजस्थान के मतदाताओं ने अपना आक्रोश प्रगट किया है। भाजपा और विशेषकर नरेन्द्र मोदी को सबसे गंभीर झटका गुजरात ने दिया। गुजरात में नौ विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुये। इन सभी नौ सीटों पर भाजपा का कब्जा था। परंतु उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को अपदस्थ कर तीन सीटें जीत लीं। ये जीतें बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन सीटों पर भाजपा की हार का अर्थ नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत हार है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि जहां उत्तरप्रदेश में भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति हारी, राजस्थान में भाजपा मुख्यमंत्री रानी वसुंधरा की नीतियां और कार्यशैली हारी है और गुजरात में नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और तथाकथित विकास का माॅडल हारा है।

लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से कुछ ऐसी बातें कहीं गईं जिन पर देश के जागरूक मतदाताओं ने चिंतन अवश्य किया होगा। इस दरम्यान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. भागवत ने अनेक आपत्तिजनक बातें कहीं। जैसे उनने कहा कि भारत के सभी निवासी हिन्दू हैं। डा. भागवत ने यह भी कहा कि हिन्दुओं की एकजुटता से ही देश की रक्षा हो सकती है। अपने इस तर्क से संघ प्रमुख ने यह संदेश दिया कि भारत की रक्षा में मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बुद्ध और जैनियों की कोई भूमिका नहीं है। इस तरह के बयानों का भी मतदाताओं पर असर पड़ा होगा। इन उपचुनावों का सबसे बड़ा सबक यह है कि आम लोग इस देश में सौहार्द, दोस्ती, सद्भावना का वातावरण चाहते हैं और जो इस धर्मनिरपेक्ष वातावरण को दूषित करते हैं उसे वे नकार देते हैं। इस वातावरण को सुदृढ़ बनाने मंे कांग्रेस की प्रमुख भूमिका है। कांग्रेस में ही धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक तत्वों को नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता है। यदि अगले चुनावों में भी मतदाताओं ने इसी तरह का रवैया अपनाया तो नरेन्द्र मोदी का भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने का सपना पूरा नहीं हो पायेगा।

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in