हिन्दू राष्ट्र की सुरसरी के पीछे की राजनीति

1:40 am or August 31, 2014
Aum Namah Shivah

ह सच है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लक्ष्यों में भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने का लक्ष्य उसकी स्थापना के समय से ही रहा है, और यही कारण है कि देश के, भाजपा को छोड़ कर, सभी राजनीतिक दल उनके विचारों से असहमत रहे हैं। इसी कारण से दक्षिणपंथी और क्षेत्रीय दलों के बीच भी भाजपा अछूत रही है और उसका साथ किसी विशेष मजबूरी या सत्ता के लालच में ही अवसरवादी दलों या व्यक्तियों द्वारा लिया या दिया गया है। जब पहली बार केन्द्र में गैर काँग्रेसी सरकार बनने की नौबत आयी थी तब भी उन्हें अपने दल को विलीन कर जनता पार्टी में समाहित होने के लिए कहा गया था और उन्होंने दूरगामी कूटनीति को देखते हुये ऐसा किया भी था। उल्लेखनीय है कि इस दौरान वे जनता पार्टी के साथ भितरघात कर रहे थे जिसे पहचान कर ही राजनारायण और चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी टूटने और सरकार गिरने की कीमत पर भी उन्हें बहिष्कृत किया था। स्मरणीय है कि मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने भी उस समय आपात काल के खिलाफ एकजुट हुयी जनता पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था किंतु उसमें भाजपा के सम्मलित होने के कारण सरकार में साथ होने से साफ इंकार कर दिया था।

              जब 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अल्पमत सरकार बनी थी तब उसे बहुमत के लिए मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी और भाजपा दोनों के ही समर्थन की जरूरत थी तब माकपा ने इसी शर्त पर समर्थन दिया था कि भाजपा को सरकार में न शामिल किया जाये। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनते समय भी बाइस दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी थी और सभी ने संघ के एजेंडे को ही नहीं अपितु भाजपा के भी तीनों विवादास्पद मुद्दे छोड़ने की शर्त के साथ ही अपना समर्थन दिया था। लोकसभा में उस समय के बड़े दल तेलगुदेशम ने तो स्पष्ट कहा था कि वे काँग्रेस को सरकार बनाने से रोकने के लिए ही समर्थन दे रहे हैं पर वे सरकार में सम्मलित नहीं होंगे। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के विशेष अनुरोध पर उन्होंने अपने सांसद बालयोगी को लोकसभा के अध्यक्ष पद को स्वीकारने की अनुमति दी थी और उनके असामायिक निधन के बाद दूसरे किसी सदस्य को न तो अध्यक्ष बनाना स्वीकारा था और न ही सरकार में सम्मलित हुये थे।

               यह आंकड़ागत विडम्बना ही है कि इकतीस प्रतिशत मत पाकर भाजपा को इस लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिल गया है, पर देश के उक्त मूलभूत प्रश्नों पर अभी भी उनहत्तर प्रतिशत लोग उनके साथ नहीं हैं और कभी भी नहीं होंगे। देश के सभी समाचार पत्र जिस बात को चुनाव परिणामों के बाद से ही कहते आ रहे थे उसे हाल ही में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी ने भी कहा है कि भाजपा की यह विजय नकारात्मक है और यूपीए सरकार के विरोध में पड़े मतों के कारण है। उनकी इस बात का मतलब साफ है कि संघ परिवार को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि उन्हें उनके मुद्दों पर देश की जनता ने समर्थन दिया है। उल्लेखनीय यह भी है कि भाजपा के दो सौ बयासी सांसदों में से एक सौ सोलह काँग्रेस या गैरसंघ की पृष्ठभूमि के लोग हैं और वे उस तरह से नहीं सोचते जिस तरह से संघ से निकले लोग सोचते हैं।

                विचारणीय है कि श्री भागवत जो बहुत ही चतुर और सूचनासम्पन्न व्यक्ति माने जाते हैं. ने अचानक ही यह हिन्दू राष्ट्र का राग क्यों छेड़ दिया। सच तो यह है कि भाजपा को गत लोकसभा चुनावों में ऐसी सफलता मिल गयी जो उनके लिए भी अप्रत्याशित थी। वे पूर्ण समर्थन न होने के बहाने से अपने अनेक वादे टालने की रणनीति अपनाते रहे हैं, और इस बार भी ऐसी ही उम्मीद में उन्होंने अनेक न पूरे हो सकने वाले वादे कर दिये थे, जैसे कि उमा भारती ने ही कह रखा था कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनते ही तीन महीने के अन्दर बुन्देलखण्ड राज्य की घोषणा हो जायेगी। इस बहुमत ने उन्हें धर्म संकट में ला छोड़ा है इसलिए वे देश में तेजी से मुद्दे बदलने के षड़यंत्र में जुट गये हैं। सरकार बनने के बाद समस्याएं दूर होना तो दूर की बात है पर जनता की समस्याएं और बढ गयी हैं और अपेक्षाकृत विकसित राजनीतिक चेतना व सूचना माध्यमों के प्रसार के कारण गत दो महीनें में ही जबरदस्त निराशा फैली है। हिन्दू राष्ट्र के नाम पर न केवल मुसलमान और ईसाई ही सशंकित होते हैं अपितु सिख, जैन, बौध्द, समेत धर्मनिरपेक्षता के सभी पक्षधर भी चौंकने लगते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में एक छोटी सी चिनगारी भी साम्प्रदायिक टकराव में बदल जाती है। यह अनायास नहीं है कि केन्द्र में भाजपा सरकार आने और जन समस्याओं के बढने के बाद दो महीने में ही साम्प्रदायिक टकराव की छह सौ से अधिक घटनाएं घट चुकी हैं।

                 हिन्दू राष्ट्र जैसे नारे देश में न केवल वर्गीय चेतना को ही कमजोर करते हैं अपितु सरकार के जनविरोधी कदमों के खिलाफ जनता के राजनीतिक प्रतिरोध की दिशा को भी भटकाते हैं। उल्लेखनीय है कि कभी नोबुल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमृत्य सेन ने हिन्दू राष्ट्र की बात करने वालों से कहा था कि भारत इतिहास के किसी भी काल में हिन्दू राष्ट्र नहीं रहा और यहाँ इतिहास में एक भी हिन्दू सम्राट नहीं हुआ। हिन्दू को हिन्दुस्तानियों का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता और इसे भारतीय या इंडियन की जगह प्रयोग में नहीं लाया जा सकता क्योंकि व्यवहार में इस शब्द का प्रयोग एक धर्म विशेष के लिए किया जाता है। यह बात श्री भागवत अच्छी तरह जानते हैं और पिछले चुनावों में जिस तरह से संघ ने राजनीति में खुलकर भाग लिया उससे कहा जा सकता है कि इस मामले में भी वे राजनीति ही कर रहे हैं।

by वीरेन्द्र जैन

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