दागी सांसदों के प्रकरणों में समयबध्द फैसलों का दबाव

12:52 pm or June 30, 2014
300620142

वीरेन्द्र जैन-

ह विडम्बना है कि एक ओर न्याय पालिका को सभी सर्वोच्च सम्मान देने की बात करते हैं और दूसरी ओर उसी न्याय व्यवस्था को दोषपूर्ण भी मानते हैं। खेद है कि जिस विधायिका को न्याय व्यवस्था में निहित दोषों को दूर करने के लिए सुधारात्मक कानून बनाने या बदलने चाहिये उसके भी बहुत सारे सदस्य न्यायपालिका के दोषों से लाभान्वित होकर वांछित बदलाव के प्रति उदासीन रहते हैं। जिन राजनेताओं पर अपराधिक प्रकरण चल रहे होते हैं वे भी यह कहते हुये पाये जाते हैं कि उन्हें न्याय व्यवस्था में पूरा भरोसा है, और बाद में जब वर्षों बाद उनका फैसला आता है तो लगता है कि शायद उनका भरोसा न्याय को लम्बित करने की प्रक्रिया में रहा होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने हमारे माननीय दागी सांसदों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण फैसला दिया थाद्य सुश्री लिली थामस और लोक प्रहरी एस एन शुक्ला द्वारा दायर जनहित याचिका पर 10 जुलाई 2013 को दिये इस महत्वपूर्ण एतिहासिक फैसले मे कहा गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8ख्1, 8ख्2, और 8ख्3, के अंतर्गत दोषी पाये जाने वाले विधायकों, सांसदों, की सदस्यता तत्काल रद्द हो जायेगी और उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया जायेगा। अधिनियम की धारा 8ख्1, दोषी पाये जाने पर अयोग्य घोषित करती है तो धारा 8ख्2, उन अपराधों के विस्तार को बतलाती है जिनके अंतर्गत दोषी पाये जाने पर अधिनियम लागू होगा। धारा 8ख्3, कहती है कि किसी भी उक्त अपराध में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने पर तुरंत अयोग्य घोषित किया जायेगा और रिहाई की तारीख के बाद से अगले छह वर्षों तक के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जायेगा। इस फैसले के बाद हाल ही में राजनीति के एक बड़े खिलाड़ी श्री लालू यादव को चुनाव लड़ने तक की पात्रता से वंचित होना पड़ा था।

एक गैर सरकारी संगठन ”पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन” द्वारा दायर जनहित याचिका पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने हाल ही में 10 मार्च 2014 को दिये अपने फैसले में सभी निचली अदालतों को निर्देश दिया कि जो अपराध उपरोक्त धाराओं के अंतर्गत मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ तय किये गये हैं उनके मुकदमे शीघ्रता से निपटाये जायें। उनका आदेश है कि किसी भी मामले में आरोप तय होने में एक वर्ष से अधिक का समय नहीं लेना चाहिये। इस समय सीमा को देखते हुये प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई करना चाहिये। उल्लेखनीय है कि इसी निर्णय के आलोक में चुनाव प्रचार के दौरान श्री नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि वे सरकार बनने की स्थिति में माननीय सुप्रीम कोर्ट से निवेदन करेंगे कि जिन सांसदों पर कोई प्रकरण दर्ज हैं उनका फैसला एक साल के अन्दर करने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना करें। विडम्बना यह थी कि उनकी पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाने से पहले चुनाव प्रचार की कमान सौंप दी थी पर उन्होंने उम्मीदवारों का चयन करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा था कि दागियों को टिकिट ही न मिले। बहरहाल राहुल गाँधी द्वारा इस अधिनियम में परिवर्तन वाले विधेयक को फाड़ कर फेंक देने के बाद यह मुकाबले का बयान था और चुनाव प्रचार के दौरान यह एक उत्ताम वादा था। इन पंक्तियों के लेखक ने कई वर्ष पूर्व अपने कुछ लेखों में ऐसे ही विचार व्यक्त करते हुये लिखा था कि जब हमारे माननीय सांसदों को इतनी सारी विशिष्ट सुविधाएं मिलती हैं तो देश हित में उन्हें त्वरित न्याय की सुविधा भी मिलनी चाहिए ताकि कानून बनाने वाले हाथ कम से कम कानूनी रूप से तो साफ सुथरे हों। नये नेतृत्व ने जो उम्मीदों के पहाड़ खड़े किये हैं उनमें से यह सबसे पहला काम होना चाहिये था जिस पर कार्यवाही अभी तक प्रतीक्षित है।

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि जिन माननीय सांसदों ने चुनाव का फार्म भरते समय दिये जाने वाले शपथपत्र में अपने ऊपर दर्ज आपराधिक प्रकरणों की जानकारी दी है उन सांसदों की संख्या पिछले चुनावों की तुलना में बढ गयी है। पुन: चुने गये सांसदों में से अनेक पर भी पुराने प्रकरण वर्षों से वैसे के वैसे चले आ रहे हैं। न्यायिक प्रक्रिया के लम्बित होने से दोषी पक्ष लाभान्वित होते अधिक पाया जाता है। जिन सांसदों पर देश को चलाने व कानून बनाने की जिम्मेवारी है, उन्हें यह एक और विशेष सुविधा मिलने से न्यायिक भेदभाव का तर्क बेमानी है क्योंकि माननीय सांसद पहले से ही वीआईपी श्रेणी में आते हैं, और अपनी जिम्मेवारी के कारण अन्य कई विशिष्ट सुविधाएं पाते हैं जिन पर कोई विवाद नहीं है। इससे पहले कि वे कानून बनाने में सहयोग दें उनके चरित्र और उनकी कानून बनाने की पात्रता के बारे में फैसला होना देश हित में ही होगा।

आइये माननीयों द्वारा दिये गये शपथपत्रों के आधार पर ऑंकड़ों से उस परिदृश्य को देखें। इस समय दो सांसदों के त्यागपत्र और एक सांसद के निधान के कारण कुल 540 चयनित सदस्य हैं। इनमें से 186 सांसदों ने अपने शपथपत्र में उनके ऊपर दर्ज प्रकरणों की जानकारी दी है। इनमें से 57 सांसदों, अर्थात कुल संख्या के 11 प्रतिशत सांसदों ने आरोप तय होने अर्थात चार्ज फ्रेम होने की जानकारी शपथपत्र में दी है। ऐसे सांसदों का दलगत विवरण इस प्रकार है-

          भारतीय जनता पार्टी   24

          शिवसेना                       5

          एलजेपी                         1

          स्वाभिमान पक्ष             1

          एआईडीएमके                5

          तृणमूल कांग्रेस             4

          आरजेडी                       3

          सीपीआई एम               2

          काँग्रेस                         1

          जेमएम                       1

          एनसीपी                      1

          पीएमके                       1

          आरएसपी                    1

          बीजेडी                         1

          एआईएमईएम             1

          टीआरएस                    1

          स्वतंत्र                         2

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सवाल उठता है कि सर्वाधिक दागी सांसदों वाली भाजपा सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की भावना को देखते इस पर शतप्रतिशत पालन करेगी या किसी कानूनी छेद से निकलने का रास्ता तलाशेगी, क्योंकि उसने 31 प्रतिशत मत पाकर 51 प्रतिशत सीटें जीती हैं। उल्लेखनीय है कि भाजपा के उक्त चौबीस दागी सांसदों में सुश्री उमा भारती, श्री लाल कृष्ण अडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी, बृजभूषण शरण सिंह, महेश गिरि, नलिन कुमार कतील, सुरेश अंगदी, गणेश सिंह, सतीश दुबे. लल्लू सिंह, बी श्रीमालु. नाथुभाई जी पटेल. सुशील कुमार सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते, बिशन पद राय, प्रभु भाई नागर भाई वसावा, अश्विन कुमार, उदय प्रताप सिंह, कर्नल सोना राम, और कीर्ति आजाद शामिल हैं। इनमें से उमा भारती को तो केबिनेट मंत्री का पद भी दिया गया है। इसी तरह शिव सेना, लोक जनशक्ति पार्टी, स्वाभिमान पक्ष, आदि के सांसदों का फैसला भी एक साल में हो जाना होगा।

किसी सांसद स्तर के नेता पर प्रकरण दर्ज होना और आरोप तय होने का अर्थ प्रकरण का मजबूत होना माना जाता है। यही कारण है कि किसी सांसद ने अपने ऊपर चल रहे प्रकरणों में जल्दी फैसले की माँग नहीं की। स्मरणीय है कि श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित होने से पहले चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन बनाये गये थे और टिकिट वितरण का काम उन्होंने ही किया था। उक्त दागी लोगों को भी टिकिट उन्होंने ही दिया था, अब यदि फैसला तय समय में हुआ और ज्यादातर सांसदों को सजा हो गयी तो इन क्षेत्रों में पुन: चुनाव में जाना होगा और हाल ही में देखी गयी निराशा को देखते हुये तब तक किये हुये वादों और सपनों को पूरा करने का दबाव अधिक होगा।

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