नालंदा से फिर बहेगी ज्ञान की गंगा

3:55 pm or May 5, 2014
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अरविंद जयतिलक  –

तिहासिक रुप से प्रसिध्द बौध्द शिक्षा केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय से एक बार फिर ज्ञान की गंगा बहेगी। विश्वविद्यालय का निर्माण उसी स्थान पर हो रहा है जहां इस ऐतिहासिक अकादमिक स्थल के भग्नावशेष मौजूद हैं। संभवत: अगले सत्र से पठन-पाठन भी शुरु हो जाएगा। सुखद बात यह है कि पिछले दिनों पूर्वी एशियाई सम्मेलन के दौरान आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, कंबोडिया, ब्रुनेई, न्यूजीलैंड, लाओ पीडीआर और म्यांमार इत्यादि देशों ने विश्वप्रसिध्द नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्स्थापित करने से जुड़ी परियोजना में मदद का भरोसा दिया। सिंगापुर ने 60 लाख डॉलर, आस्टे्रलिया और चीन ने 10-10 लाख डॉलर देने की बात कही। इस सहयोग से दक्षिण एवं दक्षिण्ा-पूर्व एशिया में सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा मिलेगा और नालंदा पुन: अपने पुराने गौरव को हासिल करेगा। चीन, जापान, कंबोडिया, इण्डोनेशिया, लाओस, मलेशिया, फिलीपींस, श्रीलंका, कोरिया, वियतनाम और थाईलैंड का भारत से गहरा ऐतिहासिक सांस्कृतिक लगाव रहा है। यह तथ्य है कि मौजूदा दौर में पहले जैसा मधुर संबंधा नहीं है। लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर संबंधों को सकारात्मक आयाम दे सकता है। 5 वीं शताब्दी से लेकर 7 वीं शताब्दी के मधय तक नालंदा विश्वविद्यालय अपनी ज्ञान ज्योति से संपूर्ण संसार को आलोकित करता रहा। कालांतर में वैष्णव धर्म का उत्थान, विश्वविद्यालय को मिलने वाली अनुदान में कमी और विदेशी आक्रमणों ने इस महान शिक्षा केंद्र को धूल-धुसरित कर दिया। 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 एपीजे अब्दुल कलाम ने इस प्रतिष्ठित संस्थान को पुनर्स्थापित करने का विचार दिया और केंद्र सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय पुनर्स्थापना से जुड़े विधोयक को राज्यसभा से पारित कराया। विश्वविद्यालय पुनर्स्थापना से जुडी इस परियोजना में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन के अलावा कई अन्य ख्यातिलब्धा अंतर्राष्ट्रीय विद्वान शामिल हैं। भौगोलिक रुप से नालंदा दक्षिणी बिहार स्थित राजगिरि के समीप है और इसके धवंसावशेष आज भी बड़ागांव गा्रम तक फैले हुए हैं। इस विश्वविद्यालय का निर्माण कब हुआ विद्वानों में एक राय नहीं है। लेकिन इसकी प्राचीनता पर किसी को शक भी नहीं। गुप्तवंशी शासक कुमार गुप्त (414 से 455) द्वारा इस बौध्द शिक्षा केंद्र को दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। चीनी यात्री ह्नेनसांग ने भी अपने विवरण में लिखा है कि 470 ई0 में गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालंदा में एक सुंदर मंदिर निर्मित करवाकर इसमें 80 फीट ऊंची तांबे की बुध्द प्रतिमा को स्थापित करवाया।

चीनी यात्री इत्सिंग के विवरण से भी नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भरपूर जानकारी मिलती है। उसने इसकी विशालता का उल्लेख करते हुए यहां छात्रों की संख्या 3000 बताया है। इत्सिंग के विवरण में नालंदा के अलावा विक्रमशिला विश्वविद्यालय का भी जिक्र है। 8 वीं शताब्दी में पालवंशीय शासक धर्मपाल द्वारा बिहार प्रांत के भागलपुर में विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। पूर्व मधयकालीन भारत में इस विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण स्थान था। इस विश्वविद्यालय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली भिक्षु दीपंकर ने 200 ग्रंथों की रचना की। जिस समय चीनी यात्री ह्नेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहा था, उस समय विद्यार्थियों की संख्या करीब 10000 और शिक्षकों की संख्या 1500 थी। यह इस बात का प्रमाण है कि नालंदा विश्वविद्यालय अति विशाल था। उल्लेखनीय है कि ह्नेनसांग कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। उसने करीब 10 वर्षों तक भारत का भ्रमण किया और लगभग 6 वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अधययन किया। उसके ग्रंथ सी-यू-की से तत्कालीन भारतीय समाज व संस्कृति के बारे में भरपूर जानकारी मिलती है। ह्नेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षक परिवार का हिस्सा भी था। कहा जाता है कि वह अपने साथ भारत से कोई 150 बुध्द के अवशेषों, सोने, चांदी, व संदल द्वारा बनी बुध्द की मूर्तियां और 657 पुस्तकों की पाण्डुलिपियों को ले गया था। यह भगवान बुध्द में उसकी आस्था का प्रमाण है। महान विद्वान शीलभद्र नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन्होंने अपने ज्ञानपूंज से नालंदा विश्वविद्यालय को जगत प्रसिध्द किया। ह्नेनसांग ने अपने विवरण में अपने समय के महान विद्वान शिक्षकों- धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणपति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र, आर्यदेव, दिगनाग और ज्ञानचंद्र इत्यादि का उल्लेख किया है। ये शिक्षक अपने विषयों के साथ-साथ अन्य विषयों में भी पारंगत, निपुण और ज्ञानवान थे। नागार्जून, असंग, वसुबंधु जैसे महान बौध्द महायानी इसी विश्वविद्यालय की उपज थे। असंग की महायान सूत्रालंकार, वसुबन्धाु का अभिधर्म कोष और नागार्जुन की दिव्यावदान, महावस्तु, मंजूश्रीमूलकल्प, प्रज्ञापारमिता, शतसाहस्त्रका और माधयमिका सूत्र जैसी रचनाएं नालंदा विश्वविद्यालय के ज्ञान की ही देन है। नालंदा विश्वविद्यालय में बौध्द धर्म एवं दर्शन के अतिरिक्ति न्याय, तत्वज्ञान, व्याकरण एवं विज्ञान की भी शिक्षा दी जाती थी। विश्वविद्यालय प्रशासन जिना कठोर था, शिक्षा को लेकर उतना ही जागरुक, संवेदनशील और सतर्क था। यह इसी से समझा जा सकता है कि प्रवेश के इच्छुक विद्यार्थियों को पहले द्वारपाल से वाद-विवाद करना पड़ता था और फिर उसमें उत्तीर्ण होने पर ही उन्हें प्रवेश मिलता था। छात्रों को रहने के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध थी। विश्वविद्यालय को चलाने के लिए राजाओं द्वारा विशेष अनुदान दिया जाता था। लेकिन विश्वविद्यालय के संचालन में उनका किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं था। आश्चर्य यह कि बौध्द धर्म न अपनाने वाले शासक भी इस विश्वविद्यालय को भरपूर अनुदान देते थे। यह शिक्षा के प्रति उनकी अनुरक्ति को ही रेखांकित करता है। विश्वविद्यालय को सुचारु रुप से चलाने के लिए हर्षवर्धन ने 200 ग्रामों का अनुदान दिया था जिससे पर्याप्त राजस्व प्राप्त होता था। वैष्णव धर्म के अनुयायी गुप्त शासक भी नालंदा विश्वविद्यालय को भरपूर अनुदान देने में अपना गौरव समझते थे। नालंदा विश्वविद्यालय का प्रांगण बहुत बड़ा था। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से जानकारी मिलती है कि विश्वविद्यालय में व्याख्यान हेतु छोटे-बड़े कई कमरे थे। पुरातत्वविदों का निष्कर्ष है कि यहां 7 बड़े और तकरीबन 300 से अधिक छोटे कक्ष थे। शैलेन्द्र शासक बालपुत्र देव द्वारा तत्कालीन मगध के राजा देवपाल की अनुमति से नालंदा में जावा से आए भिक्षुओं के निवास के लिए एक विहार के निर्माण का भी उल्लेख है। इस अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय में भारत के अलावा जावा, चीन, तिब्बत, श्रीलंका, एवं कोरिया के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। विद्यार्थियों के बीच बौध्द दर्शन के अलावा अन्य विषयों इतिहास, भूगोल, तर्कशास्त्र और विज्ञान पर भी वाद-विवाद होता था। लेकिन बौध्द धर्म की महायान शाखा का विशेष रुप से अधययन-अधयापन होता था। शिक्षा पालि भाषा में दी जाती थी। यहां हस्तलिखित ग्रंथों का एक नौ मंजिला ‘धर्मगज’ नामक पुस्तकालय था जो तीन बड़े भवन रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नाम से विभाजित था। समय की जानकारी के लिए जलघड़ी का उपयोग होता था। इस महान बौध्द शिक्षा केंद्र का विनाश कैसे हुआ इस पर अभी भी धुंध छाया हुआ है। हालांकि इसकी ऐतिहासिकता को जानने के लिए पुरातत्व विभाग ने कई बार उत्खनन कराया लेकिन किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा। बहरहाल नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना से भारत समेत संपूर्ण दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में मदद मिलेगी।

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