संवैधानिक पदों की गरिमा की अनदेखी

12:22 pm or October 6, 2014
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-विजय कुमार जैन –

भारत में यह परम्परा बन गई केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही राज्यों में संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह कर रहे राज्यपालों को पद से त्याग पत्र देने कहा जाता है, कहना नहीं मानने पर बडे राज्यों से छोटे राज्यों में स्थानांतरित कर दिया जाता है तथा पद से पृथक भी कर दिया जाता है। केन्द्र में सत्ता परिवर्तन होते ही नरेन्द्र मोदी सरकार के सौ दिन पूर्ण होने तक देश के आठ राज्यपालों को पद से त्यागपत्र देने मजबूत किया गया। गुजरात की राज्यपाल कमला वेनीवाल को पहले मेघालय स्थानांतरित किया गया। फिर त्याग पत्र नहीं दिये जाने पर वर्खास्त किया गया।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने जिन राज्यपालों को हटाया वे सभी पिछली मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में पदस्थ थे राज्यपाल त्याग पत्र देने तैयार नहीं हुए तो उन्हे छोटे राज्यो में स्थानांतरित कर दिया, इसके बाद उन्हें वर्खास्त कर पद से हटाया। इस प्रकार सरेआम केन्द्र सरकार द्वारा संबैधानिक पद की गरिमा को तार-तार कर दिया। इस पद को सत्ताधारी दल द्वारा राजनीतिकरण कर दिया है। सरकार के बदलने ही सत्ताधारी दल द्वारा राज्यपालों को दूध में मक्खी की तरह निकाला जा रहा है।

भारत में आजादी के बाद बने संविधान में संविधान निर्माताओं ने प्रावधान किया हैं भारत का एक राष्ट्रपति होगा, जिसमें संग की कार्यपालिका शक्ति निहित होगी। राष्ट्रपति इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा। इसी प्रकार संविधान में प्रावधान किया गया प्रत्येक राज्य के लिये राज्यपाल होगा वह राज्य की कार्यपालिका शक्तियों का प्रमुख होगा। वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव तो निर्धारित चुनाव प्रक्रिया द्वारा किये जाने का प्रावधान है। राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिये संविधान में विशेष नियम बनाये गये है। संविधान में उल्लेख किया है। भारत के राष्ट्रपति संविधान के अनुरूप कार्य नहीं करे अथवा पद का दुरूपयोग करे तानाशाह बन जाये तो उनके विरूद्ध महाभियोग चलाकर पद से हटाया जा सकता है। प्रदेश के राज्यपाल के विरूद्ध इस प्रकार का कोई कानूनी प्रावधान भारत के संविधान में नहीं है। संविधान की व्यवस्था के अनुसार राज्यपाल केवल राष्ट्रपति की कृपा तक अपने पद पर रह सकेगा। सामान्य परिस्थिति मे राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का है। इसके पूर्व राष्ट्रपति चाहे तो राज्यपाल को पद से हटा सकते है। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति एवं राज्यपाल संघ एवम् राज्य के कार्यपालिका के प्रमुख होते हे। किन्तु कानूनी शिथिलता के कारण राज्यपाल का पद पूर्णतः केन्द्र सरकार की कृपा का पद बन गया है। केन्द्र सरकार द्वारा राज्यपाल पद पर सत्ताधारी दल के उन वरिष्ट नेताओं जिनको सक्रिय राजनीति से हटाया जाता है उनकी नियुक्ति की जाती है अथवा सेवा निवृत लोक सेवकों को राज्यपाल के पद पर आसीन कर उपकृत किया जाता है स्पष्ट है वही राज्यपाल बन सकता है जो केन्द्र सरकार अथवा सत्तादल का कृपा पात्र है।

राज्यपालों के साथ पहली बार एैसा नहीं हुआ है जब-जब केन्द्र में सरकार बदलती है नई सरकार पिछली सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों को हटाकर अपनी पसंद के राज्यपालों की नियुक्ति करती है। हम यहाँ पर यह उल्लेख करना चाहिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिये निर्देशों के अनुरूप सरकार बदलने पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछली यू.पी.ए. सरकार के शासन काल में नियुक्त किये गये राज्यपालों को उनके पद की गरिमा को ध्यान में रखकर शालीनता एवं मर्यादा पूर्ण तरीके से उनके पदों से हटायेंगे। किन्तु शीर्ष न्यायालय के आदेश की अनदेखी कर अमर्यादित तरीके से उन्हें पदों से हटाया गया। प्रावधान है किसी भी शासकीय सेवक को मनमानी से उसे पद से नहीं हटाया जा सकता। किसी शासकीय सेवक के साथ अमर्यादित कार्यवाही होती है तो भारत के संविधान में अनुच्छेद 311 में संरक्षण दिये जाने का प्रावधान है। विगत बर्षो एक बार लोकसभा मे एक सम्माननीय सदस्य ने जोर देकर कहा था राज्यपाल का पद सफेद हाथी के समान हो गया है। यह भी कहा था इस पद को समाप्त कर देना चाहिये। हम देखते है राज्यपाल का पद संवैधानिक हें उन्हें कार्यपालिका का प्रमुख होगा यह कहा गया है मगर उन्हें ऐसी कोई शक्ति प्राप्त नहीं है जिससे वह कार्य पालिका को नियंत्रित कर सके। आज तक राज्यपाल के पद की नई सिरे से समीक्षा नही की गई। भारी जूल खर्ची भरे इस पद को समाप्त करने सरकार इस लिये भी विचार नहीं कर रही कि इस पद पर राजनेताओं एवम् सेवा निवृत नौकर शाहों को पदस्थ कर उपकृत करने की एक परम्परा बन गई हैं।

हम जानते हैं राज्यपाल राज्य मे केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप मे कार्य करते है। अनेक बार राज्यों में ऐसी परिस्थिति बन जाती है जिसे हम संवैधानिक संकट कह सकते हैं उस समय केन्द्र सरकार द्वारा स्थिति पर रिपोर्ट राज्यपाल से मांगी जाती है ऐसी भी आलोचना होती रही है राज्यपाल से केन्द्र द्वारा वही रिपोर्ट देने को कहा जाता है जो सरकार को कदम उठाना होता है राज्यपाल की रिपोर्ट की कई बार तीव्र आलोचना होती रही है।

हाल ही में नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा देश की जिन राज्यपालों को हटाकर नियुक्तियाँ की गई उनमें भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं जिन्हे सक्रिय राजनीति से हटाया गया है उपकृत किया गया है इन सब नियुक्तियों मे केरल राज्य के राज्यपाल पद पर की गई नियुक्ति सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। केरल में राज्यपाल पद पर सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत मुख्य न्यायाधीश सत शिवम् की हुई है। इस नियुक्ति की चर्चा सारे देश में जोर शोर से हुई। मोदी सरकार के 100 दिन के कार्यकाल के निर्णयों की लिस्ट में जिन निर्णयों की आम जनता से मुखर एवम् कटु आलोचना की उनमें एक केरल राज्यपाल की नियुक्ति का निर्णय भी है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद गरिमामय पद है भारत के राष्ट्रपति को शपथ मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिलायी जाती है सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में दिये निर्णयों का पालन सारा देश एवं भारत के सभी न्यायालय सम्मान से मानते है वही व्यक्ति अब केन्द्र सरकार की कृपा से राज्यपाल नियुक्ति हुआ है उन्हे यह भी ज्ञात है जब तक केन्द्र सरकार की कृपा है वे इस पद पर तब तक ही रह सकेंगे। राज्यपाल पद पर इस नियुक्ति की सर्वत्र आलोचना हुई तो यह कहकर इस नियुक्ति को उचित बताया कि राज्यपाल का पद संवैधानिक है। राज्यपाल के संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्तियों को जब पद से हटाया तो क्या इस संवैधानिक पद का अपमान नहीं हुआ। न्यायमूर्ति द्वारा राज्यपाल का पद स्वीकार करना क्या न्यायपालिका के सर्वोच्च पद का अपमान नही है ? लोकतांत्रिक व्यवस्था मे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इनका समान दर्जा होता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इनमे से एक का प्रतिनिधित्व करते हैं अवकाश प्राप्ति के बाद उनके किसी दूसरे अंग के निम्नतर दर्जे पर उनका जाना कितना उचित होगा। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश राष्ट्रपति को शपथ दिलाते हैं इसी प्रकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल को शपथ दिलाते हैं। श्रेणी क्रम मे राज्यपाल का पद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश से नीचे आता है निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत मुख्य न्यायाधीश द्वारा राज्यपाल का पद स्वीकार किये जाने से अनेक विसंगतियाँ पैदा होगी। इस विन्दु पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए न्यायपालिका मे न्यायाधीश रह चुके व्यक्ति को सेवा निवृत होने पर राजनैतिक पद स्वीकार करना चाहिए या नही।

               संविधान की व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छा से राज्यपालों के मामलों में निर्णय नहीं ले सकते। राज्यपालों की नियुक्ति, स्थानान्तर या उन्हें पद से हटाने के मामलों में राष्ट्रपति को केन्द्रीय मंत्री परिषद के सलाह से कार्य करना होता है अथवा यह कह सकते है निर्णय मंत्री परिषद का होता है राष्ट्रपति तो मोहर लगाकर औपचारिकता पूर्ण कर देते है।

             राज्यपालों को हटाकर नये राज्यपालों की नियुक्ति मे मोदी सरकार ने नौकर शाहों को अप्रत्यक्ष रूप से सन्देश देने का प्रयास किया है जो नौकरशाह सरकार की इच्छा के अनुरूप कार्य करेंगे उन्हे भी भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत मुख्यन्यायाधीश की भांति विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ किया जायेगा। भाजपा एवम् नरेन्द्र मोदी ने लोक सभा चुनाव के पूर्व जोर शोर से कहा था हम सत्ता में आये तो सुशासन आयेगा।

             मगर संवैधानिक पदों की मर्यादायें समाप्त करने के इस कदम की सर्वत्र आलोचना हो रही है। इस कार्य को रोका जाना आवश्यक है। अन्यथा संवैधानिक पदों की मर्यादा एवं सम्मान समाप्त हो जायेगा।

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