मनुवादी तंत्र में क्यों ढूंढ़े दलित गणतंत्र

1:26 pm or October 6, 2014
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-राजीव यादव-

बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के पिछले दिनों मधुबनी के एक मंदिर में पूजा करने के बाद मंदिर को धुलवाने के बाद इस बात पर बहस हो रही है कि मुख्यमंत्री छुआछूत के शिकार हो गए। वहीं यूपी में बसपा के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्या के यह कहने कि शादियों में गौरी गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए, के बाद पार्टी सुप्रीमो मायावती ने मौर्या की निजी राय कहते हुए पल्ला झाड़ लिया। पर यह सवाल न यहां से शुरु होता है और न खत्म। भारतीय समाज में लगातार इन सवालों पर बहसें ही नहीं बल्कि आंदोलन भी हुए। अंबेडकर से पहले और पेरियार के बाद न सिर्फ यह सिलसिला कायम है, बल्कि मायावती जो भले आज इस सवाल से कन्नी काट रही हैं, उनके यूपी की सत्ता में कायम होने में भी इसी वैचारिकी की नींव रही है।

अब सवाल यह है कि आज क्यों इन सवालों से इन्हीं सवालों को उठाने वाले अपना नाता तोड़ रहे हैं? यह कोई राजनीतिक भटकाव हैं या फिर समाहित होने की प्रक्रिया जिसमें वो समाहित हो जाने में ही अपना हित समझते हैं।

दरअसल, जो राजनीति जाति या अस्मिता आधारित होती है उसका धर्म में समाहित हो जाने का खतरा हर वक्त बरकरार रहता है। तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार कहने वाले हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है, कहना इसी तरह नहीं शुरु कर दिए थे। यह सिर्फ हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के प्रति आकर्षण मात्र नहीं था बल्कि यह नरम हिन्दुत्व के प्रति आकर्षण था। हाथी आगे बढ़ता जाएगा, ब्राह्मण शंख बजाएगा कहते-कहते ‘हाथी’ उसी मनुवादी अहाते में चला गया, जहां से निकलने के लिए उसका संघर्ष था और हाथी को दिल्ली ले जाने वाले ‘विकास के रथ’ पर सवार होकर दिल्ली चले गए। यह एक हिन्दुत्वादी रणनीति थी, जो अस्मिता आधारित जातिवादी राजनिति को ‘नरम हिन्दुत्वादी’ राजनीति की तरफ लेकर चली गई और ‘सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय’ वाले भ्रम में रह गए। जो ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ कह देने मात्र से हल नहीं होगा।

ऐसे में कर्पूरी ठाकुर भागीदारी महासम्मेलन में बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या की बातों का विश्लेषण निहायत जरुरी हो जाता है कि वह भागीदारी की क्या रुपरेखा खींच रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुवादी व्यवस्था के लोगों ने शूद्रों का दिमाग नापने के लिए गोबर, गणेश का सहारा लिया। ऐसे डॉक्टर, इंजीनियर होने से क्या मतलब जो यह दिमाग न लगाए कि क्या गोबर का टुकड़ा भगवान के रूप में हमारा कल्याण कर सकता है? क्या पान-सुपारी खा सकता है? क्या पैसे ले सकता है, क्या पत्थर की मूर्ति दूध पी सकती है? उन्होंने ऐसा करवाकर बुद्धि नाप ली और मान लिया कि इनसे जो चाहो कराया जा सकता है। और आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा कि आज सिर्फ वैचारिक रूप से ही बात करने की जरूरत नहीं है, उसे व्यवहारिक रूप से जीवन में उतारने की भी जरूरत है।

इस पूरे बयान का विष्लेशण हमें उन भावनाओं जो किसी दलित के मंदिर में जाने के बाद आहत होकर उसका शुद्धिकरण करवाती है, से दूर हटकर सोचना होगा। और यह सिर्फ दलितों-पिछड़ों से जुड़ा सवाल नहीं है बल्कि यह राष्ट्र निर्माण का सवाल है, जो वैज्ञानिकता के बगैर अपूर्ण है।

दरअसल, दलित राजनीति जिसके मूल में मनुवादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था विरोधी स्वर थे, ने अपने समाज के लोगों में मनुष्य से मनुष्य के बीच भेद करने वाले इस विभाजनकारी विचार को चिन्हित करवाया था। उस राजनीति के भटकाव के बाद उस समाज का भटकाव कोई आष्चर्यजनक नहीं है, ये तो होना ही था। मौजूदा दलित राजनीति इस बात को भांप रही है कि सिर्फ कोरी वैचारिक बात करने से इसका हल नहीं होगा, बल्कि व्यवहारिकता में इसका क्रियान्वयन करना होगा। क्योंकि उससे दूर हुआ उसका जनमत जो ‘पत्थर को दूध पिलाने वालों’ के साथ चला गया है, से वापस लाए बगैर वह अपने अस्तित्व को नहीं बचा सकती। दलित राजनीति आज खास तौर पर दलित समाज में उभरे मध्यवर्ग के भ्रमित हो जाने को वह एक खतरे के रुप में चिन्हित कर रही है। लोकसभा चुनावों में इसी वर्ग ने भाजपा के प्रति आकर्षण का सबसे ज्यादा माहौल बनाया। ठीक यही प्रवृत्ति पिछड़ी जातियों में भी रही। मध्यवर्ग में शामिल हुआ वर्ग जो भाजपा के प्रभाव में आ रहा है, दरअसल वो उस हिन्दुत्वादी राजनीति की प्रक्रिया के तहत आया है, जो उसकी अस्मिता के सवाल को हल करने का दावा करती है। तो फिर ऐसे में वह दलित-पिछड़ा जो किसी वैचारिकता नहीं बल्कि अस्मिता के सवाल पर किसी माया-मुलायम के साथ गया था, वह क्यों उनके साथ रहेगा?

रही बात मायावती की तो इससे पहले भी वह पेरियार की मूर्ति के सवाल पर भाजपा के सामने घुटने टेक चुकी हैं। 2002 में भाजपा के सहयोग से चल रही बसपा सरकार द्वारा जब लखनऊ के अंबेडकर पार्क में पेरियार की मूर्ति को लगवाने की बात सामने आई तो, भाजपा, बजरंगल व अन्य हिन्दुत्वादी संगठनों ने विरोध किया। जिसके बाद मूर्ति नहीं लग पाई। पेरियार की मूर्ति एक मूर्ति नहीं बल्कि वह सशक्त् विचार है, जो भाजपा सरीखे संगठनों का भारतीय समाज में अस्तित्व में रहने को एक कलंकित भाव में देखता था। इसीलिए इस विचार से आतंकित संगठनों ने 2007 में ‘तीसरी आजादी’ नाम की एक सीडी का भी विरोध किया था।

वहीं बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी जो स्वयं के महादलित होने की वजह से समाज में बरती जा रही अष्पृष्यता व पूर्वाग्रह का शिकार खुद को कह रहे हैं, पर भी सवाल उठता है कि वो उस मंदिर में क्या करने गए थे? मांझी जब कहते है कि सोचिए हम कहां खड़े हैं, हम जातिवाद के घिर गए हैं तो उन्हें भी यह सोचना चाहिए कि मंदिर जहां वह गए थे, वह कोई भारतीय लोकतंत्र का कोई सदन नहीं, बल्कि मनुवादी व्यस्था के तहत संचालित वह सदन है, जिसके मूल विचार में दलितों का प्रवेश् वर्जित है। मांझी को उनके इस बयान के बाद उठ रहे उन सवालों कि उनके जाने के बाद, उनके आने की वजह से मंदिर नहीं धोया गया, बल्कि उन्होंने विधिवत मंत्रोचार में विधि विधान से पूजा की, से ज्यादा वहां जाने की अपनी वैचारिकी पर सोचना होगा। उनका यह कहना कि वह महादलित हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा हुआ, वह झूठ नहीं बोलते, उनको एक अपरिपक्व वैचारिक नेता के रुप में ही उन्हें स्थापित करता है।

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