मोदी अमेरिकी दौरे पर थे या चुनावी दौरे पर

1:41 pm or October 6, 2014
061020142

-विवेकानंद-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे को किस तरह देखा जाए? उस तरह जैसा की मीडिया ने दिन-रात मेहनत करके दिखाया या उस तरह जैसे कोई पिकनिक मनाने जाता है वहां कुछ लोगों से मिलजुल कर बात करके चला आता है। या फिर इस तरह से देखें कि ताकत और मौका मिलने के बाद व्यक्ति अपने आप को सर्वशक्तिमान की तरह प्रदर्शित करने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि मोदी के अमेरिकी दौरे में ऐसा विलक्षण कुछ भी नहीं हुआ जो चौंकाता हो,कि मोदी जी अमेरिका में यह बड़ी उपलब्धि हासिल करके आए हैं।

अपने देश से प्रेम करना, अपने नेता को सम्मान देना, उसे सुनना, खासतौर से परदेश में, ऐसा हो तो खुशी होना स्वाभाविक है। भारत में भी यह खुशी होनी चाहिए कि देश के प्रधानमंत्री का अमेरिका में ऐसा स्वागत हुआ जो आज तक किसी नेता को नसीब नहीं हुआ। लेकिन जब इसकी गहराई में जाते हैं तो भ्रम बढ़ता जाता है और अंत में भरोसा होने लगता है कि अमेरिका में जो चल रहा था वह सब पूर्व नियोजित था, खरीदा हुआ था, और इसलिए किया गया था ताकि इसका असर भारत में खासतौर से यहां होने वाले चार-पांच रायों के विधानसभा चुनाव में दिखाई दे। मेडिसन स्क्वायर पर नरेंद्र मोदी ने जो-जो कुछ कहा उसमें न को कोई वैश्विक संदेश था और न ही कोई दूरदर्शिता। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ अपनी पीठ थपथपाई। मोदी के भाषण को सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वे भारत में कोई चुनावी सभा कर रहे हों और बीजेपी के समर्थक ताली बजा रहे हों। मोदी ने विदेशी धरती पर जो कहा उसमें अधिकांश पुरानी बातें थीं। चाहे वह सांप और सपेरों वाली हों या युवाशक्ति का बखान हो। उनके वादे भी चुनाव जैसे ही थे। मसलन मोदी जी ने कहा कि भारत पूरी दुनिया को शिक्षक निर्यात कर सकता है। भारत में इतना पोटेंशियल है। यह वैसा ही वादा है जैसा अक्सर भारतीय नेता चुनावों में करते हैं,जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं होता। देश में शिक्षकों का अकाल पड़ा हुआ है और मोदी जी दुनियाभर में टीचर भेजने की बात कर रहे हैं। इसी साल संसद में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने बताया था कि प्राइमरी स्कूलों में और सर्वशिक्षा अभियान मिला कर कुल 6 लाख 6 हजार 191 शिक्षकों की पोस्ट खाली है। इसके अलावा आईआईटी, आईआईएम, एनएनआईटी मिला कर करीब चार हजार फैकल्टी पोस्ट वैकेन्ट है। देश की 39 सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के 16, 692 पोस्ट में से 6251 पोस्ट खाली है। यह कमी आज से नहीं बल्कि 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से देशभर में की जा रही थी। देश की इस हकीकत को जानने के बाद यह साफ हो जाता है कि मोदी जी केवल झांकी बना रहे थे और बीजेपी कार्यकर्ताओं की तरह फ्री टिकट देकर बुलाए गए लोग ताली बजा रहे थे। तालियों की गड़गड़ाहट से मोदी भी गदगद थे, इतने गदगद थे कि वे महात्मा गांधी का नाम ही गलत ले बैठे। इसे उनकी गलती नहीं माना जा सकता। क्योंकि बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जो महात्मा गांधी का पूरा नाम न जानते हों। निश्चित तौर पर वह भी बहुत खुश थे और उसी खुशी में गलती कर गए। बहरहाल, यह विमर्श का विषय नहीं है। ऐसा कई बार हो जाता है। जो लोग रोज मिलते-जुलते हैं कई बार उनका नाम लेने में भी गलती हो जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अमेरिका के सबसे महंगे मेडिसन स्क्वायर में जो कार्यक्रम आयोजित किया और जिस तरह से पूरे पांच दिन मीडिया ने सिर्फ अमेरिका दिखाया, उसके पीछे क्या है? मान लिया भारतीय अमेरिकियों में मोदी को लेकर दीवानगी है, लेकिन मीडिया को क्यों पूरे पांच दिन देश में कुछ होता नहीं दिखा। यह भी मान लिया कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और उनकी साख दुनियाभर में बढ़े यह अच्छी बात है। लेकिन उनके नाम पर घंटों सिर्फ रंगारंग कार्यक्रम लाइव दिखाया जाए, यह कौन सी पत्रकारिता है और इससे मोदी की इमेज कैसे सर्वशक्तिमान की हो सकती है। मेडिसन स्क्वायर पर होने वाले मोदी के कार्यक्रम के पहले उनके इंतजार में बड़ी देर तक गरबा और अन्य कार्यक्रम होते रहे, मीडिया इस दौरान देश की अन्य खबरें दिखा सकता था। लेकिन देश का पूरा का पूरा मीडिया उन नाचते गाते लोगों को दिखाता रहा। इससे संदेह होता है कि मीडिया को सिर्फ सकारात्मक दिखाने का ठेका दिया गया था।

आइए अब जरा देखें कि मोदी की जिस यात्रा को ऐतिहासिक बताया गया है उसमें मोदी ने क्या ऐतिहासिक काम किया है। सबसे पहले सकारात्मक दिखाने की होड़ में बताया जा रहा है कि मोदी ने डब्ल्यूटीओ को लेकर अमेरिका की बात नहीं मानी। यह कोई बहुत ऐतिहासिक बात नहीं है। एनडीए की पहली सरकार से लेकर यूपीए की दो सरकारों में भी यही होता रहा है। इसमें मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया जो अद्भुत हो। रक्षा समझौते को 10 साल के लिए बढ़ाया गया है, इसमें भी लाभ अमेरिका का ही है। अमेरिका वर्षों से यही प्रयास तो करता आ रहा है। यह तो अमेरिका के ही हित में गया। इसके अलावा सर्विस एटमी करार पर मोदी जी यह आश्वासन देकर आए हैं कि वे इसकी अड़चनें दूर करेंगे। यह अड़चने कैसे दूर होंगी, क्या इसे लेकर बनाए गए कानून में संशोधन किया जाएगा? क्या यूपीए सरकार ने दुर्घटनाओं की स्थिति में संबंधित कंपनियों को जिम्मेदार ठहराने के जो नियम बनाए थे उन्हें कमजोर किया जाएगा। मोदी जी जो आश्वासन देकर आए हैं, उनसे यही प्रतीत होता है। तो सवाल यह है कि इसमें भारत का लाभ क्या हुआ। यह तो अमेरिका का ही लाभ हुआ। अमेरिका हमेशा से चाहता है कि भारत में कोई हादसा होने पर अमेरिकी कंपनियों को जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इसके अलावा आतंकवाद पर भी बात हुई। बताया गया कि दोनों देश आतंक के खिलाफ साथ मिलकर लड़ेंगे। यह अधिक बताया जा रहा है कि अमेरिका दाउद इब्राहिम को पकड़ने में मदद करेगा। यह सब बताता है कि किस तरह सबकुछ अच्छा दिखाने की कोशिश की जा रही है। जबकि असल बात यह है कि अमेरिका हमेशा ही आतंक से जंग में भारत को अहम सहयोगी बताता रहा है। लेकिन कोई एक ऐसा मौका नहीं है जब भारत को सबसे यादा आतंकी हमलों से पीड़ित करने वाले पाकिस्तान के प्रति उसने सख्त रुख दिखाया हो। नरेंद्र मोदी जी ने अमेरिका में पाकिस्तान को भले ही कड़े शब्दों में कश्मीर का जिक्र बार-बार न करने की हिदायत दी हो। लेकिन अमेरिका के साथ आतंक से लड़ाई में सहयोगी बनने की सहमति के बीच पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया गया। इन तमाम पहलुओं को देखने के बाद यह कैसे माना जा सकता है कि अमेरिका का यह दौरा ऐतिहासिक था।

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