निरंकुशता और निराशावाद की अभिव्यक्ति है मोदी का ‘दैवीय अधिकार’

6:35 pm or May 5, 2014
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-अनिल यादव-

प्रसिध्द दार्शनिक हीगल ने कहा था कि राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का रूप है। यह विचार निरंकुश शासन प्रणाली का आधार बना और इतिहास के बहुत सारे तानाशाहों ने अपने शासन का आधार ‘ईश्वर की इच्छा’ को बनाया। इसी संदर्भ में यदि इतिहास की धारा में थोड़ा और पीछे जाया जाए, तो हम देखते हैं कि भारत के मध्यकाल के दिल्ली सल्तनत काल में गयासुद्दीन बलवन ने भी अपने तानाशाही के अस्तित्व को स्थापित करने तथा इस्लामी शासन प्रणाली, जो एक तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यों की तरफ बढ़ रही थी, को रोकने के लिए अपने राजत्व के सिध्दांत को प्रतिपादित किया। वस्तुत: ‘बैय्यत’ तो इस्लामी शासन प्रणाली का मूल तत्व था (बैय्यत का अर्थ सरदारों की सहमति है)। बैय्यत को समाप्त करने के लिए बलवन ने घोषणा की कि वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, इसलिए उसके शासन के लिए किसी की सहमति की आवश्यकता नही है। यह सत्य है कि इतिहास अपने आप को नहीं दोहराता है परन्तु, उसकी प्रतिधवनि को हम अक्सर महसूस करते हैं। आज जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि ईश्वर कठिन कार्यों के लिए लोगों को पसंद करता है और उन्हें परमात्मा ने इस काम के लिए चुना है तो हमें इतिहास की प्रतिधवनि का एहसास होता है।

भारत जब ब्रिटेन का गुलाम था तो एक ऐसा ही उदाहरण और देखने को मिला था। जब ब्रिटेन की संसद में भारत पर शासन करने के औचित्य को बताते हुए एक सदस्य ने कहा था कि पूरब के देशों पर शासन करने के लिए परमपिता परमेश्वर ने ताम्र पत्र पर लिखकर हमें यह अधिकार दिया है कि हम ऐसे असभ्य देशों पर शासन करें। आखिर वह कौन सी मनोदशा है कि बलवन या अंग्रेजी साम्राज्यवाद या फिर स्वयं नरेन्द्र मोदी को ‘दैवीय अधिकारों’ से लैस होना दिखाई पड़ने लगता है। वस्तुत: किसी भी निरंकुश सत्ता के पास किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए तर्क नहीं होते हैं और समाज में अपनी वैधाता के लिए उन्हें ऐसे कुतर्क गढ़ने पड़ते हैं। इसी क्रम में जब भारत सोलहवीं लोकसभा का चुनाव करा कर लोकतंत्र को समृध्द कर रहा है, तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी स्वयं को ‘दैवीय अधिकारों’ से लैस निरंकुश शाही की तरफ इशारा करते नजर आ रहे हैं। गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी को अपने को प्रधानमंत्री पद का दावेदार स्थापित करने के लिए तर्क ही नहीं है और ऐसे में वे गैर लोकतांत्रिक कुतर्कों का सहारा ले रहे हैं।

इन दिनों पूरे देश में भाजपा द्वारा एक अराजकता का माहौल बनाया जा रहा है। रोज आए दिन भाजपा और संघ के कार्यकर्ता अपने आलोचकों के ऊपर हिंसक हमले कर रहे हैं। वस्तुत: इस सारी मनोदशा को यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हम पाते हैं कि भारत के मधयकाल के इतिहास में भी ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब निरंकुश राजशाही ने अपने विरोधियों के दमन के लिए ‘लौह और रक्त’ की नीति का सहारा लिया था। आज जब हमारा देश एक परिपक्व लोकतंत्र बनने की ओर अग्रसर है, तो वहीं दूसरी ओर चुनाव के दौर में भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा अन्य राजनैतिक पार्टियों पर हिंसक आक्रमण का मूल्यांकल किस प्रकार किया जाएगा? नरेन्द्र मोदी के ‘ऊपर लौह और रक्त’ की नीति सटीक बैठती है। जिस तरह से मध्यकाल में बलवन ने अपने विरोधियों की हत्या करके उनके परिवार के लोगों को अपना गुलाम बना लिया था, ठीक उसी तरह गुजरात में मोदी ने हरेन पंडया जैसे अपने विरोधियों की हत्या करवा कर, जैसा कि तमाम स्वतंत्र जांच समूहों ने पाया है, यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है। यह बात तब और प्रमाणित हो जाती है जब नरेन्द्र मोदी हरेन पंडया हत्याकांड में सीबीआई जांच के लिए अडंगा तक लगा देते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मोदी की मानसिकता क्या है?

एक ओर, जहां लहर की बहार का कसीदा पढ़ा जा रहा है और विकास का जुमला उठाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मोदी खुद को ‘दैवीय अधिकार’ से लैस होने का दावा आखिर क्यों कर रहे हैं? वास्तव में जिस विकास मॉडल की डुगडुगी मोदी और उनके सिपहसलार पीट रहे हैं, वह बहुत जल्द ही असफल साबित होने जा रही है। गुजरात के विकास माडल का सच देश की जनता जान चुकी है कि मोदी गरीबों के मसीहा नहीं बल्कि अमीरों के रॉबिनहुड हैं। मोदी गरीबों की मेहनत की कमाई को लूट कर पूंजीपतियों की मदद करते हैं। मोदी और भाजपा के विकास के नारे की पोल खुल चुकी है। इसलिए अब मोदी को भगवान की याद आ रही है।

अपने को ‘दैवीय अधिकार’ वाला घोषित करना सिर्फ निरंकुशता का ही इशारा नहीं है। बल्कि इससे स्पष्ट होता है कि मोदी को 272 का मिशन ही असफल लग रहा है इसीलिए वे ऐसा निराशावादी बयान दे रहे हैं। वैसे भी मोदी ने यह बयान देकर भाजपा में कोई नई परंपरा कायम नहीं की है, बल्कि ‘पीएम इन वेटिंग’ रहे लाल कृष्ण आडवाणी ने भी ऐसा बयान दिया था कि भाजपा ‘ईश्वरी पार्टी’ है अत: सभी लोगों को भाजपा का साथ देना चाहिए। इसके बाद भाजपा और आडवाणी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। भाजपा का फीलगुड का नारा धाराशायी हो गया था। और इसके साथ ही लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी चकनाचूर हो गया था। अब मोदी और भाजपा को लगने लगा है कि गुजरात विकस माडल फेल हो चुका है। अब उन्हें लगने लगा है कि धर्म निरपेक्ष जनता खोखले विकास के ड्रामे को पहचान गई है और अपने संवैधानिक मूल्यों को धयान में रखकर जनादेश देगी। कुल मिलाकर मोदी की यह अभिव्यक्ति निरंकुशता और निराशावाद की एक अभिव्यक्ति ही है।

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