दिखावा बनकर न रह जाए सफाई अभियान

9:05 am or October 13, 2014
Swach Bharat

– डा. महेश परिमल –

इस समय पूरे देश में चर्चा है, तो केवल सफाई की। खूब बातें हो रही हैं, सफाई पर। अब झाड़ू हाथ में लेकर सफाई करने की तस्वीरें आम हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सचिन तेंडुलकर तक, सभी सफाई में जुटे हैं। सफाई हमारी दिनचर्या का अनिवार्य अंग है। सफाई चाहे शरीर की हो या फिर मन की, या फिर गांव-कस्बे की, यह आवश्यक और अनिवार्य है। सवाल यह उठता है कि आखिर एक साथ सबमें एक साथ सफाई का भाव कैसे जागा? रातों-रात लोगों को यह ब्रह्मज्ञान कहां से आया? सफाई कोई आज की बात नहीं है, जो एकाएक सामने आए। यह तो पुरातन काल से चली आ रही है। कई बार तो लगता है कि देश में चल रहे सफाई अभियान कहीं दिखावा बनकर न रह जाए।

दो अक्टूबर के बाद बड़ा से बड़ा नेता मीडिया के सामने सफाई का काम कर रहा है। मीडिया के जाने के बाद वहां सफाई का कोई काम हो रहा है या नहीं, इसे देखने की फुरसत किसी को नहीं है। सभी दिखावे के लिए हाथ में झाड़ू रखकर सफाई करते दिखाई दे रहे हैं। वास्तव में देखा जाए, तो यह आइडिया बहुत अच्छा है। पर इसे केवल कुछ समय के लिए ही एक अभियान की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए। इसकी पूर्णता सतत होते रहने में है। स्वच्छता के संबंध में वार्षिक अभियान और लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले कामों की तरह करना चाहिए। रोज एक गांव या क्षेत्र पर हजारों कार्यकर्ता एक तरह से टूट पड़ें, तो वहां इस अभियान का अर्थ समझ में आता है। इसके बाद इस स्थान या क्षेत्र को भूलना नहीं चाहिए। वहां स्वच्छता की निगरानी सतत रखी जाए, तभी इस तरह के अभियान का अर्थ है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इस काम के लिए आरएसएस और अन्य संगठनों की पूरी फौज है। इस फौज को इस काम में लगाना चाहिए। संगठन सबसे बड़ी शक्ति है। विश्व हिंदू परिषद के पास भी हजारों की संख्या में कार्यकत्र्ता हैं। उत्तर प्रदेश के आदित्यनाथ जैसे सांसदों का मुंह बंद रखने के लिए उनके हाथों में झाड़ू पकड़ा देनी चाहिए। मूल बात स्वच्छता नहीं, बल्कि जागृति की है। दिखावे की तो कतई नहीं है।

गांधीजी रोज अपना आंगन बुहारते थे। कचरा इकट्ठा कर उसे जलाते थे। गांधी विचार का एक अंश भी हमारे नेताओं में दिखाई नहीं देता। गांधी विचारधारा में से केवल स्वच्छता का ही गुण लिया गया होता, तो आज गंगा शुद्धिकरण के पीछे करोड़ों रुपए खर्च नहीं करने पड़ते। आज केवल गंगा ही नहीं, देश की सभी नदिया गंदी हो गई हैं। जिस नदी को मां का दर्जा दिया गया हो, जिसे हम जीवनदायिनी कहते हों, उसके प्रदूषण के लिए हम नेताओं को ही दोषी मानेंगे। क्योंकि उन्होंने ही अपने वोट के लिए गंगा की पवित्रता का इस्तेमाल किया। लोग कचरे को किसी डब्बे में डालें, तो उस कचरे का उचित समाधान भी होना चाहिए। नागरिकों पर जुर्माना लगाने की बात तो एकदम ही बेमानी और नाटकीय है। सरकार के जितने अधिक नियम-कायदे, उससे अधिक उसके तोड़ हमारे पास मिल जाएंगे। आज साढ़े छह दशक बाद स्वच्छता का भूत सामने आया है। यह अच्छी बात है। पर आज भी अनेक शहरों में गटर का पानी नदियों में मिल रहा है। कहीं-कहीं तो सीधे समुद्र में जा रहा है। हमें इस सच्चाई से मुंह नहीं मोडऩा चाहिए। प्रधानमंत्री बार-बार शौचालय बनाने की बात करते हैं, वह कभी-कभी हास्यास्पद लगता है। अमेरिका में भी प्रधानमंत्री ने शौचालय का टेप बजाया था। सरकार के लिए शौचालय बनाना तो चुटकी का काम है। इस संबंध में बार-बार उल्लेख करने के बजाए प्रधानमंत्री यह बताते कि अपने शासनकाल में उन्होंने कितने शौचालयों का निर्माण कराया, तो बात कुछ बनती नजर आती।

देश के लिए यह दुर्भाग्यजनक है कि आज भी शौचालयों के नाम पर वोट बटोरे जा रहे हैं। वास्तव में होना यह चाहिए कि साढ़े छह दशक बाद भी देश की स्थिति के लिए सभी दलों के नेता प्रायश्चित स्वरूप एक-एक गांव में झाडृू लेकर जाना चाहिए। सांसद और विधायक की टिकट तभी मिलनी चाहिए, जब उनके गांव में साफ-सफाई हो। हमारे नेता गंदगी वाली जगह पर निरीक्षण के नाम में जाकर वहां अधिकारियों एवं कर्मचारियों को लताडऩे का ही काम करते हैं। आज तक यह नहीं सुना गया कि किसी नेता ने अपने पद से केवल इसलिए इस्तीफा दे दिया कि उसके क्षेत्र में साफ-सफाई नहीं हो पाई है। किसी दल ने भी ऐसा नहीं किया कि जिस सांसद या विधायक के क्षेत्र में गंदगी की भरमार हो, उसे पार्टी से निकाल दिया हो। स्वास्थ्य मंत्री नए अस्पताल और नए हेल्थ सेंटर का उद्घाटन करने जाते हैं। उसमें कौन-कौन कर्मचारी काम करेंगे, इसमें वे काफी दिलचस्पी लेते हैं, पर स्वच्छता के नाम पर वे ऐसा कुछ नहीं करते, जिसे रेखांकित किया जा सके। एनडीए सरकार ने गंगा सफाई का काम उमा भारती को सौंपा है। अभी तक उनके काम में कोई खास प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। क्लीन इंडिया का सपना तभी सच साबित होगा, जब दो अक्टूबर को जिस तरह से सफाई अभियान चला, वैसा ही अभियान रोज चले। आज सफाई का दिखावा और कल जैसे थे वैसे। यह स्थिति बार-बार देखने में आ रही है। ऐसे में दो अक्टूबर से शुरू होने वाला सफाई अभियान एक दिखावा बनकर ही रह जाएगा। ऐसी ड्रामेबाजी बंद होनी चाहिए।

पहले शालाओं में रहन-सहन का पाठ पढ़ाया जाता था, जिसमें घर आंगन के बारे में बताया जाता था। मस्तिष्क में आज भी वह चित्र सामने आता है, जिसमें साफ आंगन के बीचों-बीच तुलसी का बिरवा आदि बातें तो आज लैट सिस्टम में भुला दिया गया है। पर एक बात तो तय है कि शहर की गलियों से अधिक गांव की गलियां अधिक स्वच्छ दिखाई देती हैं। आज भी ग्रामीण लोग अधिक जिम्मेदारी निभाते देखे गए हैं। गंगा शुद्धिकरण के नाम पर अब तक अरबों रुपए किसके खाते में गए, उसकी जांच होनी चाहिए। परंतु यह सब गांधी के नाम पर करने की लालसा पर भी बे्रक लगना चाहिए। स्वच्छता अभियान का संदेश घर-घर जाना चाहिए। इस पर अमल भी होना चाहिए। परंतु यह संदेश शो-बाजी न बन जाए, इसकी जवाबदारी भी प्रधानमंत्री की बनती है।

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