हिरासत में मौतों का अल्पसंख्यक कौन ?

9:35 am or October 13, 2014
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– सुभाष गाताड़े –

हिरासत में मौतों का सवाल एक ऐसा प्रश्न है कि उसे लेकर अक्सर नए नए उद्घाटन होते रहते हैं या उस पर अंकुश कैसे लगे इसे लेकर सुझाव आते रहते हैं। हाल के समय में जहां सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐसी मौतों को लेकर तुरन्त प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का फैसला सूर्खियों में रहा, वहीं मुंबई की उच्च अदालत द्वारा हिरासत में हुई मौत को लेकर महाराष्ट्र पुलिस को दिए गए निर्देशों का मामला भी चर्चा में रहा जिसमें अदालत ने हर पुलिस थाने के हर कोने में रोटेटिंग क्लोज सर्किट कैमरे अर्थात चल कैमरों को लगाने का आदेश दिया ताकि निरपराधों की प्रताडना कैमरे में कैद की जा सके। चन्द रोज पहले गुजरात उच्च अदालत ने भी गुजरात सरकार को इसी किस्म का निर्देश अन्य मामले में दिया और 31 दिसम्बर तक इस काम को पूरा करने को कहा।

बहरहाल, एक अन्य मामले को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप एक बेहद विस्फोटक तथ्य को उजागर करेगा, इसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। दरअसल दो साल पहले ताज मोहम्मद नामक मोबाइल बिक्रेता की न्यायिक हिरासत में हुई हत्या को लेकर मुंबई की अदालत विचार कर रही थी। इसी मुकदमे में पता चला कि ऐसी मौतों में वह न केवल पूरे मुल्क में अव्वल नम्बर पर है बल्कि इसमें सिर्फ खास समुदाय के लोग निशाने पर आ रहे हैं।

न्यायमूर्ति कानडे और पी डी कोडे की विभागीय पीठ का कहना था कि सूबा महाराष्ट्र में हिरासत में होने वाली मौतों में अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य ही नज़र आते हैं। इतनाही नहीं ठाणे सेन्ट्रल जेल में हुई 23 साला ताज मोहम्मद की रहस्यमयी हालात में हुई मौत को लेकर उसने एक एडवोकेट (युग चैधरी) को अदालत का मित्रा (एमिकस क्यूरे) नियुक्त किया, जिन्होंने इस मामले में काफी रिसर्च किया है। नेशनल क्राइम्स रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1999 से 2013 के दरमियान भारत में हिरासत में मौतों की 1,418 घटनाएं सामने आयी, जिनमें से 23 फीसदी घटनाएं महाराष्ट्र से सम्बधित थी। अदालत का मित्र नियुक्त करते हुए पीठ ने कहा कि वह इन हिरासत में हो रही इन सभी मौतों पर इकट्ठे गौर करना चाहती है और ‘‘इस मामले में कुछ ठोस करना चाहती है।’’

मालूम हो कि एक मोबाइल चोरी के मामले में सायन पुलिस ने ताज़ को गिरफ्तार किया था और पहले पुलिस हिरासत में रखा था और बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिया था, जहां उसकी मौत हुई थी। उसकी इस मौत को लेकर उसकी मां आलिया बेगम अन्सारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

इस बात को देखा जा सकता है कि यह कोई पहली दफा नहीं है जब अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव का मसला सूर्खियां बना है। टाटा इन्स्टिटयूट आफ सोशल साइन्सेस की तरफ से प्रकाशित हालिया अध्ययन इस बात की नए सिरे से ताईद करता है, जिसके मुताबिक मुंबई के मुंब्रा, शिवाजी नगर और भेंडी बाजार जैसे अल्पसंख्यक बहुल इलाके, ऐसे इलाके हैं जहां सख्त निगरानी होती है, मगर नागरिक सुविधाओं के नाम पर जबरदस्त अकाल है ? मुंबई,े डरबन और रिओ दे जानिरो जैसे तीन शहरों पर केन्द्रित उपरोक्त अध्ययन के नतीजे पिछले दिनों अख़बार में प्रकाशित हुए। मालूम हो यह वही इलाके हैं, जहां 92-93 के दंगों के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य बडे़ पैमाने पर रहने आए हैं। अध्ययन के मुताबिक ‘मुसलमानों का अपराधीकरण वैश्विक स्तर पर जो इस्लामोफोबिया का वातावरण है’ उससे जुड़ा है। अध्ययन इस बात को भी नोट करता है कि स्पेस का निजीकरण और सामुदायिक दायरों के संकुचन ने असुरक्षा के स्तर को बढ़ाया है। (http://indianexpress.com/article/cities/mumbai/muslim-localities-have-little-amenities-face-heavy-surveillance-tiss-study/#comments)

याद रहे कि आज से ढाई साल पहले समाचार मिला था कि सूबा महाराष्ट्र में अल्पसंख्यकों की शिकायतों को दूर करने के लिए विशेष दस्ते बनाए जाएंगे। इन विशेष दस्तों का काम होगा कि अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर, उनके साथ होने वाली ज्यादतियों पर या उनकी शिकायतों पर रिपोर्ट तैयार करना। राज्य पुलिस सूत्रों का कहना था कि यह दस्ते सभी थानों में तैनात इन्स्पेक्टर (समुदाय) से रोजमर्रा के तौर पर समन्वय करेगा। इनकी रिपोर्टें हर माह राज्य पुलिस मुख्यालय को भेजी जाएगी। दरअसल पुलिस द्वारा संदिग्धों के परिवारजनों की गैरकानूनी हिरासत एवं प्रताडना की कई शिकायतें वरिष्ठ अधिकारियों के यहां पहुंची थीं। सूत्रों के मुताबिक ऐसी तमाम जानकारी, शिकायतों को एकत्रित किया जाएगा तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार को भेजा जाएगा। (इण्डियन एक्स्प्रेस, 21 दिसम्बर 2011)

निश्चित ही महाराष्ट्र की जो छवि शेष मुल्क में व्याप्त है, उससे विपरीत यह दृश्य दिखता है। वैसे एक सरकारी रिपोर्ट को पलटें -जिसके अंश मुख्यधारा की मीडिया में उसी साल के पूर्वार्द्ध में प्रकाशित हुए थे (महा शेम आन रायटस काउंट, टाईम्स आफ इण्डिया, 15 अप्रैल 2011) तो यही विचलित करनेवाला तथ्य सामने आया था कि मुल्क का यही सूबा जिसने समाजसुधार आन्दोलनों में नज़ीर कायम की, जो कभी ट्रेंड यूनियन आन्दोलन तथा कम्युनिस्ट आन्दोलन का गढ़ हुआ करता था, वह 21 वीं सदी की पहली दहाई में साम्प्रदायिक घटनाओं के मामले में शेष सभी सूबों को मात देता दिखता है।

‘सोशिओ इकोनोमिक स्टेटस आफ मुस्लिम्स’ इन महाराष्ट्र शीर्षक उपरोक्त रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1998 से 2008 के दरमियान साम्प्रदायिक घटनाओं के मामले में सूबा महाराष्ट्र अव्वल नम्बर पर रहा। इस दौरान वहां 1,192 साम्प्रदायिक घटनाओं को रेकार्ड किया गया। बाकी चुने हुए राज्यों में आंकड़े इस प्रकार थे: उत्तर प्रदेश (1,112), मध्य प्रदेश (860), गुजरात (823), कर्नाटक (654), बिहार (524), उडि़सा (357), पश्चिम बंगाल (205), दिल्ली (85), हिमाचल प्रदेश (11) आदि। टाटा इन्स्टिटयूट आफ सोशल साईंसेस के प्रोफेसर शबन जिन्होंने महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के लिए प्रस्तुत रिपोर्ट तैयार की थी, ने इस बात को स्पष्ट किया था कि महाराष्ट्र का समाज किस हद तक साम्प्रदायिक आधारों पर ध्रुवीकृत हो चुका है। उनके मुताबिक चाहे गणेश चतुर्थी हो या मोहरम, ये दोनों त्यौहार इस ढंग से मनाए जाते हैं जहां अन्य समुदाय को कोई स्थान नहीं होता। कई सारी साम्पद्रायिक घटनाएं इन उत्सवों के दौरान पैदा तनाव का ही नतीजा होती हैं।

वैसे महाराष्ट्र के सामाजिक -राजनीतिक जीवन के इस धीमी गति से साम्प्रदायीकरण की इस तस्वीर से हम सब तबभी रूबरू हुए थे जब सच्चर कमीशन द्वारा भारत के मुसलमानों के हालात पर केन्द्रित रिपोर्ट के अंश अख़बारों के पन्नों पर प्रकाशित हो रहे थे। इसमें वह आंकड़े भी शामिल थे जो बता रहे थे कि किसी विशिष्ट सूबे की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत कितना है और जेलों में उनकी तादाद का क्या प्रतिशत है। सबसे चैंकानेवाले आंकड़े महाराष्ट्र से थे। इन आंकड़ों के मुताबिक जहां महाराष्ट्र में मुसलमान समूची आबादी का महज 10.2 फीसदी हिस्सा हैं वहीं जेलों में उनका अनुपात 32 फीसदी है। (25 नवम्बर 2006, इण्डियन एक्स्प्रेस, टू मेनी मुस्लिम्स इन प्रिजन, सचर एडिटस धिस आउट)।

नब्बे के दशक की शुरूआत में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में प्रायोजित दंगों पर श्रीकृष्ण कमीशन की रिपोर्ट के आने के बाद शेष मुल्क के लोग महाराष्ट्र के राजनीतिक-सामाजिक जीवन के गहरे साम्प्रदायिकीकरण की घटना से पहली दफा वाकीफ हुए थे। सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट आए अर्सा बीत गया मगर न किसी राजनेता पर और न ही किसी पुलिस अधिकारी पर -जिन्होंने इस दावानल को बुझाने के बजाय भड़काने का काम किया था -कोई कार्रवाई हो सकी।

एक ऐसा सूबा जिसने फुले अम्बेडकर रमाबाई ताराबाई शिन्दे जैसे महान समाजविद्रोहियों को पैदा किया, जिनकी विरासत के दावेदार शेष मुल्क में भी फैले हैं, उसके जनमानस के एक अहम हिस्से के तंगनज़र विचारों के मुरीदों में रूपान्तरण को आखिर कैसे समझा जा सकता है। यह समझना इस वजह से भी मुश्किल जान पड़ सकता है क्यांेकि आजादी के बाद के बहुत छोटे अन्तराल को छोड़ दें जिस दौरान घोषित साम्प्रदायिक पार्टियां सत्ता में थी या सत्ता में साझीदार थीं, अधिकतर दौर उसी पार्टी की हुकूमत रही है जो अपने आप को घोषित तौर पर सेक्युलर कहती है। आखिर सेक्युलर निज़ाम में साम्प्रदायिक शक्तियां किस तरह ताकत हासिल करती गयी हैं। अन्त में, इन दिनों सूबा महाराष्ट्र में चुनाव सम्पन्न हो रहे हैं, जिसमें घोषित साम्प्रदायिक पार्टियों, संगठनों का पलड़ा भारी बताया जा रहा है। और इस बात की कल्पना ही की जा सकती है कि अगर अनुमान के हिसाब से नतीजे निकले तो अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कितनी अधिक मुश्किलों  का सामना करना पड़ सकता है।

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