नए हुक्मरानों की विभाजक राजनीति और जवाहरलाल नेहरू की विरासत

10:12 am or October 13, 2014
Nehru

– दिग्विजय सिंह – 

आमतौर पर सुब्रमण्यम स्वामी के बयानों को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन नेहरू के अनुयायी इतिहासकारों की किताबों को जला देने वाला उनका बयान उनके अन्य बयानों से थोडा अलग है . यह संघ की उस योजना का हिस्सा है जिसके अनुसार भारत के इतिहास में नेहरू जी के योगदान को कमतर करके पेश करने की साजिश रची गयी है . संघ वाले बहुत दिनों से इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश कर रहे हैं और अब उनको लगता है कि अब वक्त आ गया है कि वे अपने मंसूबों को अमली जामा पहना दें. ऐसा शायद इसलिए है  कि केंद्र में उनको स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिल गया है . उनको लगता है कि स्पष्ट जनादेश के बाद वे कुछ भी कर सकते हैं , यहाँ तक कि इतिहास भी बदल सकते हैं .महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुई भारत की आजादी  की लड़ाई में पं जवाहरलाल नेहरू का जो योगदान है उसे कभी भी भुलाया  नहीं जा सकता .  उनको महात्मा गांधी ने खुद अपना उत्तराधिकारी चुना था और उनको राष्ट्र के नेतृत्व का जिम्मा दिया था . सुब्रमण्यम स्वामी भारतीय राजनीति में एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनको कभी संघ अपना लेता है , कभी दुत्कार देता है और दोबारा फिर अपना लेता है . वे अक्सर  भड़काऊ बयान देते रहते हैं जिन्हें आमतौर पर नजर अंदाज कर दिया जाता  है. पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बयान दिया और कहा कि पं जवाहरलाल नेहरू  की जयन्ती 14 नवम्बर से इंदिरा जी के जन्मदिन 19 नवम्बर तक  देश में स्वच्छता अभियान चलाया जाएगा . यह शायद पहली बार हो रहा है कि नरेंद्र मोदी ने इन दो महान प्रधानमंत्रियों के अस्तित्व को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है .

आर एस एस बीजेपी मंडली की समस्या यह  है कि उनके अपने नेताओं में ऐसा कोई भी नहीं है जिसने स्वतंत्रता के संघर्ष में कोई भी योगदान किया हो .इसीलिए उनकी कोशिश चल रही  है कि कांग्रेस के महान नेताओं ,महात्मा गांधी , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और सरदार पटेल की विरासत को अपना लें . 1980 के दशक में अटल बिहारी  वाजपेयी की अगुवाई में बीजेपी ने गांधीवादी समाजवाद के सिद्धांत की बात की और उसी के जरिये महात्मा गांधी से सम्बन्ध बनाने की कोशिश शुरू कर दी .इसी बहाने आजादी की लड़ाई से किसी तरह संघ के संबंधों को स्थापित करने की कोशिश की जानी थी. यह कोशिश बेकार गयी क्योंकि उनको इस प्रयोग से कोई राजनीतिक लाभ नहीं हुआ.नतीजा यह हुआ कि वे घोर साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्माद पर आधारित अपनी राजनीति की तरफ फिर वापस चले गए और राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के विभाजक एजेंडा को फिर से लागू करने की राजनीति शुरू हो गयी .

उसके बाद सरदार पटेल को अपना बनाने का अभियान शुरू हुआ . इस बीच जोर शोर से प्रचार किया गया कि पं जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल में भारी मतभेद थे . इतिहास का कोई भी जानकार बता देगा कि ऐसा कुछ नहीं था. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी सरदार पटेल की एक बहुत ही विशाल मूर्ति की स्थापना की बात करते रहते थे . यहाँ तक कि उन्होंने जनता से भी लोहा दान करने की अपील कर डाली जैसे राम मंदिर के नाम पर गाँव गाँव से ईंटें मंगवाकर किया गया था. अब वे देश के प्रधानमंत्री हैं लेकिन अब वे लोह पुरुष सरदार पटेल की लौह प्रतिमा की बात नहीं कर रहे हैं. इन दिनों नरेंद्र मोदी धार्मिक बुनियादपरस्त राजनीति से अपने दूर करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं . यह अलग बात है कि उनकी ट्रेनिंग विभाजक राजनीति के लिए ही हुयी है . अपने आपको स्टेट्समैन साबित करने के चक्कर में वे भारतीय मुसलमानों के पक्ष में भी बयान देते पाए जा रहे हैं . यहाँ तक कि उन्होंने लाल किले के अपने संबोधन में भी देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की अपील कर डाली .

लेकिन सवाल यह है कि क्या तेंदुआ अपना स्थाल बदल  सकता है  ?  आर एस एस बीजेपी की योजना यह  है कि कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देकर वे राष्ट्रीय राजनीति में वह मुकाम हासिल करना चाहते हैं जहां हमेशा से ही कांग्रेस विराजमान है . जबकि संघ की मंडली के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे हाशिये पर पड़े लोग संघ के विभाजनकारी एजेंडे को चलाने के लिए छोड़ दिए गए हैं इसी क्रम में साम्प्रदायिक दंगों के अभियुक्तों को सम्मानित किया जा रहा है . संघ बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भड़काऊ बातें कहने की आजादी दे दी गयी है . हर घटना को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है . आर एस एस  बीजेपी की कोशिश  है कि नेहरू गांधी परिवार के स्वतंत्रता संग्राम और नए भारत के निर्माण में किये गए योगदान को कम कारके पेश किया जाए. इनका एजेंडा है कि राष्ट्रीय राजनीति का और अधिक धृवीकरण कर दिया जाए.

प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज के जिम्मेदार लोग ऐसा होने देगें.क्या आर एस एस बीजेपी मंडली इतिहास और इतिहास के अध्ययन की तरकीबों को बर्बाद करने में सफल हो पायेगी. देखना यह है कि एक राष्ट्रीय नेता बनने की कोशिश में ,नरेंद्र मोदी जी सुब्रमण्यम स्वामी और महंत आदित्यनाथ जैसे लोगों को कैसे नियंत्रित करते  हैं .क्या इनको रोका जाएगा या इन्हें गुपचुप तरीके से संघ के विभाजनकारी एजेंडे पर काम  करने के लिए बेलगाम छोड़ दिया जायेगा और यह देश की राजनीति का धृवीकरण करते रहेगें . सबको मालूम है कि दो तरह की बातें करने में आर एस एस बीजेपी के टक्कर का कोई भी संगठन नहीं है.

(लेखक राज्यसभा सांसद, भूतपूर्व मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश है)

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