गुणवत्ता से दूर हमारे आम

12:24 pm or May 12, 2014
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डॉ.महेश परिमल-

संघ ने भारत के आमों पर एकतरफा प्रतिबंध लगा दिया है। इससे देश के आम उत्पादकों में काफी निराशा है। देश को करोड़ों का नुकसान हुआ है। पिछले वर्ष हमने 265 करोड़ रुपए के आम विदेश भेजे थे। जो आधे यूरोप में शौक से खाए गए। भारतीय किसानों के साथ इतना बड़ा धोखा हो गया, सरकार चुनाव में व्यस्त है, इसलिए इस दिशा में कुछ होना संभव नहीं दिखता। आचार संहिता का भी मामला है। सरकार के पास समय नहीं है, वाणिज्य विभाग कुछ करने की स्थिति में नहीं है, फिर भी उसने अपना विरोध दर्ज कर ही दिया है। अब जो कुछ करना है, वह आने वाली सरकार को करना है। आम उत्पादक हताश हैं। इस बार उनकी आशाओं पर तुषारापात हो गया है।

सरकार मान्यता प्राप्त 25 पेकेजिंग हाउस के माध्यम से आमों का निर्यात करती है। संघ को यह आपत्तिा है कि भारत के आमों की पेकेजिंग हाउस की समय-समय पर जांच नहीं हो पाती। कई बार सड़े हुए आम भी भेज दिए जाते हैं। भारत ने संघ को यह विश्वास दिलाया था कि वह आमों का निर्यात पंजी.त पेकेजिंग हाउस के माध्यम से ही किया जाएगा। इस संबंधा में दोनों पक्षों के बीच विचार-विमर्श चल ही रहा था कि अचानक ही संघ ने एकतरफा निर्णय ले किया। एक बार फिर भारत की निष्क्रियता सामने आ गई। भारतीय आमों की विदेशों में जोरदार मांग है। पिछले तीन वर्षो के आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2010-11 में 165 करोड़ रुपए की कीमत के 58, 863 टन, 2011-12 में 210 करोड़ रुपए के 63,441 टन और 2012-13 में 264 करोड़ के 55, 413 टन आमों का निर्यात किया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि विदेशों में भारतीय आमों की कितनी मांग है। यह मांग लगातार बढ़ भी रही है।

ब्रिटेन में पाकिस्तानी आमों की अपेक्षा भारतीय आम की मांग अधिक है। अमेरिका में भी गुजरात के वलसाड़ और जूनागढ़ के आम की डिमांड है। भारत से विदेशों में केवल आम ही नहीं, बल्कि विभिन्न तरह के अचारों का भी निर्यात होता है। गुजरात में आम से बनने वाले विविध अचारों की मांग विदेशों में होने के कारण काफी पहले से ही इसकी तैयारी कर ली जाती है। इस समय संघ ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाया है, किंतु भारतीय अचारों पर नहीं। इसलिए आम के व्यापारी अब अचारों पर विशेष ध्यान देने लगे हैं। वैसे देखा जाए, तो देश में खाद्य विभाग की सुस्ती के कारण रसायनों से पकाए जाने वाले आमों और गर्मी में मिलने वाले आम के रस की बिक्री पर किसी तरह का नियंत्रण न होने के कारण सड़े आमों के रस बाजार में खुले आम बिकते हैं। खाद्य विभाग की सक्रियता से कुछ व्यापारियों पर कार्रवाई होती है, पर वह इतनी हल्की होती है कि कोई उससे सबक लेने को तैयार नहीं होता। न तो अधिक जुर्माना लिया जाता है और न ही किसी प्रकार के दंड की व्यवस्था है। इसलिए मिलावटी रस का व्यापार बेखौफ चल रहा है। इसी तरह की लापरवाही के चलते विदेश भेजे जाने वाले आमों में भी आ गई होगी, जहां सड़े आम भेज दिए गए होंगे, जिसकी जानकारी निर्यातकों को नहीं होगी। इसलिए भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रतिबंध के पीछे निर्यातकों की लापरवाही ही है। विभाग सतर्क होता, तो यह नौबत नहीं आती।भारत से विदेश भेजे जाने वाली आम तो भारतीय बाजारों में दिखाई ही नहीं देते। कई फार्म हाउस ऐसे हैं, जहां विदेश भेजे जाने वाले आमों का उत्पादन होता है। इसके लिए वे साल भर कड़ा परिश्रम करते हैं। देश में अभी जो आम बिक रहे हैं, वे किसी भी तरह से विदेश भेजे जाने लायक नहीं हैं। हमारे यहां जहां लागत नियंत्रण पर जोर दिया जाता है, वहीं संसार के 85 प्रतिशत मुल्कों में गुणवत्ता पर विशेष नजर रखी जाती है। अफसोस की बात यह है कि हमारे प्रतिस्पर्धी अन्य मुल्क जहां बेहद तेजी से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुकूल अपने आपको खरा कर हमारे लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं, वहीं हम हाथ पर हाथ धरे बेसिर पैर की दलीलों में वक्त जाया कर रहे हैं। यूरोपीय बाजारों में फल-सब्जी आदि कोई भी खाद्य सामग्री बगैर मानक परीक्षण से गुजरे बाजार में बिक्री के लिए नहीं आ सकती। वहां मानक इतने ज्यादा सख्त हैं कि परीक्षण में फेल खाद्य सामग्री को पशुओं के आगे भी नहीं डाला जा सकता। अगर फल-सब्जी, दूध, मक्खन आदि मानकों पर खरे नहीं उतरते तो दोयम दर्जे के देशों को तो निर्यात किया जा सकता है, पर अपने देश के जानवरों तक को वह खाद्य सामग्री नहीं दी जा सकती। देश के बड़े-बड़े खाद्य पदार्थ उत्पादक शुध्दता संबंधी अंतरराष्ट्रीय मानकों की अवहेलना भारी लागत की वजह से ही करते हैं। देश में ढीले-ढाले कागजी कानून के चलते ही वे अब गुणवत्ता की परवाह न करते हुए कम लागत में ज्यादा मुनाफा लेने के आदी हो चुके हैं। आज जबकि वैश्विक स्तर पर खाद्यपदार्थो को लेकर जबरदस्त बदलाव आ रहे हैं, हमारा देश अपनी रूढ़िवादी पुरानी परिपाटियों पर ही चलता चला जा रहा है। जब भी कभी इस तरह के प्रतिबंध लगते हैं, भेदभाव-पक्षपात आदि का हल्ला मचाकर हमारे यहां असली मुद्दा गोल कर दिया जाता है। लब्बोलुआब यह है कि निर्यात के एक भारी प्रभुत्व वाले, बेहद महत्वपूर्ण व संभावनाओं वाले क्षेत्र से हम धीरे-धीरे बाहर होते जा रहे हैं।

देश में आम का सीजन शुरू हो गया है। इस स्थिति मेंसंघ ने भारतीय आमों पर एकतरफा प्रतिबंध लगाकर सभी को चौंका दिया है। अब सभी देश यह कह रहे हैं कि भारत से आने वाले आमों की विशेष रूप से जांच होगी, तभी कुछ संभव हो पाएगा। इस संबंध में भारत और संघ के बीच काफी समय से चर्चा चल ही रही थी। परंतु संघ अचानक ही इस प्रकार के प्रतिबंध का निर्णय ले लेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। यूरोपीय देशों में रहने वाले एनआरआई भारत के केसर और हाफूस को पसंद करते हैं। भारत भीसंघ के एक्सपोर्ट क्वालिटी का माल के नियम-कायदों को समझना होगा। आम के सीजन के समय ही इस पर प्रतिबंध लगाने से व्यापारियों को काफी नुकसान ही होगा। इस प्रतिबंधा का असर यह होगा कि अब भारतीय भी विदेशों में भेजे जाने वाले आमों को देख और चख सकेंगे। वे आम जो अब तक खास थे, कुछ हद तक आम हो जाएंगे। भले ही इसकी कीमत आम आदमी के बूते के बाहर की हो, पर इतना तो तय है कि अब एक्सपोर्ट क्वालिटी के आमों को भारतीय बाजारों में देखा जा सकता है।

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