भारत के अतीत की याद दिलाती है यह उपलब्धि

12:55 pm or May 12, 2014
1205201410

सुनील तिवारी-

भारत के लिए यह गर्व का विषय है कि प्रतिष्ठित इण्डियन इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी, गुवाहाटी विश्व के सर्वश्रेष्ठ सौ विश्वविद्यालयों की सूची में स्थान पा गया है। भारत के लिए यह पहला मौका है जब उसे ऐसी उपाधि हासिल हुई है। आइआइटी-जी नाम से विख्यात यह देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय है,जो पचास वर्ष की अवधि के अन्दर इस चुनिंदा समूह में शामिल हुआ। आइआइटी-जी पुर्तगाल की न्यू यूनिवर्सिटी ऑफ लिसन और ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी के साथ 87वें पायदान पर है। गौरतलब है कि एक लंबे अरसे से इस बात पर देश के नेता, वैज्ञानिक और शिक्षक चिन्ता व्यक्त कर रहे थे कि देश का कोई भी विश्वविद्यालय या संस्था दुनिया की सर्वोच्च दो सौ संस्थाओं की सूची में भी स्थान नहीं पा रहा था। जबकि,देश में बौध्दिक सम्पदा और सामाजिक तथा आर्थिक विकास का इतिहास अत्यधिक समृध्द है। जाहिर है कि आइआइटी-जी की यह उपलब्धि देश के अन्य संस्थानों के लिए प्रतिस्पर्धा और प्रेरणा का माहौल पैदा करने वाली है और अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि तमाम अन्य संस्थान भी अपने परिसर में ऐसा वातावरण बनाएंगे,जिससे कि उनकी शिक्षा की गुणवत्ता में अभूतपूर्व वृध्दि हो। देश में संस्थानों के बीच शिक्षा, शोध एवं उपाधियों के आधार पर पहले से ही इस प्रकार की सूची तैयार करने की प्रणाली मौजूद है लेकिन,इस प्रणाली में देश के अन्दर ही अपनी ख्याति को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए जहां तमाम संस्थान वैज्ञानिक तरीकों से प्रतिस्पर्धा और शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए कठोर परिश्रम कर रहे हैं और सफलता की सीढ़ियां निरन्तर चढ़ रहे हैं। किसी भी संस्थान में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सुयोग्य शिक्षकों और उनके पढ़ाने की प्रणाली का वैज्ञानिक एवं प्रभावी होना जरूरी है। अध्यापकों के लिए भी निरंतर ऐसे पाठयक्रमों के संचालन की आवश्यकता है कि वे न सिर्फ अपनी जानकारी को अद्यतन रखें, बल्कि विश्व की सर्वोच्च संस्थाओं द्वारा दी जा रही शिक्षा के बारे में भी जानकारी रखें और उसे अपने संस्थान में छात्रों के लिए उपलब्ध कराएं। इसके अलावा इस बात का पूरा धयान रखा जाना चाहिए कि बचपन से ही छात्र की मनोवैज्ञानिक स्थिति क्या है। वह किस क्षेत्र में बेहतर उपलब्धियां हासिला करने की स्थिति में है। इस तथ्य को देखते हुए ही शिक्षा दी जानी चाहिए। सिर्फ माता-पिता की महत्वाकांक्षा के चलते इंजीनियर, डॉक्टर, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रबंधाक या विधि अधिकारी बनने और मोटी तनख्वाह घर लाने के लिए जबरदस्ती पढ़ाई नहीं की जानी चाहिए। सरकार की तरफ से ऐसी शिक्षा नीति बनाकर उसका अनुपालन किया जाना चाहिए कि धन, संसाधन और सुअवसर के अभाव में प्रतिभाएं कुंठित होकर दब न जाएं। वर्तमान में हमारे देश को विश्व का सबसे युवा देश कहा जाता है। यहां युवाओं की तादाद सर्वाधिक होने के बावजूद प्रतिभा के पलायन की समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा जा सका है। यद्यपि शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ छात्रवृत्ति तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं हैं। बेहतर तो यह होता कि सरकार की ओर से प्रतिभाओं को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए सर्वसुलभ योजनाएं बनाई जातीं और उनका ईमानदारी से पालन कराया जाता। उम्मीद की जाती है कि आइआइटी-जी ने जो स्थान टाइम्स हायर एजुकेशन पत्रिका के सव्रेक्षण में प्राप्त किया है, उससे प्रेरित होकर भारत के अन्य संस्थान भी अथक प्रयास करेंगे और ऐसी ही उपलब्धिा हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो जाएंगे। आईआईटी गुवाहाटी ने दुनिया की टॉप 100 यंग युनिवर्सिटी की सूची में भारत को भी जगह दिला दी। यह उस लिस्ट में शामिल इकलौती भारतीय युनिवर्सिटी है । यह उपलब्धिा भारत के लिए काफी सुकूनदेह कही जाएगी जो आर्थिक तौर पर आगे बढ़ते हुए भी शैक्षिक जगत में विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रहा था। यह बात देशवासियों को स्वाभाविक तौर पर सालती थी कि एक समय संसार में ज्ञान का एक बड़ा केंद्र माना जाने वाला भारत इस मोर्चे पर गौर करने लायक स्थिति में भी नहीं आ पा रहा है। इस ग्लोबल लिस्ट में एक भारतीय युनिवर्सिटी का नाम आना इस दिशा में नई शुरुआत है। लेकिन, यह देखना भी जरूरी है कि आईआईटी गुवाहाटी का नाम इस लिस्ट में शामिल कैसे हुआ। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह दुनिया की सारी युनिवर्सिटीज की नहीं, सिर्फ यंग युनिवर्सिटीज की लिस्ट है। यंग युनिवर्सिटीज यानी वे, जिन्हें स्थापित हुए 50 वर्ष से ज्यादा नहीं हुए हैं। गौर करने की बात है कि ज्ञान के केंद्र के तौर पर किसी विश्वविद्यालय की पहचान बनना एक लंबी प्रक्रिया होती है। हां, एक बार यह पहचान बन जाने के बाद उस केंद्र की उम्र भी खासी लंबी होती है। अगर कुछ अघटित न घट जाए तो किसी भी समाज में विश्वविद्यालय जैसे ज्ञान केंद्र उसकी स्थायी संपत्तिा होते हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहते हैं। इंग्लैंड की कैंब्रिज युनिवर्सिटी को 800 साल से ज्यादा हो गए हैं। ऑक्सफर्ड को भी डेढ़ सौ साल होने वाले हैं। ऐसे में नए विश्वविद्यालयों के लिए यह बेहद मुश्किल है कि वे रातोंरात इन्हें पीछे छोड़कर दुनिया में अपने नाम के झंडे गाड़ दें। लेकिन वरीयता सूची में संसार के सभी विश्वविद्यालयों को शामिल करने से यह बात साफ नहीं होती कि संसार में ज्ञान और शिक्षा के नए केंद्र विकसित करने का काम हो रहा है या नहीं। यंग युनिवर्सिटीज का कॉन्सेप्ट इस कमी को पूरा करता है। युनिवर्सिटी का स्तर जांचने के सभी 13 पैमाने इन विश्वविद्यालयों पर भी लागू किए गए हैं, बस इनकी उम्र वाली शर्त इसमें और जोड़ दी गई है। उम्मीद करें कि यह खबर भारत के शिक्षा ढांचे का हौसला बढ़ाएगी।

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in